SanjivKumar
जय संविधान, मैं भारत देश का निवासी संजीव कुमार , "विधि" का छात्र हूं । मेरे जीवन का उद्देश्य लोगों को अधिक से अधिक स्रोतों से प्रेरित करना है। मैं अपनी सभी प्रतिभाओं को सकारात्मक तरीके से उपयोग करना चाहता हूं, यह ब्लॉग मेरे लक्ष्य के लिए एक छोटा सा प्रयास है । मैं स्वभाव से खुश हूँ , आप सभी के समर्थन के लिए धन्यवाद !!
Saturday, October 3, 2026
वर्दी वाला गुंडा’ उपन्यास का सारांश
Wednesday, September 30, 2026
बचपन मजदूरी के लिए नहीं, शिक्षा और सपनों के लिए है !
बाल श्रम के विरुद्ध एक सामाजिक और कानूनी संघर्ष -
“जिस उम्र में बच्चे के हाथ में किताब और कलम होनी चाहिए, उस उम्र में यदि उसके हाथ में औजार, ईंट, बर्तन या बोझ हो, तो यह केवल गरीबी की तस्वीर नहीं है — यह समाज और व्यवस्था के सामने एक गंभीर प्रश्न है।”
बाल श्रम भारत की उन सामाजिक समस्याओं में से एक है, जिसका समाधान केवल कानून बनाने से संभव नहीं है। बाल श्रम के पीछे गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, पारिवारिक परिस्थितियाँ और सस्ते श्रम की मांग जैसे अनेक कारण जुड़े हुए हैं। इसलिए बाल श्रम को केवल “बच्चे के काम करने” की घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह बच्चे के शिक्षा के अधिकार, गरिमा, स्वास्थ्य, विकास और सुरक्षित बचपन से जुड़ा हुआ प्रश्न है। एक कानून के छात्र के रूप में जब हम बाल श्रम को देखते हैं, तो हमारे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न आता है जब भारत में बाल श्रम के विरुद्ध संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपलब्ध है, तब भी बच्चे श्रम करने के लिए मजबूर क्यों हैं?
बाल श्रम क्या है? सामान्य अर्थ में बाल श्रम से आशय ऐसे कार्य से है जिसमें कम उम्र के बच्चों को उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामान्य विकास की कीमत पर काम करने के लिए लगाया जाता है। भारत में बाल श्रम की कानूनी व्यवस्था को समझने के लिए बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986, जिसे 2016 में महत्वपूर्ण रूप से संशोधित किया गया, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 2016 के संशोधन के बाद कानून में “बालक” और “किशोर” के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है। बालक से आशय ऐसे व्यक्ति से है जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है, जबकि किशोर वह है जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी कर ली है लेकिन 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों आयु वर्गों के लिए कानून में अलग-अलग प्रतिबंध निर्धारित किए गए हैं।
संविधान और बाल अधिकार , बाल श्रम के खिलाफ भारत की संवैधानिक व्यवस्था काफी महत्वपूर्ण है।
अनुच्छेद 21A — शिक्षा का मौलिक अधिकार - भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21A 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। इसका सीधा संबंध बाल श्रम से है। यदि कोई बच्चा स्कूल जाने की उम्र में लगातार मजदूरी कर रहा है, तो उसका शिक्षा के अधिकार से वंचित होना एक गंभीर संवैधानिक चिंता बन जाता है। बच्चे को केवल स्कूल में प्रवेश मिल जाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि वह बच्चा स्कूल में जाए, पढ़ाई जारी रखे और सुरक्षित वातावरण में शिक्षा प्राप्त करे।
अनुच्छेद 24 — खतरनाक रोजगार से सुरक्षा संविधान का अनुच्छेद 24, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या अन्य खतरनाक रोजगार में नियोजित करने पर रोक लगाता है। यह प्रावधान इस बात को स्वीकार करता है कि बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अभी पूर्ण नहीं हुआ होता। इसलिए उन्हें ऐसे कार्यों से बचाना राज्य और समाज दोनों की जिम्मेदारी है जो उनके स्वास्थ्य और जीवन के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
अनुच्छेद 39(e) और 39(f) राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में भी बच्चों की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया गया है।
अनुच्छेद 39(e) राज्य को यह सुनिश्चित करने की दिशा देता है कि बच्चों की कम उम्र का दुरुपयोग न हो और उन्हें ऐसे काम में न लगाया जाए जो उनकी शक्ति और स्वास्थ्य के प्रतिकूल हो।
अनुच्छेद 39(f) बच्चों को स्वस्थ विकास, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ आगे बढ़ने के अवसर देने तथा उन्हें शोषण और नैतिक एवं भौतिक परित्याग से बचाने की बात करता है।
इस प्रकार संविधान बाल श्रम को केवल रोजगार का विषय नहीं मानता, बल्कि इसे बच्चे के समग्र विकास और गरिमा से जोड़ता है। बाल और किशोर श्रम अधिनियम, 1986 और 2016 का संशोधन - मूल रूप से 1986 में बनाए गए कानून का उद्देश्य कुछ व्यवसायों और प्रक्रियाओं में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाना तथा अन्य क्षेत्रों में उनके कार्य की परिस्थितियों को विनियमित करना था। लेकिन समय के साथ बाल अधिकारों की समझ विकसित हुई और 2016 में कानून में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। संशोधित कानून का नाम “बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986” किया गया। इसके तहत सामान्य सिद्धांत यह है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को रोजगार में लगाना प्रतिबंधित है। वहीं, 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों या प्रक्रियाओं में नियोजित करना प्रतिबंधित है। कानून में कुछ सीमित अपवाद भी हैं। उदाहरण के लिए, निर्धारित शर्तों के अधीन बच्चे द्वारा अपने परिवार या पारिवारिक उद्यम में सहायता करने तथा मनोरंजन उद्योग में बाल कलाकार के रूप में कार्य करने से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। इन अपवादों को इस प्रकार नहीं समझा जाना चाहिए कि बच्चे को उसकी शिक्षा और सुरक्षा की कीमत पर काम कराया जा सकता है।
