बाल श्रम के विरुद्ध एक सामाजिक और कानूनी संघर्ष -
“जिस उम्र में बच्चे के हाथ में किताब और कलम होनी चाहिए, उस उम्र में यदि उसके हाथ में औजार, ईंट, बर्तन या बोझ हो, तो यह केवल गरीबी की तस्वीर नहीं है — यह समाज और व्यवस्था के सामने एक गंभीर प्रश्न है।”
बाल श्रम भारत की उन सामाजिक समस्याओं में से एक है, जिसका समाधान केवल कानून बनाने से संभव नहीं है। बाल श्रम के पीछे गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, पारिवारिक परिस्थितियाँ और सस्ते श्रम की मांग जैसे अनेक कारण जुड़े हुए हैं। इसलिए बाल श्रम को केवल “बच्चे के काम करने” की घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह बच्चे के शिक्षा के अधिकार, गरिमा, स्वास्थ्य, विकास और सुरक्षित बचपन से जुड़ा हुआ प्रश्न है। एक कानून के छात्र के रूप में जब हम बाल श्रम को देखते हैं, तो हमारे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न आता है जब भारत में बाल श्रम के विरुद्ध संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपलब्ध है, तब भी बच्चे श्रम करने के लिए मजबूर क्यों हैं?
बाल श्रम क्या है? सामान्य अर्थ में बाल श्रम से आशय ऐसे कार्य से है जिसमें कम उम्र के बच्चों को उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामान्य विकास की कीमत पर काम करने के लिए लगाया जाता है। भारत में बाल श्रम की कानूनी व्यवस्था को समझने के लिए बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986, जिसे 2016 में महत्वपूर्ण रूप से संशोधित किया गया, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 2016 के संशोधन के बाद कानून में “बालक” और “किशोर” के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है। बालक से आशय ऐसे व्यक्ति से है जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है, जबकि किशोर वह है जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी कर ली है लेकिन 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों आयु वर्गों के लिए कानून में अलग-अलग प्रतिबंध निर्धारित किए गए हैं।
संविधान और बाल अधिकार , बाल श्रम के खिलाफ भारत की संवैधानिक व्यवस्था काफी महत्वपूर्ण है।
अनुच्छेद 21A — शिक्षा का मौलिक अधिकार - भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21A 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। इसका सीधा संबंध बाल श्रम से है। यदि कोई बच्चा स्कूल जाने की उम्र में लगातार मजदूरी कर रहा है, तो उसका शिक्षा के अधिकार से वंचित होना एक गंभीर संवैधानिक चिंता बन जाता है। बच्चे को केवल स्कूल में प्रवेश मिल जाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि वह बच्चा स्कूल में जाए, पढ़ाई जारी रखे और सुरक्षित वातावरण में शिक्षा प्राप्त करे।
अनुच्छेद 24 — खतरनाक रोजगार से सुरक्षा संविधान का अनुच्छेद 24, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या अन्य खतरनाक रोजगार में नियोजित करने पर रोक लगाता है। यह प्रावधान इस बात को स्वीकार करता है कि बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अभी पूर्ण नहीं हुआ होता। इसलिए उन्हें ऐसे कार्यों से बचाना राज्य और समाज दोनों की जिम्मेदारी है जो उनके स्वास्थ्य और जीवन के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
अनुच्छेद 39(e) और 39(f) राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में भी बच्चों की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया गया है।
अनुच्छेद 39(e) राज्य को यह सुनिश्चित करने की दिशा देता है कि बच्चों की कम उम्र का दुरुपयोग न हो और उन्हें ऐसे काम में न लगाया जाए जो उनकी शक्ति और स्वास्थ्य के प्रतिकूल हो।
अनुच्छेद 39(f) बच्चों को स्वस्थ विकास, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ आगे बढ़ने के अवसर देने तथा उन्हें शोषण और नैतिक एवं भौतिक परित्याग से बचाने की बात करता है।
