Wednesday, September 30, 2026

बचपन मजदूरी के लिए नहीं, शिक्षा और सपनों के लिए है !

 बाल श्रम के विरुद्ध एक सामाजिक और कानूनी संघर्ष -   

“जिस उम्र में बच्चे के हाथ में किताब और कलम होनी चाहिए, उस उम्र में यदि उसके हाथ में औजार, ईंट, बर्तन या बोझ हो, तो यह केवल गरीबी की तस्वीर नहीं है — यह समाज और व्यवस्था के सामने एक गंभीर प्रश्न है।”


बाल श्रम भारत की उन सामाजिक समस्याओं में से एक है, जिसका समाधान केवल कानून बनाने से संभव नहीं है। बाल श्रम के पीछे गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, पारिवारिक परिस्थितियाँ और सस्ते श्रम की मांग जैसे अनेक कारण जुड़े हुए हैं। इसलिए बाल श्रम को केवल “बच्चे के काम करने” की घटना के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह बच्चे के शिक्षा के अधिकार, गरिमा, स्वास्थ्य, विकास और सुरक्षित बचपन से जुड़ा हुआ प्रश्न है।  एक कानून के छात्र  के रूप में जब हम बाल श्रम को देखते हैं, तो हमारे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न आता है जब भारत में बाल श्रम के विरुद्ध संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपलब्ध है, तब भी बच्चे श्रम करने के लिए मजबूर क्यों हैं?

बाल श्रम क्या है? सामान्य अर्थ में बाल श्रम से आशय ऐसे कार्य से है जिसमें कम उम्र के बच्चों को उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामान्य विकास की कीमत पर काम करने के लिए लगाया जाता है। भारत में बाल श्रम की कानूनी व्यवस्था को समझने के लिए बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986, जिसे 2016 में महत्वपूर्ण रूप से संशोधित किया गया, विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।   2016 के संशोधन के बाद कानून में “बालक” और “किशोर” के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है।  बालक से आशय ऐसे व्यक्ति से है जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है, जबकि किशोर वह है जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी कर ली है लेकिन 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की है। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों आयु वर्गों के लिए कानून में अलग-अलग प्रतिबंध निर्धारित किए गए हैं।

संविधान और बाल अधिकार   ,  बाल श्रम के खिलाफ भारत की संवैधानिक व्यवस्था काफी महत्वपूर्ण है।

अनुच्छेद 21A — शिक्षा का मौलिक अधिकार   -  भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21A 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है।  इसका सीधा संबंध बाल श्रम से है। यदि कोई बच्चा स्कूल जाने की उम्र में लगातार मजदूरी कर रहा है, तो उसका शिक्षा के अधिकार से वंचित होना एक गंभीर संवैधानिक चिंता बन जाता है। बच्चे को केवल स्कूल में प्रवेश मिल जाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि वह बच्चा स्कूल में जाए, पढ़ाई जारी रखे और सुरक्षित वातावरण में शिक्षा प्राप्त करे।

अनुच्छेद 24 — खतरनाक रोजगार से सुरक्षा  संविधान का अनुच्छेद 24, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या अन्य खतरनाक रोजगार में नियोजित करने पर रोक लगाता है।  यह प्रावधान इस बात को स्वीकार करता है कि बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अभी पूर्ण नहीं हुआ होता। इसलिए उन्हें ऐसे कार्यों से बचाना राज्य और समाज दोनों की जिम्मेदारी है जो उनके स्वास्थ्य और जीवन के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।

अनुच्छेद 39(e) और 39(f) राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में भी बच्चों की सुरक्षा पर विशेष जोर दिया गया है।

अनुच्छेद 39(e) राज्य को यह सुनिश्चित करने की दिशा देता है कि बच्चों की कम उम्र का दुरुपयोग न हो और उन्हें ऐसे काम में न लगाया जाए जो उनकी शक्ति और स्वास्थ्य के प्रतिकूल हो।

अनुच्छेद 39(f) बच्चों को स्वस्थ विकास, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ आगे बढ़ने के अवसर देने तथा उन्हें शोषण और नैतिक एवं भौतिक परित्याग से बचाने की बात करता है।

इस प्रकार संविधान बाल श्रम को केवल रोजगार का विषय नहीं मानता, बल्कि इसे बच्चे के समग्र विकास और गरिमा से जोड़ता है। बाल और किशोर श्रम अधिनियम, 1986 और 2016 का संशोधन -  मूल रूप से 1986 में बनाए गए कानून का उद्देश्य कुछ व्यवसायों और प्रक्रियाओं में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाना तथा अन्य क्षेत्रों में उनके कार्य की परिस्थितियों को विनियमित करना था। लेकिन समय के साथ बाल अधिकारों की समझ विकसित हुई और 2016 में कानून में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए।  संशोधित कानून का नाम “बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986” किया गया।   इसके तहत सामान्य सिद्धांत यह है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को रोजगार में लगाना प्रतिबंधित है। वहीं, 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक व्यवसायों या प्रक्रियाओं में नियोजित करना प्रतिबंधित है। कानून में कुछ सीमित अपवाद भी हैं। उदाहरण के लिए, निर्धारित शर्तों के अधीन बच्चे द्वारा अपने परिवार या पारिवारिक उद्यम में सहायता करने तथा मनोरंजन उद्योग में बाल कलाकार के रूप में कार्य करने से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। इन अपवादों को इस प्रकार नहीं समझा जाना चाहिए कि बच्चे को उसकी शिक्षा और सुरक्षा की कीमत पर काम कराया जा सकता है।

कानून तो है, फिर बाल श्रम क्यों?   यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

केवल कानून बना देने से बाल श्रम समाप्त नहीं होता। इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं।

1. गरीबी  - गरीब परिवारों में बच्चे की आय कभी-कभी परिवार की आर्थिक जरूरत का हिस्सा बन जाती है। ऐसी स्थिति में परिवार शिक्षा की तुलना में तत्काल आय को प्राथमिकता दे सकता है। 2. शिक्षा से दूरी - यदि परिवार में शिक्षा को लेकर जागरूकता कम है, तो बच्चे को स्कूल भेजने के बजाय काम पर भेजना सामान्य समझ लिया जाता है। 3. सस्ता श्रम - कुछ क्षेत्रों में बच्चों को कम मजदूरी में काम पर रखने की प्रवृत्ति बाल श्रम को बढ़ावा देती है। यह न केवल बच्चे के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि वयस्क श्रमिकों के रोजगार और मजदूरी पर भी प्रभाव डाल सकता है। 4. कानून के क्रियान्वयन की चुनौती  - कानून में प्रतिबंध होने के बावजूद वास्तविक चुनौती है  पहचान, निरीक्षण, बचाव, पुनर्वास और निगरानी।  , किसी बच्चे को काम से निकाल देना ही पर्याप्त समाधान नहीं है। यदि उसे वापस उसी गरीबी, असुरक्षा या पारिवारिक परिस्थिति में भेज दिया गया जिसके कारण वह काम पर आया था, तो उसके दोबारा बाल श्रम में जाने का खतरा बना रहता है।

दंड का प्रावधान -  बाल श्रम कानून केवल नैतिक अपील नहीं करता, बल्कि उल्लंघन के लिए दंड का भी प्रावधान करता है। अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत कानून का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के लिए कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।  बाल श्रम से संबंधित अपराधों में केवल दंड देना ही अंतिम उद्देश्य नहीं होना चाहिए। कानून का व्यापक उद्देश्य बच्चे को श्रम से निकालकर शिक्षा, सुरक्षा और पुनर्वास की ओर ले जाना होना चाहिए। यहीं पर कानून प्रवर्तन और सामाजिक कल्याण व्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।   प्रशासन की जिम्मेदारी  बाल श्रम को रोकने में जिला प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।  प्रशासन को केवल शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करने की बजाय सक्रिय निगरानी और रोकथाम पर भी ध्यान देना चाहिए।

इसके लिए—

  • संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण;

  • दुकानों, कार्यशालाओं, कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों की जांच;

  • स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की पहचान;

  • बाल श्रम की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई;

  • बचाए गए बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था;

  • परिवार को सामाजिक और आर्थिक सहायता से जोड़ना;

  • बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ना;

  • संबंधित विभागों के बीच समन्वय

जैसे कदम महत्वपूर्ण हैं।

बाल श्रम को समाप्त करने की जिम्मेदारी केवल श्रम विभाग की नहीं हो सकती। इसमें शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, पुलिस, जिला प्रशासन, स्थानीय निकाय, विद्यालय और समाज सभी की भूमिका है।

क्या केवल बच्चे को काम से छुड़ाना पर्याप्त है? मेरे विचार से नहीं।

एक कानून के विद्यार्थी के रूप में बाल श्रम के प्रश्न को केवल “नियोक्ता को दंडित करो” तक सीमित करके देखना अधूरा होगा।  मान लीजिए किसी 12 वर्षीय बच्चे को एक दुकान से मुक्त करा लिया गया। यदि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं बदली, उसकी शिक्षा की व्यवस्था नहीं हुई और उसके पुनर्वास की निगरानी नहीं हुई, तो कुछ समय बाद वह बच्चा किसी दूसरे स्थान पर काम कर सकता है।

इसलिए प्रभावी व्यवस्था का सूत्र होना चाहिए:

पहचान → बचाव → शिक्षा → पुनर्वास → परिवार का सहयोग → निरंतर निगरानी

यही बाल श्रम उन्मूलन को स्थायी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण दृष्टिकोण हो सकता है। बाल श्रम और शिक्षा  बाल श्रम के विरुद्ध सबसे प्रभावी सामाजिक उपायों में शिक्षा महत्वपूर्ण है।  एक बच्चा जब स्कूल जाता है, तो वह केवल किताबें नहीं पढ़ता। वह अपने अधिकारों, समाज, कानून और भविष्य के अवसरों को समझने की क्षमता विकसित करता है। इसलिए अनुच्छेद 21A और बाल श्रम कानून को अलग-अलग विषयों के रूप में देखने के बजाय एक-दूसरे से जुड़े अधिकारों के रूप में देखना चाहिए। जहाँ शिक्षा मजबूत होगी और परिवारों को सामाजिक-आर्थिक सहायता मिलेगी, वहाँ बाल श्रम की परिस्थितियों को कम करने की संभावना बढ़ेगी।

समाज की भूमिका -   बाल श्रम को समाप्त करना केवल सरकार का काम नहीं है। यदि किसी होटल, दुकान, गैराज, निर्माण स्थल या अन्य प्रतिष्ठान में कम उम्र का बच्चा काम करता दिखाई देता है, तो समाज को इसे सामान्य घटना मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। बाल श्रम के विरुद्ध जागरूकता का अर्थ केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट करना नहीं है। इसका अर्थ है—  “बच्चे को मजदूर नहीं, अधिकारों वाले नागरिक के रूप में देखना।”   हमें यह समझना होगा कि किसी बच्चे का बचपन वापस नहीं खरीदा जा सकता। जिस उम्र में शिक्षा और खेल होना चाहिए, उस उम्र में लगातार श्रम करने से बच्चे के भविष्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।

कानून के विद्यार्थी के रूप में मेरी समझ -

एक कानून के विद्यार्थी के रूप में मुझे लगता है कि बाल श्रम का प्रश्न हमें कानून और समाज के बीच के संबंध को समझने का अवसर देता है।कानून किताब में लिखा हुआ नियम मात्र नहीं है। उसकी वास्तविक सफलता तब होती है जब वह समाज के कमजोर व्यक्ति तक सुरक्षा के रूप में पहुँचता है।  बाल श्रम के मामले में वह कमजोर व्यक्ति एक बच्चा है—जिसके पास न आर्थिक शक्ति है, न सामाजिक प्रभाव और न ही अपने अधिकारों के लिए हमेशा स्वयं आवाज उठाने की क्षमता। इसलिए राज्य की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।  हमें यह प्रश्न केवल नहीं पूछना चाहिए कि “बाल श्रम करने वाला बच्चा कौन है?”