कानून तो है, फिर बाल श्रम क्यों? यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
केवल कानून बना देने से बाल श्रम समाप्त नहीं होता। इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं।
1. गरीबी - गरीब परिवारों में बच्चे की आय कभी-कभी परिवार की आर्थिक जरूरत का हिस्सा बन जाती है। ऐसी स्थिति में परिवार शिक्षा की तुलना में तत्काल आय को प्राथमिकता दे सकता है। 2. शिक्षा से दूरी - यदि परिवार में शिक्षा को लेकर जागरूकता कम है, तो बच्चे को स्कूल भेजने के बजाय काम पर भेजना सामान्य समझ लिया जाता है। 3. सस्ता श्रम - कुछ क्षेत्रों में बच्चों को कम मजदूरी में काम पर रखने की प्रवृत्ति बाल श्रम को बढ़ावा देती है। यह न केवल बच्चे के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि वयस्क श्रमिकों के रोजगार और मजदूरी पर भी प्रभाव डाल सकता है। 4. कानून के क्रियान्वयन की चुनौती - कानून में प्रतिबंध होने के बावजूद वास्तविक चुनौती है पहचान, निरीक्षण, बचाव, पुनर्वास और निगरानी। , किसी बच्चे को काम से निकाल देना ही पर्याप्त समाधान नहीं है। यदि उसे वापस उसी गरीबी, असुरक्षा या पारिवारिक परिस्थिति में भेज दिया गया जिसके कारण वह काम पर आया था, तो उसके दोबारा बाल श्रम में जाने का खतरा बना रहता है।
दंड का प्रावधान - बाल श्रम कानून केवल नैतिक अपील नहीं करता, बल्कि उल्लंघन के लिए दंड का भी प्रावधान करता है। अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत कानून का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के लिए कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। बाल श्रम से संबंधित अपराधों में केवल दंड देना ही अंतिम उद्देश्य नहीं होना चाहिए। कानून का व्यापक उद्देश्य बच्चे को श्रम से निकालकर शिक्षा, सुरक्षा और पुनर्वास की ओर ले जाना होना चाहिए। यहीं पर कानून प्रवर्तन और सामाजिक कल्याण व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रशासन की जिम्मेदारी बाल श्रम को रोकने में जिला प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रशासन को केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने की बजाय सक्रिय निगरानी और रोकथाम पर भी ध्यान देना चाहिए।
इसके लिए—
संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण;
दुकानों, कार्यशालाओं, कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों की जांच;
स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की पहचान;
बाल श्रम की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई;
बचाए गए बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था;
परिवार को सामाजिक और आर्थिक सहायता से जोड़ना;
बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ना;
संबंधित विभागों के बीच समन्वय
जैसे कदम महत्वपूर्ण हैं।
बाल श्रम को समाप्त करने की जिम्मेदारी केवल श्रम विभाग की नहीं हो सकती। इसमें शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, पुलिस, जिला प्रशासन, स्थानीय निकाय, विद्यालय और समाज सभी की भूमिका है।
क्या केवल बच्चे को काम से छुड़ाना पर्याप्त है? मेरे विचार से नहीं।
एक कानून के विद्यार्थी के रूप में बाल श्रम के प्रश्न को केवल “नियोक्ता को दंडित करो” तक सीमित करके देखना अधूरा होगा। मान लीजिए किसी 12 वर्षीय बच्चे को एक दुकान से मुक्त करा लिया गया। यदि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं बदली, उसकी शिक्षा की व्यवस्था नहीं हुई और उसके पुनर्वास की निगरानी नहीं हुई, तो कुछ समय बाद वह बच्चा किसी दूसरे स्थान पर काम कर सकता है।
इसलिए प्रभावी व्यवस्था का सूत्र होना चाहिए:
पहचान → बचाव → शिक्षा → पुनर्वास → परिवार का सहयोग → निरंतर निगरानी
यही बाल श्रम उन्मूलन को स्थायी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टिकोण हो सकता है। बाल श्रम और शिक्षा बाल श्रम के विरुद्ध सबसे प्रभावी सामाजिक उपायों में शिक्षा महत्वपूर्ण है। एक बच्चा जब स्कूल जाता है, तो वह केवल किताबें नहीं पढ़ता। वह अपने अधिकारों, समाज, कानून और भविष्य के अवसरों को समझने की क्षमता विकसित करता है। इसलिए अनुच्छेद 21A और बाल श्रम कानून को अलग-अलग विषयों के रूप में देखने के बजाय एक-दूसरे से जुड़े अधिकारों के रूप में देखना चाहिए। जहाँ शिक्षा मजबूत होगी और परिवारों को सामाजिक-आर्थिक सहायता मिलेगी, वहाँ बाल श्रम की परिस्थितियों को कम करने की संभावना बढ़ेगी।
समाज की भूमिका - बाल श्रम को समाप्त करना केवल सरकार का काम नहीं है। यदि किसी होटल, दुकान, गैराज, निर्माण स्थल या अन्य प्रतिष्ठान में कम उम्र का बच्चा काम करता दिखाई देता है, तो समाज को इसे सामान्य घटना मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। बाल श्रम के विरुद्ध जागरूकता का अर्थ केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट करना नहीं है। इसका अर्थ है— “बच्चे को मजदूर नहीं, अधिकारों वाले नागरिक के रूप में देखना।” हमें यह समझना होगा कि किसी बच्चे का बचपन वापस नहीं खरीदा जा सकता। जिस उम्र में शिक्षा और खेल होना चाहिए, उस उम्र में लगातार श्रम करने से बच्चे के भविष्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
कानून के विद्यार्थी के रूप में मेरी समझ -
एक कानून के विद्यार्थी के रूप में मुझे लगता है कि बाल श्रम का प्रश्न हमें कानून और समाज के बीच के संबंध को समझने का अवसर देता है।कानून किताब में लिखा हुआ नियम मात्र नहीं है। उसकी वास्तविक सफलता तब होती है जब वह समाज के कमजोर व्यक्ति तक सुरक्षा के रूप में पहुँचता है। बाल श्रम के मामले में वह कमजोर व्यक्ति एक बच्चा है—जिसके पास न आर्थिक शक्ति है, न सामाजिक प्रभाव और न ही अपने अधिकारों के लिए हमेशा स्वयं आवाज उठाने की क्षमता। इसलिए राज्य की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। हमें यह प्रश्न केवल नहीं पूछना चाहिए कि “बाल श्रम करने वाला बच्चा कौन है?”