इस प्रकार संविधान बाल श्रम को केवल रोजगार का विषय नहीं मानता, बल्कि इसे बच्चे के समग्र विकास और गरिमा से जोड़ता है। बाल और किशोर श्रम अधिनियम, 1986 और 2016 का संशोधन - मूल रूप से 1986 में बनाए गए कानून का उद्देश्य कुछ व्यवसायों और प्रक्रियाओं में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाना तथा अन्य क्षेत्रों में उनके कार्य की परिस्थितियों को विनियमित करना था। लेकिन समय के साथ बाल अधिकारों की समझ विकसित हुई और 2016 में कानून में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। संशोधित कानून का नाम “बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986” किया गया। इसके तहत सामान्य सिद्धांत यह है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को रोजगार में लगाना प्रतिबंधित है। वहीं, 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों या प्रक्रियाओं में नियोजित करना प्रतिबंधित है। कानून में कुछ सीमित अपवाद भी हैं। उदाहरण के लिए, निर्धारित शर्तों के अधीन बच्चे द्वारा अपने परिवार या पारिवारिक उद्यम में सहायता करने तथा मनोरंजन उद्योग में बाल कलाकार के रूप में कार्य करने से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। इन अपवादों को इस प्रकार नहीं समझा जाना चाहिए कि बच्चे को उसकी शिक्षा और सुरक्षा की कीमत पर काम कराया जा सकता है।
कानून तो है, फिर बाल श्रम क्यों? यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
केवल कानून बना देने से बाल श्रम समाप्त नहीं होता। इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं।
1. गरीबी - गरीब परिवारों में बच्चे की आय कभी-कभी परिवार की आर्थिक जरूरत का हिस्सा बन जाती है। ऐसी स्थिति में परिवार शिक्षा की तुलना में तत्काल आय को प्राथमिकता दे सकता है। 2. शिक्षा से दूरी - यदि परिवार में शिक्षा को लेकर जागरूकता कम है, तो बच्चे को स्कूल भेजने के बजाय काम पर भेजना सामान्य समझ लिया जाता है। 3. सस्ता श्रम - कुछ क्षेत्रों में बच्चों को कम मजदूरी में काम पर रखने की प्रवृत्ति बाल श्रम को बढ़ावा देती है। यह न केवल बच्चे के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि वयस्क श्रमिकों के रोजगार और मजदूरी पर भी प्रभाव डाल सकता है। 4. कानून के क्रियान्वयन की चुनौती - कानून में प्रतिबंध होने के बावजूद वास्तविक चुनौती है पहचान, निरीक्षण, बचाव, पुनर्वास और निगरानी। , किसी बच्चे को काम से निकाल देना ही पर्याप्त समाधान नहीं है। यदि उसे वापस उसी गरीबी, असुरक्षा या पारिवारिक परिस्थिति में भेज दिया गया जिसके कारण वह काम पर आया था, तो उसके दोबारा बाल श्रम में जाने का खतरा बना रहता है।
दंड का प्रावधान - बाल श्रम कानून केवल नैतिक अपील नहीं करता, बल्कि उल्लंघन के लिए दंड का भी प्रावधान करता है। अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत कानून का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के लिए कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। बाल श्रम से संबंधित अपराधों में केवल दंड देना ही अंतिम उद्देश्य नहीं होना चाहिए। कानून का व्यापक उद्देश्य बच्चे को श्रम से निकालकर शिक्षा, सुरक्षा और पुनर्वास की ओर ले जाना होना चाहिए। यहीं पर कानून प्रवर्तन और सामाजिक कल्याण व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रशासन की जिम्मेदारी बाल श्रम को रोकने में जिला प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रशासन को केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने की बजाय सक्रिय निगरानी और रोकथाम पर भी ध्यान देना चाहिए।
इसके लिए—
संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण;