हमें यह भी पूछना चाहिए—

“वह बच्चा स्कूल से बाहर क्यों है?”

“वह काम करने के लिए मजबूर क्यों हुआ?”

“उसके परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है?”

“उसे बचाने के बाद उसका भविष्य कौन सुनिश्चित करेगा?”

और सबसे महत्वपूर्ण—

“क्या हमारी व्यवस्था बच्चे को केवल काम से बाहर निकाल रही है, या वास्तव में उसके बचपन और भविष्य को वापस दे रही है

बाल श्रम पर सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका

1. M.C. Mehta v. State of Tamil Nadu, (1996) 6 SCC 756

यह बाल श्रम पर सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक है। मामला मुख्यतः सिवाकासी के पटाखा और माचिस उद्योग में बाल श्रम से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को खतरनाक कार्यों से बचाना और उन्हें शिक्षा उपलब्ध कराना संवैधानिक दायित्वों से जुड़ा है। कोर्ट ने बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण निर्देश दिए और उल्लंघन करने वाले नियोक्ता से प्रति बच्चे ₹20,000 मुआवजा लेने का निर्देश दिया।

“M.C. Mehta v. State of Tamil Nadu (1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल श्रम को केवल श्रम कानून के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे बच्चों के संवैधानिक अधिकारों, शिक्षा और स्वस्थ विकास से जोड़ा। न्यायालय ने बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए नियोक्ता से मुआवजे और शिक्षा सुनिश्चित करने संबंधी निर्देश दिए।”

2. Bandhua Mukti Morcha v. Union of India, (1997) 10 SCC 549

यह मामला कालीन उद्योग में बच्चों के शोषण और बंधुआ श्रम से संबंधित था। जांच में कम उम्र के बच्चों के अत्यधिक शोषण और कठिन परिस्थितियों में काम करने की स्थिति सामने आई।  सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21, 24, 39(e), 39(f) और 45 को बाल संरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाल श्रम की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंध लगाने से नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पुनर्वास और परिवार के सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ किया जाना चाहिए।

“Bandhua Mukti Morcha v. Union of India (1997) में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल श्रम को गरीबी, शोषण और सामाजिक असुरक्षा से जोड़कर देखा। न्यायालय ने बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और गरिमापूर्ण जीवन की आवश्यकता पर बल दिया।”

3. Bachpan Bachao Andolan v. Union of India, (2011) 5 SCC 1  यह मामला सर्कस में बच्चों के रोजगार, तस्करी और शोषण से संबंधित था। याचिका में बच्चों को जबरन सर्कस में रखने तथा उनके साथ शारीरिक और अन्य प्रकार के शोषण के आरोपों को उठाया गया था।

10 अक्टूबर 2006: घरेलू काम और ढाबों में बाल श्रम पर प्रतिबंध , भारत में बाल श्रम के विरुद्ध कानूनी संघर्ष में 10 अक्टूबर 2006 एक महत्वपूर्ण तारीख है। इस दिन केंद्र सरकार की अधिसूचना S.O. 1742(E) प्रभावी हुई, जिसके माध्यम से बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 की अनुसूची में कुछ नए व्यवसायों को जोड़ा गया। इस अधिसूचना के बाद 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू नौकर या घरेलू कामगार के रूप में नियोजित करना तथा ढाबों, सड़क किनारे भोजनालयों, रेस्टोरेंट, होटल, मोटल, चाय की दुकानों, रिसॉर्ट, स्पा और अन्य मनोरंजन केंद्रों में नियोजित करना प्रतिबंधित श्रेणी में आ गया। इस निर्णय का महत्व इसलिए भी था क्योंकि घरेलू काम और छोटे भोजनालयों जैसे क्षेत्रों में बाल श्रम अक्सर घरों और समाज की नजरों से छिपा रहता था। सरकार ने इन क्षेत्रों को प्रतिबंधित व्यवसायों की सूची में शामिल करके यह स्पष्ट किया कि बच्चे की कम उम्र का आर्थिक शोषण स्वीकार्य नहीं हो सकता।  इस कदम के साथ केवल प्रतिबंध ही नहीं, बल्कि बचाए गए बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा पर भी जोर दिया गया। तत्कालीन सरकारी जानकारी में राज्यों से बच्चों को काम से हटाने के बाद उनके पुनर्वास में सहयोग करने का आग्रह किया गया था। इस प्रकार 10 अक्टूबर 2006 की अधिसूचना को भारत में बाल श्रम के खिलाफ कानूनी संरक्षण को व्यापक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।


बाल श्रम  के  विरुद्ध समाज की भूमिका -  बाल श्रम जैसी गंभीर सामाजिक समस्या को केवल कानून बनाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। कानून आवश्यक है, लेकिन उसकी सफलता तभी संभव है जब समाज, प्रशासन, स्वयंसेवी संगठन, शैक्षणिक संस्थान और प्रत्येक जागरूक नागरिक अपनी भूमिका निभाएँ। बाल श्रम के विरुद्ध संघर्ष केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

बाल श्रम के विरुद्ध संघर्ष में कोई भी समाजसेवी व्यक्ति या संगठन निम्नलिखित सकारात्मक योगदान प्रदान कर सकता है—

1. बाल श्रमिकों की पहचान और सूचना देना - अपने आसपास दुकानों, ढाबों, होटलों, कार्यशालाओं, घरेलू काम तथा अन्य स्थानों पर बच्चों से श्रम कराए जाने की जानकारी मिलने पर संबंधित श्रम विभाग, पुलिस अथवा बाल संरक्षण तंत्र को सूचना दी जा सकती है।

2. बच्चों को शिक्षा से जोड़ना - जो बच्चे आर्थिक कारणों से स्कूल छोड़ चुके हैं, उन्हें दोबारा विद्यालय से जोड़ने और उनकी शिक्षा जारी रखने में सहायता करना बाल श्रम के विरुद्ध सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक योगदानों में से एक है।

3. परिवारों को जागरूक करना - कई बार आर्थिक मजबूरी या जानकारी के अभाव में परिवार अपने बच्चों को काम पर भेज देते हैं। समाजसेवी संगठन परिवारों को बाल अधिकार, शिक्षा के अधिकार और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दे सकते हैं।

4. कानूनी जागरूकता अभियान - गाँवों, बस्तियों, स्कूलों, बाजारों और श्रमिक क्षेत्रों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि बाल श्रम के संबंध में कानून क्या कहता है और उल्लंघन होने पर शिकायत कहाँ की जा सकती है।

5. बचाए गए बच्चों के पुनर्वास में सहयोग - बाल श्रमिक को केवल काम से मुक्त कराना पर्याप्त नहीं है। उसके बाद उसकी शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, परामर्श, परिवार से पुनर्मिलन और पुनर्वास की आवश्यकता होती है। समाजसेवी संगठन इस प्रक्रिया में प्रशासन के साथ सहयोग कर सकते हैं।

6. नियोक्ताओं में जागरूकता - दुकानदारों, होटल संचालकों, ढाबा मालिकों, ठेकेदारों और अन्य नियोक्ताओं को बाल श्रम से संबंधित कानूनी प्रावधानों की जानकारी देकर उन्हें कानून का पालन करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

7. स्कूल छोड़ने वाले बच्चों पर ध्यान  - बाल श्रम को रोकने का एक प्रभावी तरीका यह भी है कि स्कूल से बाहर हो चुके बच्चों की पहचान की जाए। यदि कोई बच्चा लगातार स्कूल से अनुपस्थित है या पढ़ाई छोड़ चुका है, तो उसके परिवार की परिस्थितियों को समझकर उसे शिक्षा की मुख्यधारा में वापस लाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

8. बाल तस्करी और शोषण के विरुद्ध सहयोग - जहाँ बाल श्रम के साथ तस्करी, बंधुआ मजदूरी, हिंसा या अन्य प्रकार के शोषण की आशंका हो, वहाँ स्वयं कार्रवाई करने के बजाय संबंधित सक्षम अधिकारियों को तत्काल सूचना देना आवश्यक है।

9. जिम्मेदार नागरिक के रूप में भूमिका - हम सभी को यह समझना होगा कि किसी बच्चे को सस्ता श्रमिक समझने के बजाय उसे अधिकारों और गरिमा वाले नागरिक के रूप में देखना चाहिए। बाल श्रम को देखकर उसे सामान्य मान लेना भी समस्या को बढ़ावा देता है।

10. सामूहिक सामाजिक संकल्प  - बाल श्रम के विरुद्ध सबसे प्रभावी संघर्ष तब संभव होगा जब समाज यह संकल्प ले कि—

“बच्चा मजदूर नहीं, विद्यार्थी है;
बच्चे के हाथ में औजार नहीं, किताब हो;
बच्चे का भविष्य मजदूरी नहीं, शिक्षा और सम्मान हो।”

इसलिए बाल श्रम के उन्मूलन के लिए आवश्यक है कि कानून का प्रभावी क्रियान्वयन और समाज की सक्रिय भागीदारी साथ-साथ चले। जब कानून की शक्ति और समाज की संवेदनशीलता एक साथ काम करेगी, तभी हम बच्चों को वास्तविक अर्थों में सुरक्षित, शिक्षित और गरिमापूर्ण बचपन दे सकेंगे।

निष्कर्ष -  बाल श्रम केवल एक कानूनी उल्लंघन नहीं है। यह हमारे समाज के सामने मौजूद एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और मानवीय चुनौती है। भारत के संविधान ने बच्चों को शिक्षा, गरिमा और शोषण से सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण संवैधानिक संरक्षण दिया है। बाल और किशोर श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 में 2016 के संशोधन ने भी बाल और किशोर श्रम के संबंध में कानूनी व्यवस्था को मजबूत किया। लेकिन किसी भी कानून की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। बाल श्रम को समाप्त करने के लिए हमें कानून के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, परिवारों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा, प्रशासनिक जवाबदेही, प्रभावी निरीक्षण, पुनर्वास और सामाजिक जागरूकता पर काम करना होगा।  अंततः, किसी देश का भविष्य उसके बच्चों से बनता है। इसलिए बच्चे के हाथ में औजार नहीं, किताब हो; मजदूरी की पर्ची नहीं, स्कूल की पहचान हो; और मजबूरी नहीं, अपने भविष्य का सपना हो। बाल श्रम रोकना केवल कानून का पालन करना नहीं है , यह बच्चे के बचपन, गरिमा और भविष्य की रक्षा करना है।