हमें यह भी पूछना चाहिए—
“वह बच्चा स्कूल से बाहर क्यों है?”
“वह काम करने के लिए मजबूर क्यों हुआ?”
“उसके परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है?”
“उसे बचाने के बाद उसका भविष्य कौन सुनिश्चित करेगा?”
और सबसे महत्वपूर्ण—
“क्या हमारी व्यवस्था बच्चे को केवल काम से बाहर निकाल रही है, या वास्तव में उसके बचपन और भविष्य को वापस दे रही है
बाल श्रम पर सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका
1. M.C. Mehta v. State of Tamil Nadu, (1996) 6 SCC 756
यह बाल श्रम पर सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। मामला मुख्यतः सिवाकासी के पटाखा और माचिस उद्योग में बाल श्रम से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खतरनाक कार्यों से बचाना और उन्हें शिक्षा उपलब्ध कराना संवैधानिक दायित्वों से जुड़ा है। कोर्ट ने बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए और उल्लंघन करने वाले नियोक्ता से प्रति बच्चे ₹20,000 मुआवजा लेने का निर्देश दिया।
“M.C. Mehta v. State of Tamil Nadu (1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल श्रम को केवल श्रम कानून के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे बच्चों के संवैधानिक अधिकारों, शिक्षा और स्वस्थ विकास से जोड़ा। न्यायालय ने बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए नियोक्ता से मुआवजे और शिक्षा सुनिश्चित करने संबंधी निर्देश दिए।”
2. Bandhua Mukti Morcha v. Union of India, (1997) 10 SCC 549
यह मामला कालीन उद्योग में बच्चों के शोषण और बंधुआ श्रम से संबंधित था। जांच में कम उम्र के बच्चों के अत्यधिक शोषण और कठिन परिस्थितियों में काम करने की स्थिति सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21, 24, 39(e), 39(f) और 45 को बाल संरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाल श्रम की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंध लगाने से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पुनर्वास और परिवार के सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ किया जाना चाहिए।
“Bandhua Mukti Morcha v. Union of India (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल श्रम को गरीबी, शोषण और सामाजिक असुरक्षा से जोड़कर देखा। न्यायालय ने बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और गरिमापूर्ण जीवन की आवश्यकता पर बल दिया।”
3. Bachpan Bachao Andolan v. Union of India, (2011) 5 SCC 1 यह मामला सर्कस में बच्चों के रोजगार, तस्करी और शोषण से संबंधित था। याचिका में बच्चों को जबरन सर्कस में रखने तथा उनके साथ शारीरिक और अन्य प्रकार के शोषण के आरोपों को उठाया गया था।
10 अक्टूबर 2006: घरेलू काम और ढाबों में बाल श्रम पर प्रतिबंध , भारत में बाल श्रम के विरुद्ध कानूनी संघर्ष में 10 अक्टूबर 2006 एक महत्वपूर्ण तारीख है। इस दिन केंद्र सरकार की अधिसूचना S.O. 1742(E) प्रभावी हुई, जिसके माध्यम से बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 की अनुसूची में कुछ नए व्यवसायों को जोड़ा गया। इस अधिसूचना के बाद 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू नौकर या घरेलू कामगार के रूप में नियोजित करना तथा ढाबों, सड़क किनारे भोजनालयों, रेस्टोरेंट, होटल, मोटल, चाय की दुकानों, रिसॉर्ट, स्पा और अन्य मनोरंजन केंद्रों में नियोजित करना प्रतिबंधित श्रेणी में आ गया। इस निर्णय का महत्व इसलिए भी था क्योंकि घरेलू काम और छोटे भोजनालयों जैसे क्षेत्रों में बाल श्रम अक्सर घरों और समाज की नजरों से छिपा रहता था। सरकार ने इन क्षेत्रों को प्रतिबंधित व्यवसायों की सूची में शामिल करके यह स्पष्ट किया कि बच्चे की कम उम्र का आर्थिक शोषण स्वीकार्य नहीं हो सकता। इस कदम के साथ केवल प्रतिबंध ही नहीं, बल्कि बचाए गए बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा पर भी जोर दिया गया। तत्कालीन सरकारी जानकारी में राज्यों से बच्चों को काम से हटाने के बाद उनके पुनर्वास में सहयोग करने का आग्रह किया गया था। इस प्रकार 10 अक्टूबर 2006 की अधिसूचना को भारत में बाल श्रम के खिलाफ कानूनी संरक्षण को व्यापक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
बाल श्रम के विरुद्ध समाज की भूमिका - बाल श्रम जैसी गंभीर सामाजिक समस्या को केवल कानून बनाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। कानून आवश्यक है, लेकिन उसकी सफलता तभी संभव है जब समाज, प्रशासन, स्वयंसेवी संगठन, शैक्षणिक संस्थान और प्रत्येक जागरूक नागरिक अपनी भूमिका निभाएँ। बाल श्रम के विरुद्ध संघर्ष केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
