राजमहंत स्व. श्री छोटुलाल मार्कंडेय : बस्तर की माटी का वह दीप, जिसकी लौ आज भी समाज को आलोकित कर रही है
Sanjivkumar
जय संविधान, मैं भारत देश का निवासी संजीव कुमार , "विधि" का छात्र हूं । मेरे जीवन का उद्देश्य लोगों को अधिक से अधिक स्रोतों से प्रेरित करना है। मैं अपनी सभी प्रतिभाओं को सकारात्मक तरीके से उपयोग करना चाहता हूं, यह ब्लॉग मेरे लक्ष्य के लिए एक छोटा सा प्रयास है । मैं स्वभाव से खुश हूँ , आप सभी के समर्थन के लिए धन्यवाद !!
Saturday, July 4, 2026
राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय : बस्तर की माटी का वह दीप, जिसकी लौ आज भी समाज को आलोकित कर रही है.....!
Thursday, June 18, 2026
भारत में धर्मनिरपेक्षता
भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। यहाँ सभी धर्मावलंबियों के साथ समान व्यवहार किया जाता है। भारत में धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य यह है कि राज्य धर्म के मामलों में पूर्णतः तटस्थ रहता है। राज्य प्रत्येक धर्म को समान रूप से संरक्षण प्रदान करता है तथा किसी विशेष धर्म का पक्ष नहीं लेता। भारतीय धर्मनिरपेक्षता न तो ईश्वर-विरोधी है और न ही ईश्वर-समर्थक; यह आस्तिक, नास्तिक तथा संशयवादी सभी व्यक्तियों को समान दृष्टि से देखती है।
भारतीय संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत राज्य को ईश्वर के संबंध में किसी प्रकार का निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया गया है। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि धर्म के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव न किया जाए। धर्मनिरपेक्ष राज्य का संबंध मनुष्यों के पारस्परिक संबंधों से होता है, जबकि मनुष्य और ईश्वर के मध्य संबंध राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
भारत में प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने तथा अपनी इच्छा के अनुसार ईश्वर की उपासना करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 25(1) के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए धर्म को मानने, उसका आचरण करने तथा उसका प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है।
किन्तु धार्मिक स्वतंत्रता का यह अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों की भाँति पूर्ण (Absolute) नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 25(2) के उपखंड (क) एवं (ख) के अंतर्गत राज्य इस अधिकार पर विधि द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है—
(क) धार्मिक आचरण से संबंधित किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक अथवा अन्य लौकिक गतिविधियों को विनियमित या नियंत्रित करने के लिए।
(ख) सामाजिक कल्याण एवं सुधार के लिए अथवा हिंदुओं की सार्वजनिक धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों एवं समुदायों के लिए खोलने के उद्देश्य से।
डोनाल्ड ई. स्मिथ ने लिखा है कि “धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है जो व्यक्ति और व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करता है। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो, उसे नागरिक होने की मान्यता प्रदान करता है। वह किसी विशिष्ट धर्म से संवैधानिक रूप से संबद्ध नहीं होता और न ही किसी धर्म विशेष की उन्नति अथवा अवनति से संबंधित होता है।”
प्रोफेसर स्मिथ के अनुसार धर्मनिरपेक्ष राज्य की इस परिभाषा में राज्य, धर्म और व्यक्ति के परस्पर संबंधित किन्तु स्वतंत्र संबंधों के तीन समूह सम्मिलित हैं—
धर्म और व्यक्ति का संबंध – व्यक्ति तथा व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी।
राज्य और व्यक्ति का संबंध – बिना किसी धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति को नागरिकता की समान मान्यता।