संदर्भ (References) -   भारत का संविधान — अनुच्छेद 21A, 24, 39(e), 39(f) एवं 45। 1. The Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986 — विशेष रूप से धारा 3, 3A, 14 तथा संबंधित अनुसूची। India Code पर अधिनियम का वर्तमान पाठ उपलब्ध है। 2. The Child Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Act, 2016 ,  2016 के संशोधन द्वारा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के रोजगार पर व्यापक प्रतिबंध तथा 14–18 वर्ष के किशोरों के खतरनाक व्यवसायों/प्रक्रियाओं में रोजगार पर प्रतिबंध की व्यवस्था की गई। 3. Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Rules, 2017 ,  बाल श्रम कानून के प्रभावी क्रियान्वयन तथा राज्य सरकारों एवं जिला अधिकारियों की जिम्मेदारियों से संबंधित नियम। प्रमुख न्यायिक निर्णय  -  4. M.C. Mehta v. State of Tamil Nadu, (1996) 6 SCC 756; AIR 1997 SC 699 ,  बाल श्रम, शिक्षा, पुनर्वास और नियोक्ता की जिम्मेदारी से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय। 5. Bandhua Mukti Morcha v. Union of India, (1997) 10 SCC 549; AIR 1997 SC 2218 — बाल श्रम, बंधुआ श्रम, शिक्षा, स्वास्थ्य और बच्चों के गरिमापूर्ण विकास से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय। 6. Bachpan Bachao Andolan v. Union of India, (2011) 5 SCC 1; AIR 2011 SC 3361 — सर्कस में बच्चों के शोषण, तस्करी और बाल अधिकारों के संरक्षण से संबंधित निर्णय। | 7. भारत सरकार की अधिसूचना, दिनांक 10 अक्टूबर 2006 — 1986 के अधिनियम की अनुसूची में घरेलू कामगार/नौकर तथा ढाबों, रेस्टोरेंट, होटल आदि में बच्चों के रोजगार से संबंधित प्रतिबंधित श्रेणियों को शामिल करने से संबंधित अधिसूचना। India Code के अधिनियम पृष्ठ पर 10 अक्टूबर 2006 की अधिसूचना सूचीबद्ध है। 8. India Code, Ministry of Law and Justice, Government of India — Child and Adolescent Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986. 9. Supreme Court Judgments / Indian Kanoon — M.C. Mehta, Bandhua Mukti Morcha और Bachpan Bachao Andolan के निर्णयों के पाठ के लिए। 10. Government of India, Ministry of Labour & Employment — बाल श्रम उन्मूलन और 2016 के संशोधन से संबंधित सरकारी सामग्री



Sunday, September 6, 2026

1857 से बहुत पहले छत्तीसगढ़ में गूंज उठा था विद्रोह का स्वर: गैंदसिंह, गुरु बालक दास से वीर नारायण सिंह तक

लेखक: -  संजीव कुमार  
जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा होती है, तो इतिहास की किताबों में वर्ष 1857 को एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में याद किया जाता है। मेरठ से शुरू होकर दिल्ली, कानपुर, झांसी, अवध और देश के दूसरे हिस्सों तक फैले इस विद्रोह ने ब्रिटिश सत्ता की नींव को गहरी चुनौती दी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे, तात्या टोपे, कुंवर सिंह और बहादुर शाह जफर जैसे नाम इस संघर्ष के प्रतीक बन गए।