बाल श्रम के विरुद्ध संघर्ष में कोई भी समाजसेवी व्यक्ति या संगठन निम्नलिखित सकारात्मक योगदान प्रदान कर सकता है—
1. बाल श्रमिकों की पहचान और सूचना देना - अपने आसपास दुकानों, ढाबों, होटलों, कार्यशालाओं, घरेलू काम तथा अन्य स्थानों पर बच्चों से श्रम कराए जाने की जानकारी मिलने पर संबंधित श्रम विभाग, पुलिस अथवा बाल संरक्षण तंत्र को सूचना दी जा सकती है।
2. बच्चों को शिक्षा से जोड़ना - जो बच्चे आर्थिक कारणों से स्कूल छोड़ चुके हैं, उन्हें दोबारा विद्यालय से जोड़ने और उनकी शिक्षा जारी रखने में सहायता करना बाल श्रम के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक योगदानों में से एक है।
3. परिवारों को जागरूक करना - कई बार आर्थिक मजबूरी या जानकारी के अभाव में परिवार अपने बच्चों को काम पर भेज देते हैं। समाजसेवी संगठन परिवारों को बाल अधिकार, शिक्षा के अधिकार और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दे सकते हैं।
4. कानूनी जागरूकता अभियान - गाँवों, बस्तियों, स्कूलों, बाजारों और श्रमिक क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि बाल श्रम के संबंध में कानून क्या कहता है और उल्लंघन होने पर शिकायत कहाँ की जा सकती है।
5. बचाए गए बच्चों के पुनर्वास में सहयोग - बाल श्रमिक को केवल काम से मुक्त कराना पर्याप्त नहीं है। उसके बाद उसकी शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, परामर्श, परिवार से पुनर्मिलन और पुनर्वास की आवश्यकता होती है। समाजसेवी संगठन इस प्रक्रिया में प्रशासन के साथ सहयोग कर सकते हैं।
6. नियोक्ताओं में जागरूकता - दुकानदारों, होटल संचालकों, ढाबा मालिकों, ठेकेदारों और अन्य नियोक्ताओं को बाल श्रम से संबंधित कानूनी प्रावधानों की जानकारी देकर उन्हें कानून का पालन करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
7. स्कूल छोड़ने वाले बच्चों पर ध्यान - बाल श्रम को रोकने का एक प्रभावी तरीका यह भी है कि स्कूल से बाहर हो चुके बच्चों की पहचान की जाए। यदि कोई बच्चा लगातार स्कूल से अनुपस्थित है या पढ़ाई छोड़ चुका है, तो उसके परिवार की परिस्थितियों को समझकर उसे शिक्षा की मुख्यधारा में वापस लाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
8. बाल तस्करी और शोषण के विरुद्ध सहयोग - जहाँ बाल श्रम के साथ तस्करी, बंधुआ मजदूरी, हिंसा या अन्य प्रकार के शोषण की आशंका हो, वहाँ स्वयं कार्रवाई करने के बजाय संबंधित सक्षम अधिकारियों को तत्काल सूचना देना आवश्यक है।
9. जिम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका - हम सभी को यह समझना होगा कि किसी बच्चे को सस्ता श्रमिक समझने के बजाय उसे अधिकारों और गरिमा वाले नागरिक के रूप में देखना चाहिए। बाल श्रम को देखकर उसे सामान्य मान लेना भी समस्या को बढ़ावा देता है।
10. सामूहिक सामाजिक संकल्प - बाल श्रम के विरुद्ध सबसे प्रभावी संघर्ष तब संभव होगा जब समाज यह संकल्प ले कि—
“बच्चा मजदूर नहीं, विद्यार्थी है;
बच्चे के हाथ में औजार नहीं, किताब हो;
बच्चे का भविष्य मजदूरी नहीं, शिक्षा और सम्मान हो।”
इसलिए बाल श्रम के उन्मूलन के लिए आवश्यक है कि कानून का प्रभावी क्रियान्वयन और समाज की सक्रिय भागीदारी साथ-साथ चले। जब कानून की शक्ति और समाज की संवेदनशीलता एक साथ काम करेगी, तभी हम बच्चों को वास्तविक अर्थों में सुरक्षित, शिक्षित और गरिमापूर्ण बचपन दे सकेंगे।
निष्कर्ष - बाल श्रम केवल एक कानूनी उल्लंघन नहीं है। यह हमारे समाज के सामने मौजूद एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और मानवीय चुनौती है। भारत के संविधान ने बच्चों को शिक्षा, गरिमा और शोषण से सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण संवैधानिक संरक्षण दिया है। बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 में 2016 के संशोधन ने भी बाल और किशोर श्रम के संबंध में कानूनी व्यवस्था को मजबूत किया। लेकिन किसी भी कानून की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। बाल श्रम को समाप्त करने के लिए हमें कानून के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, परिवारों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही, प्रभावी निरीक्षण, पुनर्वास और सामाजिक जागरूकता पर काम करना होगा। अंततः, किसी देश का भविष्य उसके बच्चों से बनता है। इसलिए बच्चे के हाथ में औजार नहीं, किताब हो; मजदूरी की पर्ची नहीं, स्कूल की पहचान हो; और मजबूरी नहीं, अपने भविष्य का सपना हो। बाल श्रम रोकना केवल कानून का पालन करना नहीं है , यह बच्चे के बचपन, गरिमा और भविष्य की रक्षा करना है।