राज्य और विभिन्न धर्मों का संबंध – राज्य किसी विशिष्ट धर्म से संवैधानिक रूप से संबद्ध न हो, अर्थात धर्म और राज्य के बीच पृथकता हो।
इस प्रकार धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है जिसमें राज्य प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, किसी विशेष धर्म से स्वयं को नहीं जोड़ता तथा धर्म और राज्य के बीच पृथकता स्थापित करता है।
इस परिभाषा के आधार पर भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान की गई है। इसके अनुसार सभी व्यक्तियों को समान रूप से अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा अपने धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है।
अनुच्छेद 26 के अनुसार प्रत्येक धर्म के अनुयायी धार्मिक एवं दान संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्थाएँ स्थापित कर सकते हैं तथा धर्म संबंधी मामलों का प्रबंधन स्वयं कर सकते हैं। अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित एवं संचालित करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
भारतीय संविधान के उपर्युक्त अनुच्छेद व्यक्तियों एवं व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करते हैं। इसलिए भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है।
भारत को धर्मनिरपेक्ष देश इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 बिना किसी धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति को समान नागरिकता की मान्यता प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर राज्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा। अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्य के अधीन किसी पद पर नियुक्ति अथवा रोजगार के मामलों में सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान किए जाएंगे।
अनुच्छेद 29 के अनुसार राज्य से सहायता प्राप्त किसी भी शैक्षणिक संस्था में किसी नागरिक को धर्म, जाति, भाषा या वंश के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता। हाँ, सामाजिक न्याय एवं मानवतावादी मूल्यों के आधार पर राज्य अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को कुछ विशेष अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 330 और 332 के अनुसार संसद तथा राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए कुछ सीटें आरक्षित की गई हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 27, 28 और 29 इस बात की पुष्टि करते हैं कि धर्म और राज्य के बीच पृथकता है। भारतीय राज्य सभी धर्मों के प्रति तटस्थ नीति अपनाता है। वह धार्मिक उद्देश्यों के लिए किसी विशेष धर्म के प्रचार हेतु कर नहीं लगाता तथा राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा को प्रोत्साहित नहीं करता। इन आधारों पर भारतीय राज्य को धर्मनिरपेक्ष राज्य की संज्ञा दी जा सकती है।
प्रोफेसर स्मिथ के अनुसार भारतीय संविधान भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य के निर्माण के लिए एक शक्तिशाली आधार है। धर्मनिरपेक्ष राज्य के विकास में भारत के बहुसंख्यक हिंदू धर्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अन्य धर्मों के प्रति इस धर्म की सहिष्णुता सदैव रही है। इसके अतिरिक्त, हिंदू समाज में संगठनात्मक एकरूपता के अभाव के कारण “हिंदू राज्य” की अवधारणा को व्यापक समर्थन नहीं मिला।
आधुनिक भारत में पश्चिमीकरण, नगरीकरण, औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएँ तीव्र गति से विकसित हो रही हैं। इनके परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार, नातेदारी, जाति और पारंपरिक धार्मिक विश्वासों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होने लगा है। साथ ही, आधुनिक एवं उच्च शिक्षा का प्रसार भी बढ़ रहा है। इन सभी प्रक्रियाओं ने भारतीय समाज को प्रभावित किया है तथा लोगों में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का विकास किया है। जैसे-जैसे भारत में धर्मनिरपेक्षता के मूल्य विकसित होते जाएंगे, वैसे-वैसे धर्मनिरपेक्ष राज्य की जड़ें और अधिक मजबूत होती जाएंगी।
भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि सभी धर्मों के लोग स्वयं को एक समान भारतीय नागरिक मानते हैं। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि जब-जब भारत पर बाहरी आक्रमण हुए, तब विभिन्न धर्मों, जातियों, प्रदेशों और भाषाओं के लोगों ने एकजुट होकर राष्ट्र की रक्षा की। ऐसे अवसरों पर भारतीयों ने एकता, सहिष्णुता, राष्ट्रीयता और भाईचारे का जो परिचय दिया, वह भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का सशक्त प्रमाण है। भारत में धर्मनिरपेक्षता संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
1. S.R. Bommai v. Union of India (1994)
यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
- धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) का अभिन्न अंग है।
- संसद संविधान संशोधन द्वारा भी इस सिद्धांत को समाप्त नहीं कर सकती।
- राज्य का कोई अपना धर्म नहीं होगा।
- सरकार यदि धर्म के आधार पर कार्य करती है तो यह संविधान के विरुद्ध माना जाएगा।
- अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लगाने की न्यायिक समीक्षा भी संभव है।
इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल ढाँचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
- संसद संविधान में संशोधन कर सकती है,
- लेकिन संविधान के मूल ढाँचे को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती।
- लोकतंत्र, विधि का शासन, न्यायिक समीक्षा तथा भारत का धर्मनिरपेक्ष चरित्र संविधान की मूल विशेषताओं में सम्मिलित हैं।
42nd Constitutional Amendment द्वारा संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द जोड़े गए थे।
बाद में इन शब्दों को हटाने की माँग वाली याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार करते हुए कहा कि:
- धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूल भावना है।
- यह केवल प्रस्तावना में जोड़ा गया शब्द नहीं, बल्कि संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में निहित सिद्धांत है।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
- अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है।
- किंतु धर्म प्रचार करने का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति को बलपूर्वक, कपटपूर्वक या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना नहीं है।
- इसलिए जबरन धर्म परिवर्तन रोकने वाले कानून संवैधानिक हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ:
- राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं होगा।
- सभी धर्मों को समान संरक्षण और सम्मान मिलेगा।
- नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी।
- राज्य किसी धर्म का पक्ष या विरोध नहीं करेगा।
- धार्मिक आधार पर भेदभाव असंवैधानिक होगा।
Tuesday, June 2, 2026
मेरा सपना , हकीकत !
मैं क्रिमिनल लॉयर क्यों बनना चाहता हूँ: एक सपना, एक संघर्ष और न्याय के प्रति समर्पण -
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| Sanjiv Kumar |
मेरा सपना कैसे जन्मा - मेरे मन में क्रिमिनल लॉयर बनने का विचार अचानक नहीं आया। यह विचार धीरे-धीरे विकसित हुआ। जब मैंने समाज में होने वाले विवादों, अपराधों और न्यायिक प्रक्रियाओं को समझना शुरू किया, तब मुझे कानून की शक्ति का एहसास हुआ। मैंने महसूस किया कि एक सही कानूनी तर्क किसी व्यक्ति की पूरी जिंदगी बदल सकता है। एक मजबूत दलील किसी निर्दोष को स्वतंत्रता दिला सकती है और एक प्रभावी प्रस्तुति किसी पीड़ित को न्याय दिला सकती है।यहीं से मेरे मन में यह भावना उत्पन्न हुई कि मुझे कानून के क्षेत्र में जाना चाहिए और विशेष रूप से आपराधिक कानून का अध्ययन करना चाहिए।