दुकानों, कार्यशालाओं, कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों की जांच;
स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की पहचान;
बाल श्रम की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई;
बचाए गए बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था;
परिवार को सामाजिक और आर्थिक सहायता से जोड़ना;
बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ना;
संबंधित विभागों के बीच समन्वय
जैसे कदम महत्वपूर्ण हैं।
बाल श्रम को समाप्त करने की जिम्मेदारी केवल श्रम विभाग की नहीं हो सकती। इसमें शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, पुलिस, जिला प्रशासन, स्थानीय निकाय, विद्यालय और समाज सभी की भूमिका है।
क्या केवल बच्चे को काम से छुड़ाना पर्याप्त है? मेरे विचार से नहीं।
एक कानून के विद्यार्थी के रूप में बाल श्रम के प्रश्न को केवल “नियोक्ता को दंडित करो” तक सीमित करके देखना अधूरा होगा। मान लीजिए किसी 12 वर्षीय बच्चे को एक दुकान से मुक्त करा लिया गया। यदि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं बदली, उसकी शिक्षा की व्यवस्था नहीं हुई और उसके पुनर्वास की निगरानी नहीं हुई, तो कुछ समय बाद वह बच्चा किसी दूसरे स्थान पर काम कर सकता है।
इसलिए प्रभावी व्यवस्था का सूत्र होना चाहिए:
पहचान → बचाव → शिक्षा → पुनर्वास → परिवार का सहयोग → निरंतर निगरानी
यही बाल श्रम उन्मूलन को स्थायी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टिकोण हो सकता है। बाल श्रम और शिक्षा बाल श्रम के विरुद्ध सबसे प्रभावी सामाजिक उपायों में शिक्षा महत्वपूर्ण है। एक बच्चा जब स्कूल जाता है, तो वह केवल किताबें नहीं पढ़ता। वह अपने अधिकारों, समाज, कानून और भविष्य के अवसरों को समझने की क्षमता विकसित करता है। इसलिए अनुच्छेद 21A और बाल श्रम कानून को अलग-अलग विषयों के रूप में देखने के बजाय एक-दूसरे से जुड़े अधिकारों के रूप में देखना चाहिए। जहाँ शिक्षा मजबूत होगी और परिवारों को सामाजिक-आर्थिक सहायता मिलेगी, वहाँ बाल श्रम की परिस्थितियों को कम करने की संभावना बढ़ेगी।
समाज की भूमिका - बाल श्रम को समाप्त करना केवल सरकार का काम नहीं है। यदि किसी होटल, दुकान, गैराज, निर्माण स्थल या अन्य प्रतिष्ठान में कम उम्र का बच्चा काम करता दिखाई देता है, तो समाज को इसे सामान्य घटना मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। बाल श्रम के विरुद्ध जागरूकता का अर्थ केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट करना नहीं है। इसका अर्थ है— “बच्चे को मजदूर नहीं, अधिकारों वाले नागरिक के रूप में देखना।” हमें यह समझना होगा कि किसी बच्चे का बचपन वापस नहीं खरीदा जा सकता। जिस उम्र में शिक्षा और खेल होना चाहिए, उस उम्र में लगातार श्रम करने से बच्चे के भविष्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
कानून के विद्यार्थी के रूप में मेरी समझ -
एक कानून के विद्यार्थी के रूप में मुझे लगता है कि बाल श्रम का प्रश्न हमें कानून और समाज के बीच के संबंध को समझने का अवसर देता है।कानून किताब में लिखा हुआ नियम मात्र नहीं है। उसकी वास्तविक सफलता तब होती है जब वह समाज के कमजोर व्यक्ति तक सुरक्षा के रूप में पहुँचता है। बाल श्रम के मामले में वह कमजोर व्यक्ति एक बच्चा है—जिसके पास न आर्थिक शक्ति है, न सामाजिक प्रभाव और न ही अपने अधिकारों के लिए हमेशा स्वयं आवाज उठाने की क्षमता। इसलिए राज्य की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। हमें यह प्रश्न केवल नहीं पूछना चाहिए कि “बाल श्रम करने वाला बच्चा कौन है?”
हमें यह भी पूछना चाहिए—
“वह बच्चा स्कूल से बाहर क्यों है?”
“वह काम करने के लिए मजबूर क्यों हुआ?”
“उसके परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है?”
“उसे बचाने के बाद उसका भविष्य कौन सुनिश्चित करेगा?”