संदर्भ (References) - भारत का संविधान — अनुच्छेद 21A, 24, 39(e), 39(f) एवं 45। 1. The Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986 — विशेष रूप से धारा 3, 3A, 14 तथा संबंधित अनुसूची। India Code पर अधिनियम का वर्तमान पाठ उपलब्ध है। 2. The Child Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Act, 2016 , 2016 के संशोधन द्वारा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के रोजगार पर व्यापक प्रतिबंध तथा 14–18 वर्ष के किशोरों के खतरनाक व्यवसायों/प्रक्रियाओं में रोजगार पर प्रतिबंध की व्यवस्था की गई। 3. Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Rules, 2017 , बाल श्रम कानून के प्रभावी क्रियान्वयन तथा राज्य सरकारों एवं जिला अधिकारियों की जिम्मेदारियों से संबंधित नियम। प्रमुख न्यायिक निर्णय - 4. M.C. Mehta v. State of Tamil Nadu, (1996) 6 SCC 756; AIR 1997 SC 699 , बाल श्रम, शिक्षा, पुनर्वास और नियोक्ता की जिम्मेदारी से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय। 5. Bandhua Mukti Morcha v. Union of India, (1997) 10 SCC 549; AIR 1997 SC 2218 — बाल श्रम, बंधुआ श्रम, शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों के गरिमापूर्ण विकास से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय। 6. Bachpan Bachao Andolan v. Union of India, (2011) 5 SCC 1; AIR 2011 SC 3361 — सर्कस में बच्चों के शोषण, तस्करी और बाल अधिकारों के संरक्षण से संबंधित निर्णय। | 7. भारत सरकार की अधिसूचना, दिनांक 10 अक्टूबर 2006 — 1986 के अधिनियम की अनुसूची में घरेलू कामगार/नौकर तथा ढाबों, रेस्टोरेंट, होटल आदि में बच्चों के रोजगार से संबंधित प्रतिबंधित श्रेणियों को शामिल करने से संबंधित अधिसूचना। India Code के अधिनियम पृष्ठ पर 10 अक्टूबर 2006 की अधिसूचना सूचीबद्ध है। 8. India Code, Ministry of Law and Justice, Government of India — Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986. 9. Supreme Court Judgments / Indian Kanoon — M.C. Mehta, Bandhua Mukti Morcha और Bachpan Bachao Andolan के निर्णयों के पाठ के लिए। 10. Government of India, Ministry of Labour & Employment — बाल श्रम उन्मूलन और 2016 के संशोधन से संबंधित सरकारी सामग्री
Sunday, September 6, 2026
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सफेदपोश अपराध: - विकासशील भारत के सामने सबसे बड़ी अदृश्य चुनौती”
संजीव कुमार (लॉयर ) - भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक निवेश ने देश को नई दिशा दी है। लेकिन विकास की इस यात्रा के साथ एक ऐसी चुनौती भी बढ़ी है, जो सामान्य अपराधों की तरह दिखाई नहीं देती, फिर भी उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होता है। यह चुनौती है - सफेदपोश अपराध। सफेदपोश अपराध वह अपराध है, जो सामान्यतः सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित और आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्तियों द्वारा अपने व्यवसाय, पद अथवा
पेशेगत दायित्वों के दौरान किया जाता है। अपराधशास्त्री एडविन एच. सदरलैंड ने इस अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए बताया था कि अपराध केवल आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तक सीमित नहीं है; समाज का प्रभावशाली वर्ग भी कानून का उल्लंघन कर सकता है। आज यह सिद्धांत विश्वभर में आर्थिक अपराधों की समझ का आधार बन चुका है। सामान्य अपराध और सफेदपोश अपराध के बीच सबसे बड़ा अंतर उनके प्रभाव का है। यदि कोई व्यक्ति चोरी करता है तो नुकसान सीमित होता है, किंतु यदि किसी वित्तीय संस्था, कंपनी या सार्वजनिक व्यवस्था में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होती है तो उसका असर लाखों लोगों, निवेशकों, उपभोक्ताओं और सरकारी संसाधनों तक पहुँच सकता है। यही कारण है कि आर्थिक अपराधों को केवल वित्तीय हानि तक सीमित नहीं माना जाता; वे सार्वजनिक विश्वास और संस्थागत विश्वसनीयता को भी प्रभावित करते हैं। डिजिटल युग में सफेदपोश अपराधों का स्वरूप लगातार बदल रहा है। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने सुविधा बढ़ाई है, वहीं साइबर वित्तीय अपराधों की नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं। फर्जी निवेश योजनाएँ, डिजिटल पहचान की चोरी, साइबर धोखाधड़ी और वित्तीय डेटा का दुरुपयोग अब वैश्विक चिंता के विषय हैं। इनसे निपटने के लिए केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं; तकनीकी दक्षता और डिजिटल जागरूकता भी आवश्यक है। भारत में आर्थिक अपराधों से संबंधित अनेक विधिक प्रावधान मौजूद हैं। भ्रष्टाचार-निरोध, धन शोधन, कंपनी प्रशासन, उपभोक्ता संरक्षण, आयकर और साइबर अपराधों से जुड़े कानून समय-समय पर सुदृढ़ किए गए हैं। फिर भी चुनौती केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। समयबद्ध जांच, विशेषज्ञ अभियोजन, डिजिटल फॉरेंसिक और न्यायिक दक्षता इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सफेदपोश अपराधों की एक विशेषता यह भी है कि कई बार इनके पीड़ितों को तत्काल यह एहसास ही नहीं होता कि उनके साथ अपराध हुआ है। भ्रामक विज्ञापन, अनुचित व्यापारिक व्यवहार, निवेश के नाम पर छल या डिजिटल धोखाधड़ी धीरे-धीरे विश्वास को नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए नागरिकों की कानूनी जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी कि प्रभावी कानून व्यवस्था। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संविधान, न्यायालयों , के साथ नागरिकों के विश्वास में निहित होती है। यदि समाज को यह अनुभव होने लगे कि आर्थिक शक्ति या सामाजिक प्रतिष्ठा कानून से ऊपर है, तो विधि के शासन (Rule of Law) की अवधारणा कमजोर पड़ने लगती है। इसलिए यह आवश्यक है कि कानून का पालन सभी व्यक्तियों और संस्थाओं पर समान रूप से लागू हो। एक विधि छात्र के रूप में मेरा मानना है कि सफेदपोश अपराधों से मुकाबला केवल दंड के माध्यम से नहीं किया जा सकता। इसके लिए नैतिक व्यावसायिक संस्कृति, पारदर्शी प्रशासन, उत्तरदायी कॉर्पोरेट शासन, आधुनिक जांच प्रणाली और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी समान रूप से आवश्यक है। विधि शिक्षा का उद्देश्य भी केवल अधिनियमों का अध्ययन नहीं, बल्कि न्याय, उत्तरदायित्व और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सामाजिक चेतना विकसित करना है। भारत यदि विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो आर्थिक विकास के साथ-साथ ईमानदार शासन और उत्तरदायी संस्थाओं को भी समान महत्व देना होगा। विकास तभी सार्थक होगा, जब नागरिकों का विश्वास सुरक्षित रहेगा और कानून सभी पर समान रूप से लागू होगा। सफेदपोश अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का भी प्रश्न है।
Sunday, August 9, 2026
ज्ञान, न्याय और समाज को समझने की एक यात्रा
मैं संजीव कुमार हूँ — ज्ञान, न्याय और समाज को समझने की एक यात्रा
हर व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसे प्रश्न होते हैं, जो उसे लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। मेरे लिए भी जीवन केवल एक पेशा, एक डिग्री या एक पहचान तक सीमित नहीं है। मेरे लिए जीवन लगातार सीखने, समझने, प्रश्न करने, संवाद करने और समाज के लिए कुछ सार्थक करने की यात्रा है।
इतिहास से कानून तक-
इतिहास ने मुझे अतीत को देखने की दृष्टि दी और कानून ने वर्तमान को समझने का एक संवैधानिक रास्ता। इतिहास पढ़ते हुए मैंने महसूस किया कि किसी भी समाज को समझने के लिए केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। इतिहास के वास्तविक केंद्र में आम लोग भी होते हैं—उनका संघर्ष, उनकी संस्कृति, उनकी भाषा, उनकी आस्था, उनके अधिकार और उनकी अस्मिता। कानून की पढ़ाई ने इस सोच को एक नया आयाम दिया। संविधान, अधिकार, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा जैसे शब्द मेरे लिए केवल किताबों के विषय नहीं रहे। वे समाज को देखने और समझने के महत्वपूर्ण आधार बन गए।
इसीलिए मेरे लिए कानून केवल पेशा नहीं है; यह सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
एक अधिवक्ता के रूप में मेरी कोशिश है कि मैं कानून को केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित न रखूँ, बल्कि समाज में कानूनी जागरूकता और संवैधानिक चेतना को बढ़ाने में भी अपनी भूमिका निभाऊँ।
मैं स्वयं को एक curious learner मानता हूँ। मुझे पढ़ना, लिखना, सोचना, पढ़ाना और नए विषयों को समझना पसंद है।
मेरे लिए शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा पास करना या डिग्री प्राप्त करना नहीं है। शिक्षा व्यक्ति को प्रश्न करना सिखाती है। वह हमें अपनी धारणाओं को दोबारा देखने की क्षमता देती है। वह हमें दूसरे व्यक्ति के अनुभव को समझने की संवेदनशीलता देती है।
मेरा विश्वास है कि वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति को अधिक तार्किक, संवेदनशील, जिम्मेदार और मानवीय बनाए।
इसीलिए मैं जीवनभर सीखते रहने में विश्वास रखता हूँ। किताबें मेरे लिए केवल जानकारी का स्रोत नहीं हैं; वे मेरे लिए नए विचारों और नई दुनिया की खिड़कियाँ हैं।
मेरी रुचि केवल इतिहास और कानून तक सीमित नहीं है। मैं सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और मानवीय प्रश्नों पर विचार करना पसंद करता हूँ।
मुझे लगता है कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं होती। असली सवाल यह है कि उस समाज में सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।
क्या उसे सम्मान मिलता है?
क्या उसे न्याय मिलता है?
क्या उसे अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है?
क्या उसके साथ समान व्यवहार होता है?
क्या उसे अपने अधिकारों की जानकारी है?