संघर्ष के बिना सफलता संभव नहीं - आज जब मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा हूँ, तब मुझे यह अच्छी तरह से समझ में आ चुका है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। क्रिमिनल लॉयर बनने के लिए केवल डिग्री प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कानून की गहरी समझ, न्यायिक निर्णयों का अध्ययन, तार्किक क्षमता, धैर्य, आत्मविश्वास और निरंतर मेहनत की आवश्यकता होती है। कई बार ऐसा होता है कि घंटों पढ़ाई करने के बाद भी कोई जटिल कानूनी सिद्धांत समझ में नहीं आता। कई बार एक निर्णय को समझने में पूरा दिन लग जाता है। कई बार थकान शरीर और मन दोनों को कमजोर कर देती है। लेकिन हर बार मैं स्वयं को याद दिलाता हूँ कि महान लक्ष्य महान त्याग की मांग करते हैं।
क्रिमिनल लॉयर की वास्तविक भूमिका - कई लोग यह मानते हैं कि क्रिमिनल लॉयर अपराधियों को बचाने का काम करता है। लेकिन यह धारणा अधूरी है। वास्तव में एक क्रिमिनल लॉयर कानून और संविधान की प्रक्रिया की रक्षा करता है। वह यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को बिना उचित प्रक्रिया के दंडित न किया जाए। कानून का मूल सिद्धांत है कि सौ दोषी छूट जाएँ तो भी एक निर्दोष को दंडित नहीं होना चाहिए। इस सिद्धांत की रक्षा में क्रिमिनल लॉयर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
कठिनाइयाँ मुझे रोक नहीं सकतीं - जीवन में कई बार परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं होतीं। संसाधनों की कमी होती है। अवसर सीमित होते हैं। लोग आलोचना करते हैं। लेकिन मैंने यह सीखा है कि महान सपने देखने वाले लोग परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानते। यदि रास्ता कठिन है तो इसका अर्थ यह नहीं कि मंजिल गलत है। बल्कि इसका अर्थ यह है कि मंजिल महत्वपूर्ण है। इसी विश्वास के साथ मैं आगे बढ़ रहा हूँ।
समाज के प्रति जिम्मेदारी - एक अधिवक्ता केवल अदालत तक सीमित नहीं होता। उसका समाज के प्रति भी दायित्व होता है। उसे लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना चाहिए। उसे कानून के प्रति सम्मान की भावना विकसित करनी चाहिए। उसे न्याय और संविधान के मूल्यों को समाज तक पहुँचाना चाहिए। मैं भी अपने जीवन में यही भूमिका निभाना चाहता हूँ।
हार से सीखना - मैं जानता हूँ कि जीवन में हर प्रयास सफल नहीं होगा। हर परीक्षा में सर्वोच्च अंक नहीं आएँगे। हर अवसर प्राप्त नहीं होगा। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि हार स्थायी नहीं होती। हर असफलता एक नई सीख लेकर आती है। हर चुनौती व्यक्ति को और अधिक मजबूत बनाती है। इसलिए मैं असफलताओं से डरता नहीं हूँ।
सपनों की कीमत - हर सपने की एक कीमत होती है। - किसी सपने की कीमत समय होती है। किसी सपने की कीमत मेहनत होती है। किसी सपने की कीमत त्याग होता है। मेरे सपने की कीमत भी यही है। मैं अपना समय, अपनी ऊर्जा और अपनी मेहनत इस लक्ष्य के लिए समर्पित कर रहा हूँ क्योंकि मुझे विश्वास है कि एक दिन यह संघर्ष सफलता में बदल जाएगा।
वह दिन - मैं अक्सर उस दिन की कल्पना करता हूँ जब मैं पहली बार अधिवक्ता के रूप में अदालत में खड़ा होऊँगा। मेरे हाथ में फाइल होगी। मेरे सामने न्यायालय होगा। मेरे शब्द केवल शब्द नहीं होंगे, बल्कि कानून और न्याय के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करेंगे। वह क्षण मेरे लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं होगा। वह मेरे वर्षों के संघर्ष, मेरे परिवार के विश्वास और मेरे सपनों की जीत होगी।