और सबसे महत्वपूर्ण—
“क्या हमारी व्यवस्था बच्चे को केवल काम से बाहर निकाल रही है, या वास्तव में उसके बचपन और भविष्य को वापस दे रही है
बाल श्रम पर सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका
1. M.C. Mehta v. State of Tamil Nadu, (1996) 6 SCC 756
यह बाल श्रम पर सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। मामला मुख्यतः सिवाकासी के पटाखा और माचिस उद्योग में बाल श्रम से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खतरनाक कार्यों से बचाना और उन्हें शिक्षा उपलब्ध कराना संवैधानिक दायित्वों से जुड़ा है। कोर्ट ने बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए और उल्लंघन करने वाले नियोक्ता से प्रति बच्चे ₹20,000 मुआवजा लेने का निर्देश दिया।
“M.C. Mehta v. State of Tamil Nadu (1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल श्रम को केवल श्रम कानून के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे बच्चों के संवैधानिक अधिकारों, शिक्षा और स्वस्थ विकास से जोड़ा। न्यायालय ने बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए नियोक्ता से मुआवजे और शिक्षा सुनिश्चित करने संबंधी निर्देश दिए।”
2. Bandhua Mukti Morcha v. Union of India, (1997) 10 SCC 549
यह मामला कालीन उद्योग में बच्चों के शोषण और बंधुआ श्रम से संबंधित था। जांच में कम उम्र के बच्चों के अत्यधिक शोषण और कठिन परिस्थितियों में काम करने की स्थिति सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21, 24, 39(e), 39(f) और 45 को बाल संरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाल श्रम की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंध लगाने से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पुनर्वास और परिवार के सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ किया जाना चाहिए।
“Bandhua Mukti Morcha v. Union of India (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल श्रम को गरीबी, शोषण और सामाजिक असुरक्षा से जोड़कर देखा। न्यायालय ने बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और गरिमापूर्ण जीवन की आवश्यकता पर बल दिया।”
3. Bachpan Bachao Andolan v. Union of India, (2011) 5 SCC 1 यह मामला सर्कस में बच्चों के रोजगार, तस्करी और शोषण से संबंधित था। याचिका में बच्चों को जबरन सर्कस में रखने तथा उनके साथ शारीरिक और अन्य प्रकार के शोषण के आरोपों को उठाया गया था।
10 अक्टूबर 2006: घरेलू काम और ढाबों में बाल श्रम पर प्रतिबंध , भारत में बाल श्रम के विरुद्ध कानूनी संघर्ष में 10 अक्टूबर 2006 एक महत्वपूर्ण तारीख है। इस दिन केंद्र सरकार की अधिसूचना S.O. 1742(E) प्रभावी हुई, जिसके माध्यम से बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 की अनुसूची में कुछ नए व्यवसायों को जोड़ा गया। इस अधिसूचना के बाद 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू नौकर या घरेलू कामगार के रूप में नियोजित करना तथा ढाबों, सड़क किनारे भोजनालयों, रेस्टोरेंट, होटल, मोटल, चाय की दुकानों, रिसॉर्ट, स्पा और अन्य मनोरंजन केंद्रों में नियोजित करना प्रतिबंधित श्रेणी में आ गया। इस निर्णय का महत्व इसलिए भी था क्योंकि घरेलू काम और छोटे भोजनालयों जैसे क्षेत्रों में बाल श्रम अक्सर घरों और समाज की नजरों से छिपा रहता था। सरकार ने इन क्षेत्रों को प्रतिबंधित व्यवसायों की सूची में शामिल करके यह स्पष्ट किया कि बच्चे की कम उम्र का आर्थिक शोषण स्वीकार्य नहीं हो सकता। इस कदम के साथ केवल प्रतिबंध ही नहीं, बल्कि बचाए गए बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा पर भी जोर दिया गया। तत्कालीन सरकारी जानकारी में राज्यों से बच्चों को काम से हटाने के बाद उनके पुनर्वास में सहयोग करने का आग्रह किया गया था। इस प्रकार 10 अक्टूबर 2006 की अधिसूचना को भारत में बाल श्रम के खिलाफ कानूनी संरक्षण को व्यापक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