भारत के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेजी सत्ता और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ संघर्ष 1857 से कई दशक पहले शुरू हो चुके थे। विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय समाज ने जमीन, जंगल, आजीविका, स्वायत्तता और अपने सामाजिक जीवन पर बढ़ते बाहरी नियंत्रण का लगातार विरोध किया।
छत्तीसगढ़ भी इस प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण भूमि रहा है। आज जब हम छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता आंदोलन और आदिवासी इतिहास को देखते हैं, तो परलकोट के गैंदसिंह और सोनाखान के वीर नारायण सिंह दो ऐसे नाम हैं, जिनके संघर्षों को एक व्यापक ऐतिहासिक परंपरा के संदर्भ में समझना आवश्यक है। गैंदसिंह का परलकोट विद्रोह 1824-25 में हुआ — अर्थात 1857 के विद्रोह से लगभग तीन दशक पहले। वहीं वीर नारायण सिंह ने 1857 के दौर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया और दिसंबर 1857 में शहीद हुए। इसलिए छत्तीसगढ़ का इतिहास हमें बताता है कि यहां स्वतंत्रता और स्वशासन की आकांक्षा 1857 में अचानक पैदा नहीं हुई थी। इसकी जड़ें उससे बहुत पहले स्थानीय समाज के प्रतिरोध में दिखाई देती हैं। परलकोट: जहां 1857 से तीन दशक पहले उठी विद्रोह की आवाज छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर क्षेत्र में स्थित परलकोट का इतिहास आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में विशेष स्थान रखता है।
19वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में यह क्षेत्र बाहरी प्रशासनिक और आर्थिक हस्तक्षेप के बढ़ते दबाव का सामना कर रहा था। मराठा शासन, उसके कर्मचारियों तथा बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती राजनीतिक शक्ति ने स्थानीय व्यवस्था को प्रभावित किया। इसी वातावरण में हल्बा जनजाति के जमींदार गैंदसिंह एक महत्वपूर्ण स्थानीय नेता के रूप में सामने आए।  गैंदसिंह का संघर्ष केवल किसी व्यक्तिगत सत्ता या जमींदारी विवाद तक सीमित नहीं था। इसके पीछे स्थानीय जनता पर बढ़ते दबाव, आर्थिक शोषण और बाहरी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ असंतोष था। परलकोट और आसपास के अबूझमाड़ क्षेत्र के आदिवासियों ने इस हस्तक्षेप का प्रतिरोध किया। अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ आदिवासी समाज का संगठन परलकोट विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी—स्थानीय समुदाय का सामूहिक संगठन। आदिवासी समाज के पास आधुनिक हथियार नहीं थे। उनके पास पारंपरिक हथियार थे—धनुष, तीर और अन्य स्थानीय अस्त्र। लेकिन जंगल और पहाड़ी भूगोल उनकी ताकत था। विद्रोहियों ने प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय छापामार शैली अपनाई। छोटे-छोटे समूहों में निकलकर बाहरी अधिकारियों और शासन के सहयोगियों पर हमले किए जाते थे। स्थानीय सामाजिक संस्थाएं भी इस संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। आदिवासी समाज में गोटुल केवल सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था नहीं था; ऐसे समय में सामुदायिक संवाद और संगठन के लिए भी उसका महत्व था। परलकोट के संघर्ष के संदर्भ में गोटुल को रणनीतिक बैठकों और सामुदायिक निर्णयों से जोड़कर देखा जाता है। यह तथ्य हमें यह समझने में मदद करता है कि आदिवासी प्रतिरोध केवल हथियार उठाने की घटना नहीं था। उसके पीछे समाज को संगठित करने वाली अपनी संस्थाएं और सामुदायिक संरचनाएं भी थीं। महिलाओं की भूमिका भी रही महत्वपूर्ण परलकोट के संघर्ष की चर्चा करते समय एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—आदिवासी महिलाओं की भागीदारी। विद्रोह केवल पुरुषों तक सीमित नहीं था। स्थानीय समुदाय की महिलाएं भी संघर्ष में पुरुषों के साथ शामिल हुईं। यह तथ्य उस व्यापक धारणा को चुनौती देता है जिसमें स्वतंत्रता संघर्ष को केवल कुछ प्रसिद्ध पुरुष नेताओं की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। आदिवासी समाज में सामुदायिक जीवन और संघर्ष की प्रकृति ऐसी थी कि पूरा समुदाय किसी संकट का सामना सामूहिक रूप से करता था। इसलिए परलकोट विद्रोह को समझते समय हमें इसे केवल “गैंदसिंह का विद्रोह” कहकर समाप्त नहीं कर देना चाहिए। यह स्थानीय आदिवासी समाज के सामूहिक प्रतिरोध की कहानी भी है।गैंदसिंह की गिरफ्तारी और शहादत लगभग एक वर्ष तक चले इस संघर्ष ने ब्रिटिश प्रशासन को परेशान कर दिया। अंततः अंग्रेजी प्रशासन ने इस विद्रोह को दबाने के लिए सैन्य कार्रवाई का सहारा लिया। चांदा क्षेत्र से सैनिक बुलाए गए और जनवरी 1825 में परलकोट को घेर लिया गया। सोनाखान के जमींदार नारायण सिंह का नाम छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका संबंध  वीर नारायण सिंह   बिंझवार जनजाति से था। उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी संघर्षों से जुड़ी हुई थी। मराठा शासन के विस्तार के दौरान सोनाखान जमींदारी पर भी बाहरी राजनीतिक दबाव बढ़ा। नारायण सिंह ने इसी वातावरण में अपनी राजनीतिक चेतना विकसित की।1856 का अकाल और जनता के लिए अनाज 1856 में छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में भयंकर अकाल पड़ा। अकाल का सबसे अधिक प्रभाव गरीब किसानों, मजदूरों और आम जनता पर पड़ा। ऐसे समय में सोनाखान के जमींदार नारायण सिंह ने जनता की सहायता के लिए कदम उठाया। आलेखों और स्थानीय इतिहास परंपरा के अनुसार, उन्होंने एक व्यापारी के गोदाम में जमा अनाज को जनता के लिए उपलब्ध कराया और भूख से पीड़ित लोगों में उसका वितरण करवाया। आज के दृष्टिकोण से देखें तो यह घटना केवल अनाज वितरण की कहानी नहीं है। यह उस समय की शासन व्यवस्था और जनता की प्राथमिक जरूरतों के बीच मौजूद टकराव को भी दिखाती है। एक तरफ भूखी जनता थी और दूसरी तरफ अनाज का भंडार।
गैंदसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके कुछ ही दिनों बाद, 20 जनवरी 1825 को गैंदसिंह को फांसी दे दी गई। इस प्रकार परलकोट के इस आदिवासी नेता ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी शहादत 1857 से लगभग 32 वर्ष पहले हुई थी। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में 1857 के पूर्व के औपनिवेशिक विरोधी आंदोलनों की चर्चा में गैंदसिंह और परलकोट विद्रोह का विशेष महत्व है।
राजा गेंद सिंह जी , राजा गुरु बालक दास साहेब जी , वीर नारायण सिंह जी , गुरु बालकदास (जन्म 18 अगस्त 1805 ई. - मृत्यु 17 मार्च 1860 ई.) महान क्रांतिकारी, समाज सुधारक , युग पुरुष और मानवाधिकार के लिए सतनामी आंदोलन के प्रणेता व सतनाम धर्म के संस्थापक गुरु घासीदास जी के द्वितीय पुत्र तथा उत्तराधिकारी थे। गुरु बालकदास जी सतनामी आंदोलन के प्रमुख सेनापति थे। उनके महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण गुरु घासीदास जी के बाद सन 1850 मे सतनामियों का प्रमुख गुरु बनाया गया। गुरु बालकदास जी ने नेतृत्व संभालने के बाद सतनामी आंदोलन को पूर्व की भांति पुरे गति से आगे बढ़ाया। गुरु बालकदास जी का जन्म 18 अगस्त सन् 1805 ईं. को भारत के छत्तीसगढ़ मे स्थित गिरौद गांव मे गुरु घासीदास जी और सफूरा माता के पुत्र के रूप मे हुआ। राजा गुरु बालक दास जी के बड़ी बहन सहोद्रामाता तथा बड़ा भाई गुरु अमरदास थे। इनके ऊपर गुरु घासीदास जी के विचारों का प्रभाव बचपन से ही पड़ा था। इसलिए जब सन 1820 ईस्वी मे सतनामी आंदोलन प्रारंभ हुआ, तो गुरु बालकदास जी ने उसमे बढ़ चढ़कर अपना योगदान दिया और नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। गुरु बालकदास जी का विवाह ढारा नवलपुर (बेमेतरा) के निवासी सुनहरदास चतुर्वेदी की सुपुत्री व साहेब भुजबल महंत जी के बहन नीरा के साथ हुआ। बाद में गुरुजी ने चितेर सिलवट के बेटी राधा संग भी विवाह किये। गुरुबालकदास और राधा से उनके पुत्र साहेबदास जी का जन्म हुआ। और नीरा से गंगा व गलारा नाम की दो पुत्री का जन्म हुआ ! सतनामी आंदोलन 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध (विशेषकर 1820-1830 के मध्य) में गुरु घासीदास के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की धरती पर उपजा एक बहुआयामी विद्रोह था। यह केवल एक धार्मिक सुधार आंदोलन नहीं था, बल्कि जातिवाद, सामंतवाद, ब्रिटिश साम्राज्यवाद और लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध एक सशक्त प्रजातांत्रिक क्रांति थी। सतनामी आंदोलन में गुरु बालकदास जी ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, आत्मरक्षा के लिए अखाड़ा प्रथा समाज मे शुरू करवाया और सशक्त शस्त्र धारी सतनाम सेना बनाया जिन्होंने मराठा शोषण कारियों से आम जनता को सुरक्षा दी। गाँव-गॉंव जाकर रावटी लगाकर सतनाम के प्रचार किया जिससे कई जाति के लोग सतनामी बने। गुरु बालकदास जी हाथी और घोड़े का सवारी करते थे, हाथी का नाम - दुलरवा और घोड़ा का नाम - सांवल मणि था 
अंगरक्षक - गुरु बालकदास जी के बारह प्रमुख निजी अंगरक्षकों के नाम इस प्रकार है, 1. सरहा, 2. जोधाई, 3. लल्लू, 4. जगधर, 5. अमरसिंघ, 6. गुलाली उर्फ गुल्ली, 7. शोभित, 8. पतंगा, 9. वीरसिंघ, 10. रजई, 11. चंदा और 12. बराती। इन बारह अंगरक्षकों में गुरु बालकदास जी के निजी सुरक्षा दस्ते में सरहा को प्रमुख का जिम्मेदारी प्राप्त था। गुरु बालकदास जी को अपने इन अंगरक्षकों के प्रतिभा, साहस और युद्ध कला पर इतना भरोसा था कि उन्होंने उस समय गांव-गांव और लगभग हर सतनामी परिवारों में प्रशिक्षित खड़ैत होने के बावजूद अपने सुरक्षा के लिए अधिक सावधानी और प्रयास नहीं किया गुरु बालकदास जी का कार्यकाल 1850 ई. के बाद - गुरू घासीदासजी के देहावसान पश्चात सतनाम आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कौन हो के प्रश्न पर सतनाम संगठन-समाज में विचार-विमर्श हुआ। चूंकि गुरूघासीदास ने व्यक्ति महत्ता के स्थान पर समाज महत्ता पर जोर दिया था। समाज में गंभीर चर्चा के बाद यह तय हुआ कि सतनाम आन्दोलन को चलाने में गुरुघासीदास के साथ समाज - संगठन के शक्ति निर्माण में उनके द्वितीय पुत्र बालकदास ने बराबर का साथ नेतृत्व प्रदान किया था। इसलिए उन्हें ही गुरू मुखिया बनाया जाय। समाज के नेतृत्व के लिए कार्य कुशलता तथा नेतृत्व क्षमता को ही आधार माना जाएगा। किसी वंश परंपरा को नहीं। यह निर्णय कार्यक्षमता के आधार पर लिया गया, किसी वंशानुक्रम के तहत नहीं गुरु बालकदास और वीर नारायण सिंह गुरु बालकदास जी का प्रभाव आदिवासियों के ऊपर भी था। सोनाखान के आदिवासी नेता वीर नारायण सिंह से उनका मित्रतापूर्ण संबंध था। वीर नारायण सिंह ने अपने सशस्त्र लड़ाकों में गुरु बालकदास द्वारा स्थापित सतनाम सेना के प्रशिक्षित सेनानीयों को सम्मिलित किया था। वीर नारायण सिंह की पहली गिरफ्तारी के बाद वे रायपुर सेट्रंल जेल की दीवार फांद कर फरार होकर गुरु बालकदास के पास भंडारपुरी आए। गुरु बालकदास जी ने सतनाम सेना के द्वारा उसे सुरक्षित सोनाखान पहुंचवाया। 
मालिक मकबूजा कानून - सन 1857 मे भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सैन्य विद्रोह हुआ। जिसे इस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पुरी तरह विफल कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन कंपनी के हांथ से अपने अधिन कर लिया। सुव्यवस्थित रूप से शासन करने के लिए मालिक मकबूजा कानून लागू किया गया। जिसके तहत ऐसे काश्तकार जो अपने जमीनों पर सन 1840 से काश्तकारी कर रहे हो, उनको सर्वे के बाद मालिकाना हक देने का फैसला किया गया था। सतनामी आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ के लोगों ने पेशवाशाही मराठों के द्वारा अपने छिने हुए भूमि संपत्तियों पर दोबारा अधिकार कर लिया था। मैदानी क्षेत्र के लगभग आधे भूभाग पर अपने जनसंख्या सतनामियों का जनसंख्या छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों मे आधा था] के अनुपात मे कब्जा था। नये कानून से उन सभी भूमि संपत्तियों पर सतनामियों का कानून अधिकार होता।
राजा गुरु - मालिक मकबूजा कानून मे यह भी प्रावधान था, कि अगर कोई विवाद होता है। तो उस क्षेत्र के मान्य मुखिया के राय को महत्व देते हुए निर्णय लिया जाएगा। गुरु बालकदास को मैदानी इलाकों के आधी आबादी के लोग अपने गुरु और मुखिया मानती थी। नये कानूनी प्रावधान से उनका हैसियत किसी न्यायाधीश या राजा का तरह हो चुका था, इसलिए आमजन उन्हें राजा गुरु कहते थे। गुरु बालकदास जी के हत्या का षड्यंत्र मालिक मकबूजा कानून से जातिवादी सामंती ताकतों मे खलबली मच गया। क्योंकि वे जानते थे कि एक बार अगर सरकारी दस्तावेजों मे जमीनों के वास्तविक मालिकों का नाम दर्ज हो गया। तो उनको बेदखल नहीं कर सकते। वे गुरु बालकदास जी के रहते सतनामियों के विरुद्ध कुछ भी कार्यवाही नहीं कर सकते थे। छत्तीसगढ़ मे किसी का साहस नही था, की कोई उनको टेढ़ी नजर से भी देख सके। इसलिए सामंती तत्वों ने गुरु बालकदास जी के हत्या करने का राष्ट्रव्यापी षड़यंत्र किया। छत्तीसगढ़ से बाहर के अपराधी किस्म के लोगों को कहा गया कि छत्तीसगढ़ मे एक आदमी का हत्या करना है, और यहां के हजारों हजार एकड़ जमीन पर कब्जा करना है। बाहरी अपराधियों को छत्तीसगढ़ बुलाया गया उनको सैन्य प्रशिक्षण दिया गया।