मैं पढ़ूँगा। मैं सीखूँगा। मैं संघर्ष करूँगा। मैं स्वयं को बेहतर बनाऊँगा। और एक दिन मैं एक ऐसा क्रिमिनल लॉयर बनूँगा जो केवल कानून नहीं जानता होगा, बल्कि न्याय की भावना को भी समझता होगा। क्रिमिनल लॉयर बनना मेरे लिए केवल एक करियर विकल्प नहीं है। यह मेरे जीवन का उद्देश्य है। यह एक ऐसा मार्ग है जिसमें संघर्ष है, जिम्मेदारी है, चुनौतियाँ हैं, लेकिन साथ ही समाज की सेवा करने का अवसर भी है। मैं जानता हूँ कि मंजिल अभी दूर है, लेकिन मेरा विश्वास उससे भी बड़ा है। मैं जानता हूँ कि रास्ता कठिन है, लेकिन मेरा संकल्प उससे भी मजबूत है। मैं उस दिन तक नहीं रुकूँगा जब तक अपने सपने को वास्तविकता में न बदल दूँ।
मैं क्रिमिनल लॉयर इसलिए नहीं बनना चाहता कि लोग मेरे नाम को जानें। मैं क्रिमिनल लॉयर इसलिए बनना चाहता हूँ ताकि न्याय, संविधान और सत्य की रक्षा में अपना योगदान दे सकूँ।
"मेरी पहचान मेरे कपड़ों से नहीं, मेरी दलीलों से होगी; मेरी ताकत मेरे पद से नहीं, मेरे ज्ञान से होगी; और मेरी सफलता मेरे नाम से नहीं, उन लोगों की मुस्कान से मापी जाएगी जिन्हें न्याय मिला होगा।"
Thursday, May 14, 2026
झुग्गी-बस्ती के बच्चे: संघर्ष, शिक्षा और सपने
झुग्गी-बस्ती के बच्चे संघर्ष, शिक्षा और सपने
भारत तेजी से विकास कर रहा है और शहरों की चमक-दमक दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। ऊँची इमारतें, बड़े मॉल, चौड़ी सड़कें और आधुनिक सुविधाएँ शहरों की पहचान बन चुकी हैं। लेकिन इसी चमक के पीछे एक दूसरी दुनिया भी बसती है, जिसे हम झुग्गी-बस्ती कहते हैं। शहरों की इन झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले बच्चे हमारे समाज का वह हिस्सा हैं, जो हर दिन कठिनाइयों के बीच जीते हुए भी सपने देखना नहीं छोड़ते। झुग्गी-बस्ती के बच्चे गरीबी, अभाव और संघर्ष के बीच पलते हैं, लेकिन उनके अंदर एक अद्भुत हिम्मत और मेहनत करने की ताकत होती है।
झुग्गी-बस्ती के बच्चों का जीवन शहर के सामान्य बच्चों से बिल्कुल अलग होता है। उनके घर छोटे होते हैं, अक्सर टीन की छत, प्लास्टिक की दीवारें और संकरी गलियाँ उनके आसपास का वातावरण बनाती हैं। कई जगहों पर साफ पानी, शौचालय, बिजली और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी ठीक से उपलब्ध नहीं होतीं। ऐसे वातावरण में भी ये बच्चे मुस्कुराना जानते हैं और अपने जीवन को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहते हैं।
इन बच्चों की दिनचर्या बहुत कठिन होती है। कई बच्चे सुबह जल्दी उठकर अपने माता-पिता के साथ काम पर जाते हैं। कोई चाय की दुकान पर काम करता है, कोई कचरा बीनता है, कोई ढाबे में बर्तन धोता है, तो कोई छोटी उम्र में ही मजदूरी करने लगता है। कई बार घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर होती है कि बच्चों को पढ़ाई छोड़कर परिवार की मदद करनी पड़ती है। जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं, उनके लिए स्कूल की फीस,किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्च एक बड़ी चुनौती बन जाते हैं।
झुग्गी-बस्ती के बच्चों का बचपन भी आसान नहीं होता। जहाँ शहर के अमीर बच्चे पार्क, खेल मैदान और महंगे खिलौनों में अपना समय बिताते हैं, वहीं झुग्गी के बच्चे गलियों में खेलते हैं। उनकी खेल की दुनिया भी सीमित होती है। कभी फुटबॉल की जगह प्लास्टिक की बोतल से खेलना, कभी पत्थरों से खेल बनाना और कभी टूटी हुई चीजों से खिलौना तैयार करना उनकी मजबूरी बन जाती है। लेकिन फिर भी ये बच्चे छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढ लेते हैं। उनकी हँसी उनके मजबूत हौसले का प्रमाण होती है।
झुग्गी-बस्ती के बच्चों के सामने स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ भी बहुत ज्यादा होती हैं। गंदगी, प्रदूषण, साफ पानी की कमी और पोषण की कमी के कारण कई बच्चे बीमारी का शिकार हो जाते हैं। कई बार सही इलाज न मिलने के कारण छोटी बीमारी भी बड़ी बन जाती है। इन बच्चों के लिए अस्पताल तक पहुँचना और दवाइयाँ खरीदना भी आसान नहीं होता। इसके बावजूद वे जीवन से हार नहीं मानते।