मेरे लिए सामाजिक न्याय इन्हीं प्रश्नों से शुरू होता है।
मैं आर्थिक न्याय, सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय और लैंगिक न्याय को एक न्यायपूर्ण समाज के आवश्यक स्तंभ मानता हूँ। मेरा विश्वास है कि समानता केवल कानून की किताब में लिखी हुई अवधारणा नहीं होनी चाहिए; उसे समाज के वास्तविक जीवन में भी दिखाई देना चाहिए।
भारत का संविधान मेरे लिए केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है। यह उस भारत की कल्पना प्रस्तुत करता है जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता केवल आदर्श शब्द न रह जाएँ, बल्कि लोगों के जीवन का हिस्सा बनें।
एक अधिवक्ता के रूप में मेरी जिम्मेदारी है कि मैं कानून को समझूँ, उसका ईमानदारी से उपयोग करूँ और जहाँ संभव हो, लोगों को उनके अधिकारों तथा कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति जागरूक करूँ।
मैं मानता हूँ कि न्याय तक पहुँच केवल उन लोगों तक सीमित नहीं होनी चाहिए जिनके पास संसाधन, प्रभाव या जानकारी है। न्याय व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब समाज का सामान्य व्यक्ति भी अपने अधिकारों और कानून को समझ सके।
पढ़ने और लिखने के साथ-साथ यात्रा करना मेरा एक पुराना सपना है।
मैं भारत को केवल नक्शे पर बने राज्यों और जिलों के रूप में नहीं देखना चाहता। मैं उसके गाँवों, पहाड़ों, नदियों, ऐतिहासिक स्थलों, लोक परंपराओं और लोगों के माध्यम से भारत को समझना चाहता हूँ।
भारत की असली कहानी केवल प्रसिद्ध स्मारकों में नहीं मिलती। वह छोटे गाँवों में भी मिलती है, पुराने मंदिरों और स्मारकों में भी मिलती है, लोकगीतों में भी मिलती है और उन लोगों की स्मृतियों में भी मिलती है जिनकी कहानियाँ इतिहास की मुख्यधारा में अक्सर दर्ज नहीं हो पातीं।
मेरे लिए यात्रा का अर्थ केवल किसी नई जगह पर पहुँचना नहीं है। यात्रा का अर्थ है—नई जगह को समझना, नए लोगों से मिलना और अपनी सोच को विस्तृत करना।
मुझे लिखना पसंद है क्योंकि लिखना मेरे लिए विचारों को व्यवस्थित करने का माध्यम है।
कई बार किसी विषय को हम केवल इसलिए नहीं समझ पाते क्योंकि हमने उसके बारे में गंभीरता से सोचा नहीं होता। लिखने से विचारों के बीच संबंध दिखाई देने लगते हैं।
इसी तरह संवाद भी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मैं अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों से बातचीत में विश्वास करता हूँ। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति हो सकती है—यदि हम असहमति को सम्मान के साथ स्वीकार करना सीखें।
मेरा प्रयास है कि मेरे शब्द किसी व्यक्ति को सोचने के लिए प्रेरित करें, किसी प्रश्न को जन्म दें या किसी नए संवाद की शुरुआत करें।
मैं इस मंच को केवल अपनी व्यक्तिगत पहचान दिखाने का माध्यम नहीं मानता।
मैं चाहता हूँ कि यहाँ इतिहास, कानून, समाज, संस्कृति, यात्रा, किताबों, विचारों और मानवीय अनुभवों से जुड़े विषयों पर बातचीत हो।
मैं उन विषयों पर भी लिखना चाहता हूँ जिन पर अक्सर कम चर्चा होती है। इतिहास की अनसुनी कहानियाँ, समाज के हाशिये पर मौजूद लोगों के अनुभव, संविधान और कानून की सामान्य समझ, यात्राओं से मिले अनुभव और जीवन से सीखी गई छोटी-बड़ी बातें—ये सभी मेरे लेखन का हिस्सा होंगे।
यदि मेरी कोई बात किसी व्यक्ति को कुछ नया पढ़ने के लिए प्रेरित करती है, किसी विद्यार्थी को कोई नया प्रश्न सोचने पर मजबूर करती है, किसी व्यक्ति को अपने अधिकारों के बारे में जागरूक करती है या किसी के भीतर समाज के प्रति संवेदनशीलता पैदा करती है, तो मैं इसे अपने लेखन की सफलता मानूँगा।
मैं स्वभाव से एक cheerful और optimistic व्यक्ति हूँ।
मुझे विश्वास है कि दुनिया में समस्याएँ बहुत हैं, लेकिन समाधान की संभावनाएँ भी उतनी ही हैं। हमें केवल शिकायत करने वाले समाज की नहीं, बल्कि प्रश्न करने, समझने और समाधान खोजने वाले समाज की आवश्यकता है।
मेरा सपना किसी आदर्श दुनिया की कल्पना भर नहीं है। मैं एक ऐसे समाज की कल्पना करता हूँ जहाँ व्यक्ति की पहचान से पहले उसकी मानव गरिमा को महत्व मिले; जहाँ कानून सबके लिए समान हो; जहाँ शिक्षा सोचने की स्वतंत्रता दे; जहाँ महिलाओं को समान सम्मान और अवसर मिले; जहाँ कमजोर व्यक्ति अपनी आवाज़ उठा सके और जहाँ असहमति के लिए भी जगह हो।
मैं ऐसे समाज में विश्वास करता हूँ जिसकी नींव प्रेम, न्याय, समानता, स्वतंत्रता, बंधुता और मानव गरिमा पर हो।
मैं यह नहीं मानता कि मैंने सब कुछ सीख लिया है। बल्कि मैं यह मानता हूँ कि सीखने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।
इतिहास अभी बहुत कुछ बताना बाकी है।
कानून अभी बहुत कुछ समझना बाकी है।
समाज को अभी बहुत करीब से देखना बाकी है।
भारत, दुनिया अभी बहुत घूमना बाकी है।
और स्वयं को भी अभी बहुत समझना बाकी है।
शायद यही जीवन की सबसे खूबसूरत बात है — हम लगातार सीखते रहते हैं और हर नया अनुभव हमें थोड़ा और बेहतर इंसान बनने का अवसर देता है।
मैं इसी सीखने की यात्रा पर हूँ। किताबों के साथ, कानून के साथ, इतिहास के साथ, यात्राओं के साथ, समाज के साथ और सबसे बढ़कर—इंसानियत के साथ। यदि आप भी ज्ञान, इतिहास, कानून, समाज, यात्रा और विचारों की इस यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है।
आइए, पढ़ें। सोचें। सवाल करें। संवाद करें। और मिलकर एक अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की कल्पना करें।
Friday, July 10, 2026
"रिसेवाड़ा का प्राचीन मंदिर : दक्षिण कोसल की गौरवशाली विरासत और कांकेर की ऐतिहासिक धरोहर"
छत्तीसगढ़ का कांकेर जिला अपनी समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। इस
