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दुख और संताप से आदमी बिखरता है, फिर निखरता है जीवन आसान नहीं होता। यह बात हम सब जानते हैं, लेकिन जब तक दुख खुद के दरवाजे पर दस्तक नहीं देता, तब तक हम जीवन की असली सच्चाई को समझ नहीं पाते। इंसान जब तक सुख में होता है, वह खुद को मजबूत समझता है, दुनिया को अपनी मुट्ठी में मानता है। लेकिन जब दुख और संताप आते हैं, तब असली परीक्षा शुरू होती है। दुख केवल दर्द नहीं देता, वह इंसान को तोड़ता है, झकझोरता है और अंदर से बिखेर देता है। कभी अपनों का साथ छूट जाता है, कभी रिश्ते धोखा दे जाते हैं, कभी मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिलती। ऐसे समय में आदमी खुद से सवाल करने लगता है—“मेरे साथ ही क्यों?” यहीं से इंसान टूटना शुरू करता है। जब इंसान बिखरता है… दुख इंसान के आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है। मन भारी हो जाता है, रातें लंबी लगती हैं, और हर खुशी अधूरी लगने लगती है। वो इंसान जो दूसरों को हँसाया करता था, वही अकेले में चुपचाप रोने लगता है। कई बार तो इंसान खुद को खत्म कर देने तक की सोचने लगता है। लेकिन यही दुख एक ऐसी आग भी है, जो इंसान के अंदर छुपी ताकत को बाहर निकालती है। दुख इंसान को बदल देता है जब जीवन बा...

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