गुरु बालकदास जी की हत्या - गुरु बालकदास जी बोड़सरा बाड़ा- बिलासपुर के देखरेख का जिम्मा अपने एक भरोसेमंद अंगरक्षक को सौंपकर रामत दौरा के लिए निकले। कुछ दिनों के बाद औराबांधा- मुंगेली मे रावटी (मीटिंग) का आयोजन किया गया। जिसमें गुरु बालकदास जी गये। गुरुबालकदास जी मध्यभारत के वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के मुंगेली जिला मुख्यालय से 8-10 किलोमीटर दूर ग्राम - औराबांधा के तारिख 16 मार्च सन् 1860 ई' की रात को रात्रि विश्राम कर रहे थे कि अचानक सैकड़ों की संख्या में हथियारबंद समूह ने उनको जान से मारने के उद्देश्य से प्राणघातक हमला कर दिया। सुरक्षा में तैनात सुरक्षा दस्ता ने हमलावरों के विरुद्ध मोर्चा संभाल लिया रात कई घण्टे तक उनके अंगरक्षकों ने हमलावरों को मुहतोड़ जवाब दिया। स्वयं गुरुबालकदास ने भी उनका डटकर मुकाबला किया। हमलावरों ने सुनियोजित व संगठित होकर गुरुबालकदासजी को लक्ष्य बनाकर हमला किया था। गुरुबालकदास के सुरक्षा दस्ते के प्रमुख सरहा और जोधाई सहित सभी अंगरक्षकों ने अपने पूरे क्षमता और युद्ध कौशल से हमलावरों से लड़ा। चूंकि दुश्मनों की संख्या बहुत ज्यादा था और उनका लक्ष्य सिर्फ गुरुबालकदास था। हमला कई बार किया गया गुरुबालकदास लड़ते-लड़ते घायल हो चुके थे। हमलावरों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। इसलिए अंत में उनको भागना पड़ा सभी संघर्षरत खड़ैत एक स्थान पर इकट्ठे हुए। उन्होंने गुरुबालकदास को सतनाम आंदोलन का प्रशासनिक मुख्यालय भंडारपुर ले जाना चाहा और वे औराबांधा से भण्डारपुर की ओर ले जाने लगे। कुछ दूर जाने के बाद गुप्तचरों ने खबर दिया कि गुरुबालकदास को भण्डारपुर ले जाना उचित नहीं होगा क्योंकि ऐसा अफवाह है, कि वहां मौजूद लोग गुरु बालकदास जी को वहां जीवित या मृत किसी भी स्थिति में नहीं देखना चाहते। सुरक्षा दस्ता के लोग आश्चर्यचकित हो गये क्योंकि औराबांधा में हुए घटनाक्रम की जानकारी इतना जल्दी भण्डारपुर पहुंचने और वहां से नकारात्मक प्रतिक्रिया आने की उम्मीद किसी को नहीं थी। इसके अलावा गुरुबालकदास जी के रहते और किसी को सतनाम आंदोलन का प्रमुख नहीं बनाया गया था, तो भण्डारपुर से किसने व किस अधिकार से गुरुबालकदासजी का भण्डारपुर प्रवेश प्रतिबंधित किया। सुरक्षा दस्ता भण्डारपुर जाने वाले रास्ते को बदलकर सतनाम आंदोलन का एक अन्य महत्वपूर्ण केन्द्र नवलपुर (वर्तमान बेमेतरा जिला मुख्यालय के 6 किलोमीटर निकट का स्थान) जाने लगा। लेकिन नवलपुर पहुंचने के 8 किलोमीटर पहले कोसा नामक गांव में 17 मार्च को गंभीर रूप से घायल गुरुबालकदासजी की मृत्यु हो गयी। अंगरक्षकों ने इतनी सूचना नवलपुर में मौजूद सतनाम आंदोलन के एक अन्य महानायक साहेब भुजबल महंत को दिया। साहेब भुजबल महंत स्वयं अपने खड़ैतों को लेकर कोसा पहुंचे और गुरुबालकदासजी के मृत शरीर को नवलपुर ले आये। यहां सतनाम आंदोलनकारियों ने उन्हें अंतिम सलामी दिया। उसके बाद ससम्मान उनके मृत शरीर को अंतिम कफन -दफन किया। इस तरह गुरुबालकदासजी अपने जिंदा रहते तक लोक समाज के मानवाधिकार, रोटी और सम्मान की रक्षा में जातिवादी सामन्ती तत्वों से संघर्ष करते हुए, 17 मार्च सन् 1860 ई. को शहीद हो गये ! गुरु बालकदास जी के शहादत के बाद की स्थिति गुरुबालकदास जी के हत्या के बाद भंडार से आगरदास को गुरुगद्दी पर बैठाया गया, उन्होंने गुरुबालकदास जी हत्या व समकालीन परिस्थितियों में सतनाम समाज संगठन का साथ नहीं दिया। बल्कि सतनाम-समाज संगठन की सर्वोच्च संस्था एवं उसकी संपत्ति पर अपना कब्जा करने विविध समाजघाती कार्य किये। जिससे सतनामियों को घातक परिणाम भोगना पड़ा। कुछ वर्षों के पश्चात गुरु बालकदास जी के एकमात्र पुत्र साहेबदास जी की भी संदिग्ध मृत्यु हो गई वे निःसंतान थे, साहेबदास और आगरदास के बीच विवादित बंटवारा हुआ था। 17 मार्च सन् 1860 ई. को गुरु बालकदास जी के शहादत के बाद सतनामियों का दमन शुरु हो गया। गुरु घासीदास, गुरु बालकदास के समय जिन लोगों ने अपनी भूमि व सम्पत्ति पर दोबारा कब्जा किया था, असमानतावादी विचारधारा को त्यागकर समतावादी समाज का निर्माण किया था। उनके खिलाफ चौतरफा दमन कर सतनामियों के हाथ से हजारों-हजार एकड़ भूमि और सम्पत्ति दमनकारियों के कब्जे में आता गया। सतनामियों का सबसे बड़ा ताकत उनका भूमि पर अधिकार और व्यापक एकता धीरे-धीरे खंडित होता गया। वीर नारायण सिंह: अकाल, अनाज और विद्रोह यदि गैंदसिंह का संघर्ष 1824-25 में छत्तीसगढ़ की धरती पर औपनिवेशिक हस्तक्षेप के खिलाफ प्रारंभिक बड़े आदिवासी प्रतिरोधों में दिखाई देता है, तो वीर नारायण सिंह का संघर्ष 1857 के दौर में इसी प्रतिरोध परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आता है। नारायण सिंह ने जनता के पक्ष में खड़े होने का निर्णय लिया। ब्रिटिश प्रशासन ने इसे कानून-व्यवस्था और शासन के खिलाफ चुनौती के रूप में देखा। परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल से निकलकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष नारायण सिंह को रायपुर जेल में रखा गया। लेकिन 1857 में देश के कई हिस्सों में विद्रोह की खबरें फैलने लगीं। इसी दौर में नारायण सिंह जेल से बाहर निकलने में सफल हुए और सोनाखान पहुंचे।वहां उन्होंने स्थानीय किसानों और मजदूरों को संगठित किया। उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया। यह वही समय था जब उत्तर भारत में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और अन्य नेता अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। इस प्रकार 1857 का विद्रोह केवल उत्तर भारत तक सीमित घटना नहीं था। उसकी प्रतिध्वनि छत्तीसगढ़ में भी सुनाई दी। सोनाखान से रायपुर तक: वीर नारायण सिंह की अंतिम यात्राब्रिटिश शासन ने नारायण सिंह के संघर्ष को गंभीर चुनौती माना। उनके नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने अंग्रेजी सत्ता का विरोध किया। अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में उन्हें फांसी दी गई।जिस स्थान पर उन्हें फांसी दी गई, वह आज जयस्तंभ चौक के नाम से जाना जाता है। उनकी शहादत छत्तीसगढ़ के 1857 के संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बन गई। बाद के वर्षों में उन्हें “वीर नारायण सिंह” के नाम से सम्मानपूर्वक याद किया गया गैंदसिंह और वीर नारायण सिंह को साथ पढ़ना क्यों जरूरी है? इतिहास को केवल अलग-अलग महान व्यक्तियों की जीवनी के रूप में पढ़ने से उसकी पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। गैंदसिंह और वीर नारायण सिंह के संघर्षों को एक साथ देखने पर छत्तीसगढ़ में प्रतिरोध की एक लंबी परंपरा दिखाई देती है। 1824-25 — परलकोट विद्रोह — गैंदसिंह से लेकर 1857 — सोनाखान संघर्ष — वीर नारायण सिंह तक एक ऐसी ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है जिसमें स्थानीय समाज बाहरी शासन और शोषण के विरुद्ध लगातार अपनी आवाज उठाता रहा। यह प्रतिरोध केवल अंग्रेजों के खिलाफ नहीं था। इसके पीछे जमीन, जंगल, संसाधनों, सम्मान, स्थानीय स्वायत्तता और सामाजिक जीवन पर बाहरी नियंत्रण का विरोध भी था। 1857 से पहले और बाद में बस्तर के अनेक विद्रोह परलकोट और सोनाखान की घटनाएं अकेली नहीं थीं। बस्तर और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर अनेक विद्रोह और प्रतिरोध हुए। इनमें स्थानीय सत्ता, मराठा प्रशासन, ब्रिटिश हस्तक्षेप, राजस्व व्यवस्था, जंगल पर नियंत्रण और बाहरी शोषण के खिलाफ विभिन्न रूपों में प्रतिरोध दिखाई देता है। ऐतिहासिक संदर्भों में जिन आंदोलनों का उल्लेख मिलता है, उनमें शामिल हैं
— हल्बा विद्रोह 1774 - 1779 भोपालपट्टनम संघर्ष — 1795 परलकोट विद्रोह — 1824-25 तारापुर विद्रोह — 1842-54 मेंरिया विद्रोह — 1842-1863 कोया विद्रोह — 1859 भूमकाल आंदोलन — 1910 इन आंदोलनों की प्रकृति और कारण एक-दूसरे से पूरी तरह समान नहीं थे। इसलिए इन्हें एक ही प्रकार का “स्वतंत्रता संग्राम” कहना ऐतिहासिक रूप से सावधानी की मांग करता है। लेकिन इन सभी में एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है—स्थानीय समाज द्वारा बाहरी हस्तक्षेप और शोषण का प्रतिरोध। भूमकाल: प्रतिरोध की परंपरा का एक बड़ा अध्याय 1910 का भूमकाल आंदोलन इस लंबी प्रतिरोध परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय था। गुंडाधुर जैसे नेताओं के नेतृत्व में बस्तर में ब्रिटिश प्रशासन और उससे जुड़ी शोषणकारी व्यवस्थाओं के खिलाफ व्यापक असंतोष सामने आया। भूमकाल का अर्थ ही है—भूमि का कम्पन या धरती का हिल उठना। यह नाम अपने आप में उस आंदोलन की व्यापकता और तीव्रता को व्यक्त करता है। यदि परलकोट में गैंदसिंह के नेतृत्व में आदिवासी समाज ने 1825 में प्रतिरोध किया था, तो लगभग 85 वर्ष बाद भूमकाल ने बस्तर में उसी व्यापक प्रतिरोध की एक नई अभिव्यक्ति प्रस्तुत की। इतिहास में आदिवासी विद्रोहों को पर्याप्त स्थान क्यों नहीं मिला? यह सवाल आज भी महत्वपूर्ण है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्यधारा इतिहास लंबे समय तक बड़े राजनीतिक नेताओं, शहरों, राजधानियों और संगठित राजनीतिक संस्थाओं के आसपास लिखा गया।लेकिन भारत का एक बड़ा हिस्सा गांवों, जंगलों और पहाड़ों में भी इतिहास बना रहा था। आदिवासी समाज ने अपने तरीके से औपनिवेशिक सत्ता का सामना किया। उनके पास अखबार नहीं थे। उनके पास आधुनिक राजनीतिक संगठन नहीं थे। उनके पास बड़े शहरों में राजनीतिक मंच नहीं थे। लेकिन उनके पास था— जंगल का ज्ञान, सामुदायिक एकता, स्थानीय संगठन और अपनी जमीन-जंगल के प्रति गहरा संबंध। इसीलिए आदिवासी विद्रोहों को केवल “स्थानीय उपद्रव” या “कानून-व्यवस्था की समस्या” के रूप में देखना इतिहास को अधूरा कर देता है। औपनिवेशिक अधिकारियों के दस्तावेजों में कई बार जिन आंदोलनों को “rebellion”, “disturbance” या “law and order problem” कहा गया, उन्हें आज स्थानीय समाज के दृष्टिकोण से पुनः पढ़ने की आवश्यकता है। स्वतंत्रता केवल 1857 में शुरू नहीं हुई , 1857 भारतीय इतिहास की एक महान घटना है। लेकिन भारत की स्वतंत्रता की चेतना उससे बहुत पहले अलग-अलग रूपों में विकसित हो रही थी। कहीं किसान विद्रोह कर रहे थे। ( परलकोट के राजा गेंद सिंह जी ) कहीं आदिवासी अपने जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। कहीं स्थानीय शासक औपनिवेशिक हस्तक्षेप का विरोध कर रहे थे। कहीं सैनिक अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हथियार उठा रहे थे। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को केवल 1857 से शुरू होने वाली एक सीधी रेखा के रूप में देखना इतिहास की जटिलता को कम कर देता है।छत्तीसगढ़ का इतिहास इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। गैंदसिंह और वीर नारायण सिंह की विरासत आज गैंदसिंह और वीर नारायण सिंह केवल इतिहास की किताबों के पात्र नहीं हैं। वे छत्तीसगढ़ की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। 20 जनवरी को गैंदसिंह की शहादत को स्मरण किया जाता है।चारामा स्थित शासकीय महाविद्यालय का नाम भी गैंदसिंह के सम्मान में रखा गया है। वहीं वीर नारायण सिंह के नाम पर नवा रायपुर स्थित अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम तथा महासमुंद जिले का कोडार जलाशय जैसे संस्थान उनके सम्मान को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन किसी शहीद को याद करने का सबसे बेहतर तरीका केवल उसके नाम पर भवन या संस्थान बना देना नहीं है। जरूरी यह है कि हम उसके संघर्ष की परिस्थितियों को समझें। गैंदसिंह क्यों लड़े? नारायण सिंह ने जनता के लिए अनाज क्यों बांटा? आदिवासी समाज बार-बार विद्रोह करने के लिए क्यों मजबूर हुआ? अंग्रेजी शासन और स्थानीय समाज के बीच संघर्ष किन कारणों से पैदा हुआ? इन सवालों को समझना ही उनके इतिहास को सही अर्थों में सम्मान देना है।  
निष्कर्ष: - छत्तीसगढ़ की मिट्टी में प्रतिरोध की लंबी परंपरा छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल राजाओं और राजधानियों का इतिहास नहीं है। यह उन किसानों का इतिहास भी है जिन्होंने शोषण का विरोध किया। यह उन आदिवासियों का इतिहास भी है जिन्होंने जंगल और जमीन पर अपने अधिकार की रक्षा की। यह उन महिलाओं का इतिहास भी है जिन्होंने संघर्ष में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाया। और यह उन शहीदों का इतिहास है जिन्होंने अपनी जान देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रतिरोध की स्मृति छोड़ी। गैंदसिंह की शहादत 1825 में हुई।
उसके लगभग तीन दशक बाद 1857 में वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी।इसके बाद भी बस्तर और छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रतिरोध की अनेक धाराएं बहती रहीं और अंततः 1910 के भूमकाल जैसे बड़े आंदोलनों में उनकी गूंज सुनाई दी।इसलिए जब हम छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संघर्ष की बात करें तो हमें केवल 1857 से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। हमें उससे पहले की उन आवाजों को भी सुनना होगा जो जंगलों, पहाड़ियों और गांवों से उठी थीं। परलकोट के गैंदसिंह से लेकर सोनाखान के वीर नारायण सिंह तक—यह केवल दो शहीदों की कहानी नहीं है। यह उस समाज की कहानी है जिसने अपने अस्तित्व, सम्मान, जमीन, जंगल और स्वायत्तता के लिए सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। और शायद इतिहास की सबसे बड़ी सीख यही है— स्वतंत्रता किसी एक दिन पैदा नहीं होती। वह वर्षों के संघर्ष, प्रतिरोध और बलिदान से आकार लेती है। गैंदसिंह को नमन। वीर नारायण सिंह को नमन।और उन तमाम ज्ञात-अज्ञात आदिवासी शहीदों को नमन, जिनके संघर्षों ने छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रतिरोध की परंपरा को जीवित रखा।