बाल श्रम के विरुद्ध समाज की भूमिका - बाल श्रम जैसी गंभीर सामाजिक समस्या को केवल कानून बनाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। कानून आवश्यक है, लेकिन उसकी सफलता तभी संभव है जब समाज, प्रशासन, स्वयंसेवी संगठन, शैक्षणिक संस्थान और प्रत्येक जागरूक नागरिक अपनी भूमिका निभाएँ। बाल श्रम के विरुद्ध संघर्ष केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
बाल श्रम के विरुद्ध संघर्ष में कोई भी समाजसेवी व्यक्ति या संगठन निम्नलिखित सकारात्मक योगदान प्रदान कर सकता है—
1. बाल श्रमिकों की पहचान और सूचना देना - अपने आसपास दुकानों, ढाबों, होटलों, कार्यशालाओं, घरेलू काम तथा अन्य स्थानों पर बच्चों से श्रम कराए जाने की जानकारी मिलने पर संबंधित श्रम विभाग, पुलिस अथवा बाल संरक्षण तंत्र को सूचना दी जा सकती है।
2. बच्चों को शिक्षा से जोड़ना - जो बच्चे आर्थिक कारणों से स्कूल छोड़ चुके हैं, उन्हें दोबारा विद्यालय से जोड़ने और उनकी शिक्षा जारी रखने में सहायता करना बाल श्रम के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक योगदानों में से एक है।
3. परिवारों को जागरूक करना - कई बार आर्थिक मजबूरी या जानकारी के अभाव में परिवार अपने बच्चों को काम पर भेज देते हैं। समाजसेवी संगठन परिवारों को बाल अधिकार, शिक्षा के अधिकार और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दे सकते हैं।
4. कानूनी जागरूकता अभियान - गाँवों, बस्तियों, स्कूलों, बाजारों और श्रमिक क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि बाल श्रम के संबंध में कानून क्या कहता है और उल्लंघन होने पर शिकायत कहाँ की जा सकती है।
5. बचाए गए बच्चों के पुनर्वास में सहयोग - बाल श्रमिक को केवल काम से मुक्त कराना पर्याप्त नहीं है। उसके बाद उसकी शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, परामर्श, परिवार से पुनर्मिलन और पुनर्वास की आवश्यकता होती है। समाजसेवी संगठन इस प्रक्रिया में प्रशासन के साथ सहयोग कर सकते हैं।
6. नियोक्ताओं में जागरूकता - दुकानदारों, होटल संचालकों, ढाबा मालिकों, ठेकेदारों और अन्य नियोक्ताओं को बाल श्रम से संबंधित कानूनी प्रावधानों की जानकारी देकर उन्हें कानून का पालन करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
7. स्कूल छोड़ने वाले बच्चों पर ध्यान - बाल श्रम को रोकने का एक प्रभावी तरीका यह भी है कि स्कूल से बाहर हो चुके बच्चों की पहचान की जाए। यदि कोई बच्चा लगातार स्कूल से अनुपस्थित है या पढ़ाई छोड़ चुका है, तो उसके परिवार की परिस्थितियों को समझकर उसे शिक्षा की मुख्यधारा में वापस लाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
8. बाल तस्करी और शोषण के विरुद्ध सहयोग - जहाँ बाल श्रम के साथ तस्करी, बंधुआ मजदूरी, हिंसा या अन्य प्रकार के शोषण की आशंका हो, वहाँ स्वयं कार्रवाई करने के बजाय संबंधित सक्षम अधिकारियों को तत्काल सूचना देना आवश्यक है।
9. जिम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका - हम सभी को यह समझना होगा कि किसी बच्चे को सस्ता श्रमिक समझने के बजाय उसे अधिकारों और गरिमा वाले नागरिक के रूप में देखना चाहिए। बाल श्रम को देखकर उसे सामान्य मान लेना भी समस्या को बढ़ावा देता है।
10. सामूहिक सामाजिक संकल्प - बाल श्रम के विरुद्ध सबसे प्रभावी संघर्ष तब संभव होगा जब समाज यह संकल्प ले कि—
“बच्चा मजदूर नहीं, विद्यार्थी है;
बच्चे के हाथ में औजार नहीं, किताब हो;
बच्चे का भविष्य मजदूरी नहीं, शिक्षा और सम्मान हो।”
इसलिए बाल श्रम के उन्मूलन के लिए आवश्यक है कि कानून का प्रभावी क्रियान्वयन और समाज की सक्रिय भागीदारी साथ-साथ चले। जब कानून की शक्ति और समाज की संवेदनशीलता एक साथ काम करेगी, तभी हम बच्चों को वास्तविक अर्थों में सुरक्षित, शिक्षित और गरिमापूर्ण बचपन दे सकेंगे।

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