अंचल में अनेक ऐसे पुरातात्विक स्थल विद्यमान हैं, जो प्रदेश के प्राचीन इतिहास और स्थापत्य परंपरा के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। इन्हीं धरोहरों में ग्राम रिसेवाड़ा स्थित प्राचीन मंदिर एक अत्यंत महत्वपूर्ण, किंतु लंबे समय से उपेक्षित स्मारक है। यह मंदिर कांकेर–नरहरपुर मार्ग पर कांकेर नगर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्राम से खेतों और एक छोटी पहाड़ी को पार करने के बाद यह प्राचीन देवालय प्राकृतिक परिवेश के मध्य दिखाई देता है, जो अपने शांत वातावरण और प्राचीन स्वरूप के कारण प्रथम दृष्टि में ही इतिहास की अनुभूति कराता है।इतिहासकारों एवं पुरातत्वविदों के मतानुसार इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी शासनकाल (लगभग 11 वीं से 13 वीं शताब्दी ईस्वी) के दौरान हुआ माना जाता है। उस समय दक्षिण कोसल क्षेत्र में मंदिर निर्माण कला अपने उत्कर्ष पर थी और अनेक भव्य देवालयों का निर्माण हुआ था। रिसेवाड़ा का यह मंदिर उसी स्थापत्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रतीत होता है। इसकी निर्माण शैली, विशाल प्रस्तर खंडों का उपयोग, गर्भगृह की संरचना तथा शिल्पित पत्थरों पर उकेरी गई कलात्मक अभिव्यक्तियाँ तत्कालीन शिल्पकला की उच्च परिपक्वता को दर्शाती हैं।
यद्यपि समय, प्राकृतिक क्षरण तथा उपेक्षा के कारण मंदिर के कुछ भाग प्रभावित हो चुके हैं, फिर भी इसकी मूल स्थापत्य संरचना आज भी सुरक्षित दिखाई देती है। विशाल पत्थरों से निर्मित गर्भगृह, अलंकृत प्रवेशद्वार, कलात्मक प्रस्तर खंड तथा मंदिर की स्थापत्य योजना इस बात का प्रमाण हैं कि उस काल के शिल्पकार वास्तुकला और मूर्तिकला दोनों में अत्यंत दक्ष थे। यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मध्यकालीन दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक और स्थापत्य परंपरा का जीवंत दस्तावेज भी है।स्थल भ्रमण के दौरान स्थानीय निवासी श्री दुर्जन राम पटेल (55 वर्ष) से चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि यह मंदिर आज भी आसपास के ग्रामीणों की गहरी आस्था का केंद्र है। प्रतिदिन तथा विशेष अवसरों पर ग्रामीण यहां पूजा-अर्चना एवं दर्शन के लिए आते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कांकेर सहित अन्य क्षेत्रों से इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति में रुचि रखने वाले लोग भी इस प्राचीन मंदिर को देखने पहुंचते हैं।
दुर्जन राम पटेल के अनुसार, मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बावजूद इसके संरक्षण एवं जीर्णोद्धार के लिए आज तक प्रशासन द्वारा कोई प्रभावी पहल नहीं की गई है। समय के साथ मंदिर की संरचना लगातार क्षतिग्रस्त होती जा रही है, किन्तु इसके संरक्षण के लिए कोई ठोस कार्य धरातल पर दिखाई नहीं देता। यदि समय रहते इस धरोहर का वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में इसकी मूल संरचना और ऐतिहासिक स्वरूप को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 49 के अनुसार राज्य का यह दायित्व है कि राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थलों एवं कलात्मक वस्तुओं का संरक्षण किया जाए। मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) – अनुच्छेद 51A (च) भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना।इसके अतिरिक्त प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 तथा छत्तीसगढ़ प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1973 जैसी विधिक व्यवस्थाएँ भी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का प्रावधान करती हैं। यदि रिसेवाड़ा के इस मंदिर का विधिवत सर्वेक्षण कर इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया जाए, तो इसके संरक्षण, वैज्ञानिक जीर्णोद्धार तथा व्यवस्थित प्रबंधन का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
रिसेवाड़ा का प्राचीन मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि कांकेर जिले की ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक निरंतरता और स्थापत्य वैभव का महत्वपूर्ण प्रतीक है। ऐसे स्मारक समाज को उसके अतीत से जोड़ते हैं तथा भावी पीढ़ियों के लिए इतिहास का जीवंत स्रोत बनते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राज्य पुरातत्व विभाग तथा स्थानीय प्रशासन संयुक्त रूप से इस धरोहर का विस्तृत पुरातात्विक सर्वेक्षण कर संरक्षण, दस्तावेजीकरण एवं जीर्णोद्धार की दिशा में ठोस पहल करें।
यदि इस स्थल का वैज्ञानिक संरक्षण कर इसे पर्यटन मानचित्र से जोड़ा जाए, तो यह न केवल कांकेर जिले की ऐतिहासिक पहचान को नई ऊँचाई देगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
रिसेवाड़ा का प्राचीन मंदिर इतिहास, संस्कृति और भारतीय
स्थापत्य परंपरा की एक अमूल्य धरोहर है। यह केवल अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति, सभ्यता और ऐतिहासिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। समय की मांग है कि शासन, प्रशासन, पुरातत्व विभाग, जनप्रतिनिधि तथा समाज मिलकर इस धरोहर के संरक्षण का दायित्व निभाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस गौरवशाली विरासत को देख सकें, समझ सकें और अपने इतिहास पर गर्व कर सकें और क्षेत्र पर्यटन को बढावा मिल सके !
Saturday, July 4, 2026
राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय : बस्तर की माटी का वह दीप, जिसकी लौ आज भी समाज को आलोकित कर रही है.....!
राजमहंत स्व. श्री छोटुलाल मार्कंडेय : बस्तर की माटी का वह दीप, जिसकी लौ आज भी समाज को आलोकित कर रही है
लेख - संजीव कुमार कहानी की शुरुआत इंस्पेक्टर देशराज से होती है, जो अपनी वर्दी और पद का इस्तेमाल कानून की रक्षा के बजाय भ्रष्टाचार और व्यक्...



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