सफेदपोश अपराध: - विकासशील भारत के सामने सबसे बड़ी अदृश्य चुनौती”

संजीव कुमार (लॉयर ) - भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक निवेश ने देश को नई दिशा दी है। लेकिन विकास की इस यात्रा के साथ एक ऐसी चुनौती भी बढ़ी है, जो सामान्य अपराधों की तरह दिखाई नहीं देती, फिर भी उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होता है। यह चुनौती है - सफेदपोश अपराध। सफेदपोश अपराध वह अपराध है, जो सामान्यतः सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित और आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्तियों द्वारा अपने व्यवसाय, पद अथवा


पेशेगत दायित्वों के दौरान किया जाता है। अपराधशास्त्री एडविन एच. सदरलैंड ने इस अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए बताया था कि अपराध केवल आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तक सीमित नहीं है; समाज का प्रभावशाली वर्ग भी कानून का उल्लंघन कर सकता है। आज यह सिद्धांत विश्वभर में आर्थिक अपराधों की समझ का आधार बन चुका है। सामान्य अपराध और सफेदपोश अपराध के बीच सबसे बड़ा अंतर उनके प्रभाव का है। यदि कोई व्यक्ति चोरी करता है तो नुकसान सीमित होता है, किंतु यदि किसी वित्तीय संस्था, कंपनी या सार्वजनिक व्यवस्था में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होती है तो उसका असर लाखों लोगों, निवेशकों, उपभोक्ताओं और सरकारी संसाधनों तक पहुँच सकता है। यही कारण है कि आर्थिक अपराधों को केवल वित्तीय हानि तक सीमित नहीं माना जाता; वे सार्वजनिक विश्वास और संस्थागत विश्वसनीयता को भी प्रभावित करते हैं। डिजिटल युग में सफेदपोश अपराधों का स्वरूप लगातार बदल रहा है। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने सुविधा बढ़ाई है, वहीं साइबर वित्तीय अपराधों की नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न की हैं। फर्जी निवेश योजनाएँ, डिजिटल पहचान की चोरी, साइबर धोखाधड़ी और वित्तीय डेटा का दुरुपयोग अब वैश्विक चिंता के विषय हैं। इनसे निपटने के लिए केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं; तकनीकी दक्षता और डिजिटल जागरूकता भी आवश्यक है। भारत में आर्थिक अपराधों से संबंधित अनेक विधिक प्रावधान मौजूद हैं। भ्रष्टाचार-निरोध, धन शोधन, कंपनी प्रशासन, उपभोक्ता संरक्षण, आयकर और साइबर अपराधों से जुड़े कानून समय-समय पर सुदृढ़ किए गए हैं। फिर भी चुनौती केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। समयबद्ध जांच, विशेषज्ञ अभियोजन, डिजिटल फॉरेंसिक और न्यायिक दक्षता इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सफेदपोश अपराधों की एक विशेषता यह भी है कि कई बार इनके पीड़ितों को तत्काल यह एहसास ही नहीं होता कि उनके साथ अपराध हुआ है। भ्रामक विज्ञापन, अनुचित व्यापारिक व्यवहार, निवेश के नाम पर छल या डिजिटल धोखाधड़ी धीरे-धीरे विश्वास को नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए नागरिकों की कानूनी जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी कि प्रभावी कानून व्यवस्था। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संविधान, न्यायालयों , के साथ नागरिकों के विश्वास में निहित होती है। यदि समाज को यह अनुभव होने लगे कि आर्थिक शक्ति या सामाजिक प्रतिष्ठा कानून से ऊपर है, तो विधि के शासन (Rule of Law) की अवधारणा कमजोर पड़ने लगती है। इसलिए यह आवश्यक है कि कानून का पालन सभी व्यक्तियों और संस्थाओं पर समान रूप से लागू हो। एक विधि छात्र के रूप में मेरा मानना है कि सफेदपोश अपराधों से मुकाबला केवल दंड के माध्यम से नहीं किया जा सकता। इसके लिए नैतिक व्यावसायिक संस्कृति, पारदर्शी प्रशासन, उत्तरदायी कॉर्पोरेट शासन, आधुनिक जांच प्रणाली और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी समान रूप से आवश्यक है। विधि शिक्षा का उद्देश्य भी केवल अधिनियमों का अध्ययन नहीं, बल्कि न्याय, उत्तरदायित्व और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सामाजिक चेतना विकसित करना है। भारत यदि विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो आर्थिक विकास के साथ-साथ ईमानदार शासन और उत्तरदायी संस्थाओं को भी समान महत्व देना होगा। विकास तभी सार्थक होगा, जब नागरिकों का विश्वास सुरक्षित रहेगा और कानून सभी पर समान रूप से लागू होगा। सफेदपोश अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का भी प्रश्न है।

Sunday, August 9, 2026

ज्ञान, न्याय और समाज को समझने की एक यात्रा


मैं संजीव कुमार हूँ — ज्ञान, न्याय और समाज को समझने की एक यात्रा

हर व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसे प्रश्न होते हैं, जो उसे लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। मेरे लिए भी जीवन केवल एक पेशा, एक डिग्री या एक पहचान तक सीमित नहीं है। मेरे लिए जीवन लगातार सीखने, समझने, प्रश्न करने, संवाद करने और समाज के लिए कुछ सार्थक करने की यात्रा है। 

मेरा नाम संजीव कुमार है। मैं भारत का निवासी और पेशे से LAWYER  हूँ। मेरी शैक्षणिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कला, इतिहास और कानून से जुड़ा रहा है। मैंने इतिहास में M.A., विशेष रूप से मध्यकालीन भारतीय इतिहास में विशेषज्ञता के साथ, तथा LL.B. की शिक्षा पूरी की है। शायद यही कारण है कि मुझे समाज को केवल वर्तमान की घटनाओं के माध्यम से समझना पर्याप्त नहीं लगता। मैं यह जानने की कोशिश करता हूँ कि आज जो कुछ हमारे सामने है, उसकी जड़ें कहाँ हैं—हमारे इतिहास में, हमारी सामाजिक संरचनाओं में, हमारी संस्कृति में और हमारे कानूनों में।

इतिहास से कानून तक- 

इतिहास ने मुझे अतीत को देखने की दृष्टि दी और कानून ने वर्तमान को समझने का एक संवैधानिक रास्ता। इतिहास पढ़ते हुए मैंने महसूस किया कि किसी भी समाज को समझने के लिए केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। इतिहास के वास्तविक केंद्र में आम लोग भी होते हैं—उनका संघर्ष, उनकी संस्कृति, उनकी भाषा, उनकी आस्था, उनके अधिकार और उनकी अस्मिता। कानून की पढ़ाई ने इस सोच को एक नया आयाम दिया। संविधान, अधिकार, न्याय, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा जैसे शब्द मेरे लिए केवल किताबों के विषय नहीं रहे। वे समाज को देखने और समझने के महत्वपूर्ण आधार बन गए।

इसीलिए मेरे लिए कानून केवल पेशा नहीं है; यह सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

एक अधिवक्ता के रूप में मेरी कोशिश है कि मैं कानून को केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित न रखूँ, बल्कि समाज में कानूनी जागरूकता और संवैधानिक चेतना को बढ़ाने में भी अपनी भूमिका निभाऊँ।

शिक्षा मेरे लिए क्या है? 

मैं स्वयं को एक curious learner मानता हूँ। मुझे पढ़ना, लिखना, सोचना, पढ़ाना और नए विषयों को समझना पसंद है।

मेरे लिए शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा पास करना या डिग्री प्राप्त करना नहीं है। शिक्षा व्यक्ति को प्रश्न करना सिखाती है। वह हमें अपनी धारणाओं को दोबारा देखने की क्षमता देती है। वह हमें दूसरे व्यक्ति के अनुभव को समझने की संवेदनशीलता देती है।

मेरा विश्वास है कि वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति को अधिक तार्किक, संवेदनशील, जिम्मेदार और मानवीय बनाए।

इसीलिए मैं जीवनभर सीखते रहने में विश्वास रखता हूँ। किताबें मेरे लिए केवल जानकारी का स्रोत नहीं हैं; वे मेरे लिए नए विचारों और नई दुनिया की खिड़कियाँ हैं।

समाज और सामाजिक न्याय- 

मेरी रुचि केवल इतिहास और कानून तक सीमित नहीं है। मैं सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और मानवीय प्रश्नों पर विचार करना पसंद करता हूँ।

मुझे लगता है कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं होती। असली सवाल यह है कि उस समाज में सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।

क्या उसे सम्मान मिलता है?

क्या उसे न्याय मिलता है?

क्या उसे अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है?

क्या उसके साथ समान व्यवहार होता है?

क्या उसे अपने अधिकारों की जानकारी है?

मेरे लिए सामाजिक न्याय इन्हीं प्रश्नों से शुरू होता है।

मैं आर्थिक न्याय, सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय और लैंगिक न्याय को एक न्यायपूर्ण समाज के आवश्यक स्तंभ मानता हूँ। मेरा विश्वास है कि समानता केवल कानून की किताब में लिखी हुई अवधारणा नहीं होनी चाहिए; उसे समाज के वास्तविक जीवन में भी दिखाई देना चाहिए।

संविधान और न्याय- 

भारत का संविधान मेरे लिए केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है। यह उस भारत की कल्पना प्रस्तुत करता है जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता केवल आदर्श शब्द न रह जाएँ, बल्कि लोगों के जीवन का हिस्सा बनें।

एक अधिवक्ता के रूप में मेरी जिम्मेदारी है कि मैं कानून को समझूँ, उसका ईमानदारी से उपयोग करूँ और जहाँ संभव हो, लोगों को उनके अधिकारों तथा कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति जागरूक करूँ।

मैं मानता हूँ कि न्याय तक पहुँच केवल उन लोगों तक सीमित नहीं होनी चाहिए जिनके पास संसाधन, प्रभाव या जानकारी है। न्याय व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब समाज का सामान्य व्यक्ति भी अपने अधिकारों और कानून को समझ सके।

यात्रा — किताबों से बाहर की दुनिया- 

पढ़ने और लिखने के साथ-साथ यात्रा करना मेरा एक पुराना सपना है।

मैं भारत को केवल नक्शे पर बने राज्यों और जिलों के रूप में नहीं देखना चाहता। मैं उसके गाँवों, पहाड़ों, नदियों, ऐतिहासिक स्थलों, लोक परंपराओं और लोगों के माध्यम से भारत को समझना चाहता हूँ।

भारत की असली कहानी केवल प्रसिद्ध स्मारकों में नहीं मिलती। वह छोटे गाँवों में भी मिलती है, पुराने मंदिरों और स्मारकों में भी मिलती है, लोकगीतों में भी मिलती है और उन लोगों की स्मृतियों में भी मिलती है जिनकी कहानियाँ इतिहास की मुख्यधारा में अक्सर दर्ज नहीं हो पातीं।

मेरे लिए यात्रा का अर्थ केवल किसी नई जगह पर पहुँचना नहीं है। यात्रा का अर्थ है—नई जगह को समझना, नए लोगों से मिलना और अपनी सोच को विस्तृत करना।

लिखना और संवाद करना- 

मुझे लिखना पसंद है क्योंकि लिखना मेरे लिए विचारों को व्यवस्थित करने का माध्यम है।

कई बार किसी विषय को हम केवल इसलिए नहीं समझ पाते क्योंकि हमने उसके बारे में गंभीरता से सोचा नहीं होता। लिखने से विचारों के बीच संबंध दिखाई देने लगते हैं।

इसी तरह संवाद भी मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मैं अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों से बातचीत में विश्वास करता हूँ। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति हो सकती है—यदि हम असहमति को सम्मान के साथ स्वीकार करना सीखें।

मेरा प्रयास है कि मेरे शब्द किसी व्यक्ति को सोचने के लिए प्रेरित करें, किसी प्रश्न को जन्म दें या किसी नए संवाद की शुरुआत करें।

मेरा यह मंच- 

मैं इस मंच को केवल अपनी व्यक्तिगत पहचान दिखाने का माध्यम नहीं मानता।

मैं चाहता हूँ कि यहाँ इतिहास, कानून, समाज, संस्कृति, यात्रा, किताबों, विचारों और मानवीय अनुभवों से जुड़े विषयों पर बातचीत हो।

मैं उन विषयों पर भी लिखना चाहता हूँ जिन पर अक्सर कम चर्चा होती है। इतिहास की अनसुनी कहानियाँ, समाज के हाशिये पर मौजूद लोगों के अनुभव, संविधान और कानून की सामान्य समझ, यात्राओं से मिले अनुभव और जीवन से सीखी गई छोटी-बड़ी बातें—ये सभी मेरे लेखन का हिस्सा होंगे।

यदि मेरी कोई बात किसी व्यक्ति को कुछ नया पढ़ने के लिए प्रेरित करती है, किसी विद्यार्थी को कोई नया प्रश्न सोचने पर मजबूर करती है, किसी व्यक्ति को अपने अधिकारों के बारे में जागरूक करती है या किसी के भीतर समाज के प्रति संवेदनशीलता पैदा करती है, तो मैं इसे अपने लेखन की सफलता मानूँगा।

एक बेहतर समाज का सपना

मैं स्वभाव से एक cheerful और optimistic व्यक्ति हूँ।

मुझे विश्वास है कि दुनिया में समस्याएँ बहुत हैं, लेकिन समाधान की संभावनाएँ भी उतनी ही हैं। हमें केवल शिकायत करने वाले समाज की नहीं, बल्कि प्रश्न करने, समझने और समाधान खोजने वाले समाज की आवश्यकता है।

मेरा सपना किसी आदर्श दुनिया की कल्पना भर नहीं है। मैं एक ऐसे समाज की कल्पना करता हूँ जहाँ व्यक्ति की पहचान से पहले उसकी मानव गरिमा को महत्व मिले; जहाँ कानून सबके लिए समान हो; जहाँ शिक्षा सोचने की स्वतंत्रता दे; जहाँ महिलाओं को समान सम्मान और अवसर मिले; जहाँ कमजोर व्यक्ति अपनी आवाज़ उठा सके और जहाँ असहमति के लिए भी जगह हो।

मैं ऐसे समाज में विश्वास करता हूँ जिसकी नींव प्रेम, न्याय, समानता, स्वतंत्रता, बंधुता और मानव गरिमा पर हो।

मेरी यात्रा अभी जारी है - 

मैं यह नहीं मानता कि मैंने सब कुछ सीख लिया है। बल्कि मैं यह मानता हूँ कि सीखने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।

इतिहास अभी बहुत कुछ बताना बाकी है।
कानून अभी बहुत कुछ समझना बाकी है।
समाज को अभी बहुत करीब से देखना बाकी है।
भारत, दुनिया  अभी बहुत घूमना बाकी है।
और स्वयं को भी अभी बहुत समझना बाकी है।
शायद यही जीवन की सबसे खूबसूरत बात है — हम लगातार सीखते रहते हैं और हर नया अनुभव हमें थोड़ा और बेहतर इंसान बनने का अवसर देता है।

मैं इसी सीखने की यात्रा पर हूँ।  किताबों के साथ, कानून के साथ, इतिहास के साथ, यात्राओं के साथ, समाज के साथ और सबसे बढ़कर—इंसानियत के साथ। यदि आप भी ज्ञान, इतिहास, कानून, समाज, यात्रा और विचारों की इस यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो आपका स्वागत है।

आइए, पढ़ें। सोचें। सवाल करें। संवाद करें। और मिलकर एक अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की कल्पना करें।

— संजीव कुमार

Lawyer  | Historian | Learner | Writer 

Friday, July 10, 2026

"रिसेवाड़ा का प्राचीन मंदिर : दक्षिण कोसल की गौरवशाली विरासत और कांकेर की ऐतिहासिक धरोहर"

 छत्तीसगढ़ का कांकेर जिला अपनी समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। इस
अंचल में अनेक ऐसे पुरातात्विक स्थल विद्यमान हैं, जो प्रदेश के प्राचीन इतिहास और स्थापत्य परंपरा के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। इन्हीं धरोहरों में ग्राम रिसेवाड़ा स्थित प्राचीन मंदिर एक अत्यंत महत्वपूर्ण, किंतु लंबे समय से उपेक्षित स्मारक है। यह मंदिर कांकेर–नरहरपुर मार्ग पर कांकेर नगर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्राम से खेतों और एक छोटी पहाड़ी को पार करने के बाद यह प्राचीन देवालय प्राकृतिक परिवेश के मध्य दिखाई देता है, जो अपने शांत वातावरण और प्राचीन स्वरूप के कारण प्रथम दृष्टि में ही इतिहास की अनुभूति कराता है।

इतिहासकारों एवं पुरातत्वविदों के मतानुसार इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी शासनकाल (लगभग 11 वीं से 13 वीं शताब्दी ईस्वी) के दौरान हुआ माना जाता है। उस समय दक्षिण कोसल क्षेत्र में मंदिर निर्माण कला अपने उत्कर्ष पर थी और अनेक भव्य देवालयों का निर्माण हुआ था। रिसेवाड़ा का यह मंदिर उसी स्थापत्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रतीत होता है। इसकी निर्माण शैली, विशाल प्रस्तर खंडों का उपयोग, गर्भगृह की संरचना तथा शिल्पित पत्थरों पर उकेरी गई कलात्मक अभिव्यक्तियाँ तत्कालीन शिल्पकला की उच्च परिपक्वता को दर्शाती हैं।


यद्यपि समय, प्राकृतिक क्षरण तथा उपेक्षा के कारण मंदिर के कुछ भाग प्रभावित हो चुके हैं, फिर भी इसकी मूल स्थापत्य संरचना आज भी सुरक्षित दिखाई देती है। विशाल पत्थरों से निर्मित गर्भगृह, अलंकृत प्रवेशद्वार, कलात्मक प्रस्तर खंड तथा मंदिर की स्थापत्य योजना इस बात का प्रमाण हैं कि उस काल के शिल्पकार वास्तुकला और मूर्तिकला दोनों में अत्यंत दक्ष थे। यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मध्यकालीन दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक और स्थापत्य परंपरा का जीवंत दस्तावेज भी है।

स्थल भ्रमण के दौरान स्थानीय निवासी श्री दुर्जन राम पटेल (55 वर्ष) से चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि यह मंदिर आज भी आसपास के ग्रामीणों की गहरी आस्था का केंद्र है। प्रतिदिन तथा विशेष अवसरों पर ग्रामीण यहां पूजा-अर्चना एवं दर्शन के लिए आते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कांकेर सहित अन्य क्षेत्रों से इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति में रुचि रखने वाले लोग भी इस प्राचीन मंदिर को देखने पहुंचते हैं।

दुर्जन राम पटेल के अनुसार, मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बावजूद इसके संरक्षण एवं जीर्णोद्धार के लिए आज तक प्रशासन द्वारा कोई प्रभावी पहल नहीं की गई है। समय के साथ मंदिर की संरचना लगातार क्षतिग्रस्त होती जा रही है, किन्तु इसके संरक्षण के लिए कोई ठोस कार्य धरातल पर दिखाई नहीं देता। यदि समय रहते इस धरोहर का वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में इसकी मूल संरचना और ऐतिहासिक स्वरूप को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 49 के अनुसार राज्य का यह दायित्व है कि राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थलों एवं कलात्मक वस्तुओं का संरक्षण किया जाए। मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) – अनुच्छेद 51A (च) भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना।इसके अतिरिक्त प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 तथा छत्तीसगढ़ प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1973 जैसी विधिक व्यवस्थाएँ भी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का प्रावधान करती हैं। यदि रिसेवाड़ा के इस मंदिर का विधिवत सर्वेक्षण कर इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया जाए, तो इसके संरक्षण, वैज्ञानिक जीर्णोद्धार तथा व्यवस्थित प्रबंधन का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

रिसेवाड़ा का प्राचीन मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि कांकेर जिले की ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक निरंतरता और स्थापत्य वैभव का महत्वपूर्ण प्रतीक है। ऐसे स्मारक समाज को उसके अतीत से जोड़ते हैं तथा भावी पीढ़ियों के लिए इतिहास का जीवंत स्रोत बनते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राज्य पुरातत्व विभाग तथा स्थानीय प्रशासन संयुक्त रूप से इस धरोहर का विस्तृत पुरातात्विक सर्वेक्षण कर संरक्षण, दस्तावेजीकरण एवं जीर्णोद्धार की दिशा में ठोस पहल करें।

यदि इस स्थल का वैज्ञानिक संरक्षण कर इसे पर्यटन मानचित्र से जोड़ा जाए, तो यह न केवल कांकेर जिले की ऐतिहासिक पहचान को नई ऊँचाई देगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

रिसेवाड़ा का प्राचीन मंदिर इतिहास, संस्कृति और भारतीय


स्थापत्य परंपरा की एक अमूल्य धरोहर है। यह केवल अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति, सभ्यता और ऐतिहासिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। समय की मांग है कि शासन, प्रशासन, पुरातत्व विभाग, जनप्रतिनिधि तथा समाज मिलकर इस धरोहर के संरक्षण का दायित्व निभाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस गौरवशाली विरासत को देख सकें, समझ सकें और अपने इतिहास पर गर्व कर सकें और क्षेत्र पर्यटन को बढावा मिल सके ! 


 

Saturday, July 4, 2026

राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय : बस्तर की माटी का वह दीप, जिसकी लौ आज भी समाज को आलोकित कर रही है.....!

राजमहंत स्व. श्री छोटुलाल मार्कंडेय : बस्तर की माटी का वह दीप, जिसकी लौ आज भी समाज को आलोकित कर रही है

स्व श्री सी एल मार्कंडेय जी 
संजीव कुमार ~ इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों से नहीं बनता; इतिहास उन साधारण लोगों के असाधारण कर्मों से भी लिखा जाता है, जो अपने जीवन को समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर देते हैं। ऐसे ही युगद्रष्टा, कर्मयोगी और समाज सुधारक थे राजमहंत स्व. छोटूलाल मार्कंडेय। 3 जुलाई का दिन हमें उस महान व्यक्तित्व की स्मृतियों से जोड़ता है, जिसने अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा, सामाजिक समानता, मानव सेवा और जनजागरण के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन इस सत्य का साक्षी है कि व्यक्ति का कद उसके पद से नहीं, बल्कि उसके विचारों, कर्मों और समाज पर पड़े प्रभाव से मापा जाता है। 9 अप्रैल 1959 को छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के कोंडागांव में जन्मे राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय का बचपन सामान्य परिस्थितियों में बीता, किंतु उनके विचार और संकल्प असाधारण थे। पिता स्वर्गीय श्री के राम मार्कंडेय तथा माता श्रीमती केजा मार्कंडेय के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को करुणा, संवेदनशीलता और सेवा की भावना से समृद्ध किया। परिवार की दस संतानों में सबसे छोटे होने के कारण वे स्नेह से "छोटू" कहलाए, पर समय के साथ यही "छोटू" समाज के लिए एक बड़े विचार और महान प्रेरणा के रूप में स्थापित हुए। उन्होंने शिक्षा को केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना। शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने अनुभव किया कि जब तक समाज में ज्ञान का प्रकाश प्रत्येक घर तक नहीं पहुँचेगा, तब तक समानता, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की कल्पना अधूरी रहेगी। इसी उद्देश्य से उन्होंने स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त की और समाजशास्त्र का गंभीर अध्ययन किया, ताकि समाज की समस्याओं को समझकर उनके समाधान की दिशा में सार्थक प्रयास किए जा सकें। राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। वे शिक्षक, समाजशास्त्री, लेखक, गायक और सबसे बढ़कर एक संवेदनशील समाजसेवक थे। साहित्य और संगीत उनके लिए केवल अभिव्यक्ति के माध्यम नहीं थे, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने के सशक्त साधन थे। उनके शब्दों में प्रेरणा थी, उनके विचारों में परिवर्तन की शक्ति थी और उनके व्यक्तित्व में लोगों को साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने सामाजिक भेदभाव, अशिक्षा, रूढ़ियों और असमानता के विरुद्ध निरंतर आवाज़ उठाई। उनके विचारों, व्यक्तित्व और सामाजिक कार्यों पर बाबा गुरु घासीदास जी के दर्शन का अत्यंत गहरा प्रभाव था। बाबा गुरु घासीदास जी द्वारा प्रतिपादित "सतनाम", सत्य, समानता, मानवता, अहिंसा, सदाचार और समरसता के सिद्धांतों को उन्होंने अपने जीवन का मूल आधार बनाया। उनका दृढ़ विश्वास था कि सभी मनुष्य समान हैं तथा समाज की वास्तविक उन्नति तभी संभव है, जब जाति, ऊँच-नीच, छुआछूत और हर प्रकार के भेदभाव का पूर्णतः अंत हो। इसी मानवीय और समतामूलक विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने सतनामी समाज सहित समूचे समाज में संगठन, आत्मसम्मान, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और नैतिक मूल्यों का व्यापक संदेश पहुँचाया। उनके लिए समाज सेवा कोई अवसर या दायित्व मात्र नहीं, बल्कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य थी। वे मानते थे कि जिस समाज ने हमें पहचान, संस्कार और अस्तित्व दिया है, उसके विकास और उत्थान के लिए कार्य करना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है। उनके प्रत्येक सामाजिक अभियान, जनजागरण, शिक्षा-प्रसार और समाज सुधार के प्रयासों में बाबा गुरु घासीदास जी के मानवतावादी, समतावादी और सत्यनिष्ठ दर्शन की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। यही कारण था कि उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सत्य, सेवा, सद्भाव और समानता के मूल्यों को व्यवहार में उतारते हुए समाज के लिए प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी सादगी, विनम्रता और निष्काम सेवा ने उन्हें जन-जन के हृदय में स्थान दिलाया। वे मंचों पर जितने प्रभावशाली वक्ता थे, व्यवहार में उतने ही सहज और आत्मीय। वे लोगों की समस्याएँ सुनते थे, समाधान खोजते थे और बिना किसी स्वार्थ के समाज के बीच कार्य करते थे। यही कारण है कि उन्हें सम्मानपूर्वक "बस्तर माटी पुत्र" कहा गया। यह सम्मान किसी पद या पुरस्कार से नहीं, बल्कि जनता के प्रेम, विश्वास और सम्मान से प्राप्त हुआ। उनके जीवन की इस महान यात्रा में धर्म गुरु राजा गुरु बाल दास साहेब जी,  उनके परिवार और सहयोगियों का स्नेह, विश्वास तथा निरंतर सहयोग भी एक सुदृढ़ आधार रहा। उनके बड़े भाई श्री उदयलाल मार्कंडेय सदैव उनके अभिभावक, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत बने रहे। वहीं छोटे भाई एवं आत्मीय मित्र श्री आशाराम मार्कंडेय ने जीवन के प्रत्येक संघर्ष, सामाजिक अभियान और पारिवारिक दायित्वों में कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ निभाया। उनके बीच का संबंध केवल भाईचारे का नहीं, बल्कि समान विचारों, सामाजिक प्रतिबद्धता और अटूट विश्वास का प्रतीक था। इसी प्रकार उनके संघर्षपूर्ण सामाजिक जीवन में श्री राधाकृष्ण बंजारे   तथा श्री लखमूराम टंडन , सुर्यावंसी सर जी , शीतल मारे , श्री स्व डीपी घृतलहरे जी , राम दास मार्कंडेय , श्री गोविन्द कोसरे , एवं अन्य  समर्पित सहयोगियों का साथ भी अंतिम समय तक बना रहा। इन सभी साथियों ने समाज सेवा, जनजागरण और सामाजिक संगठन के कार्यों में उनके साथ निरंतर सक्रिय भूमिका निभाई। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी इनका विश्वास, सहयोग और आत्मीयता राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय जी के संकल्पों को नई शक्ति प्रदान करती रही। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि बड़े सामाजिक परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि परिवार, मित्रों और समर्पित सहयोगियों के सामूहिक विश्वास, परिश्रम और समर्पण से संभव होते हैं। 3 जुलाई 2004 को उनका पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, किंतु उनके विचार, उनके संस्कार और उनके द्वारा जलाया गया सामाजिक चेतना का दीप आज भी अनगिनत लोगों के जीवन को प्रकाशित कर रहा है। ऐसे व्यक्तित्व कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते वे अपने आदर्शों, कार्यों और प्रेरणाओं के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित एवं रहते हैं। आज, उनके स्मृति दिवस पर हम केवल उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित न करें, बल्कि उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लें। शिक्षा का दीप हर घर तक पहुँचे, समाज में समानता और भाईचारा सुदृढ़ हो, मानव सेवा जीवन का सर्वोच्च धर्म बने और नई पीढ़ी अपने इतिहास तथा महापुरुषों से प्रेरणा लेकर समाज निर्माण में अपना योगदान दे—यही राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय जी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनका जीवन हमें सिखाता है कि महानता जन्म से नहीं, कर्म से प्राप्त होती है। जो व्यक्ति अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए जीता है, वही समय की सीमाओं से परे जाकर अमर हो जाता है। राजमहंत स्व छोटूलाल मार्कंडेय ऐसे ही अमर व्यक्तित्व हैं, जिनकी स्मृति, प्रेरणा और विचार सदैव समाज का पथ आलोकित करते रहेंगे।

  बाल श्रम के विरुद्ध एक सामाजिक और कानूनी संघर्ष -    “जिस उम्र में बच्चे के हाथ में किताब और कलम होनी चाहिए, उस उम्र में यदि उसके हाथ में ...