झुग्गी-बस्ती में रहने वाले बच्चों के लिए सबसे बड़ी समस्या असुरक्षा भी होती है। कई जगहों पर अपराध, नशा और गलत संगति का खतरा रहता है। कई बच्चे कम उम्र में ही गलत रास्ते पर चले जाते हैं क्योंकि उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। कुछ बच्चे बाल श्रम, शोषण और घरेलू हिंसा का भी शिकार बनते हैं। यह समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि ये बच्चे देश का भविष्य हैं।
लेकिन इन सभी कठिनाइयों के बावजूद झुग्गी-बस्ती के बच्चों में एक अलग ही जज़्बा होता है। वे कठिन परिस्थितियों में जीना सीख जाते हैं। वे मजबूत बनते हैं, जल्दी जिम्मेदारियाँ समझने लगते हैं और मेहनत की असली कीमत जानते हैं। कई झुग्गी-बस्ती के बच्चे ऐसे भी होते हैं जो पढ़ाई करके अपनी किस्मत बदलते हैं। कुछ बच्चे अच्छे कॉलेज में प्रवेश लेते हैं, कुछ खेलों में आगे बढ़ते हैं, और कुछ कला, संगीत या अन्य क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा दिखाते हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि गरीबी सपनों को रोक सकती है, लेकिन खत्म नहीं कर सकती। झुग्गी-बस्ती के बच्चे संघर्ष की आग में तपकर मजबूत बनते हैं। वे अभाव में भी उम्मीद का दीपक जलाए रखते हैं। उनके सपने बड़े होते हैं, बस उन्हें सही अवसर और सहारा चाहिए। यदि समाज उन्हें बराबरी का अधिकार और बेहतर वातावरण दे, तो यही बच्चे एक दिन देश का नाम रोशन कर सकते हैं। झुग्गी-बस्ती के बच्चों की मेहनत और संघर्ष हमें यह सिखाता है कि असली ताकत सुविधाओं में नहीं, बल्कि हिम्मत और मेहनत में होती है।
Sunday, April 26, 2026
गुलामगिरी और जात-पात का विनाश समाज की जरुरत
गुलामगिरी और जात-पात का विनाश
- संजीव कुमार
गुलामगिरी केवल जंजीरों का नाम नहीं है, यह एक मानसिक कैद है। जब इंसान अपने ही जैसे इंसान को नीचा समझने लगे, जब जन्म के आधार पर किसी की इज्जत तय होने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समाज गुलाम बन चुका है। भारत में जात-पात की व्यवस्था ने सदियों तक लोगों को इसी गुलामी में जकड़े रखा जहाँ कुछ लोग मालिक बने और कुछ लोग जीवनभर “नीच” कहलाकर अपमान सहते रहे।
जात-पात ने समाज को बाँटकर कमजोर किया। इसने इंसान को इंसान से दूर कर दिया। मंदिर, कुएँ, शिक्षा, रोजगार हर जगह भेदभाव का ज़हर फैलाया गया। यह व्यवस्था धर्म के नाम पर बनाई गई, लेकिन इसका उद्देश्य केवल सत्ता और शोषण था। जो जाति ऊँची कही गई, उसने अधिकारों पर कब्जा किया, और जो जाति नीचे कही गई, उसे पीढ़ियों तक मेहनत और अपमान के लिए छोड़ दिया गया। यही असली गुलामगिरी थी बिना हथकड़ी के भी गुलामी।
लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब शोषण बढ़ा है, तब-तब विद्रोह भी पैदा हुआ है। महात्मा फुले, डॉ. भीमराव अंबेडकर, कबीर, रविदास जैसे महान विचारकों ने समाज को झकझोरा। उन्होंने बताया कि जाति इंसान की पहचान नहीं, बल्कि समाज पर थोपा गया एक धोखा है। अंबेडकर ने साफ कहा था जाति व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन है, क्योंकि यह बराबरी को खत्म कर देती है।
आज जरूरत है कि हम गुलामगिरी को केवल अंग्रेजों की गुलामी समझकर न भूल जाएँ। असली गुलामी तब खत्म होगी जब जात-पात की जड़ें खत्म होंगी। जब हम एक-दूसरे को नाम से पहचानेंगे, जात से नहीं। जब किसी के साथ शादी, दोस्ती, शिक्षा या नौकरी में जाति की दीवार नहीं होगी। जब समाज में सम्मान जन्म से नहीं, कर्म से मिलेगा।
जात-पात का विनाश केवल कानून से नहीं होगा, बल्कि सोच बदलने से होगा। हमें यह समझना होगा कि अगर समाज बँटा रहेगा, तो विकास सिर्फ कुछ लोगों का होगा, पूरे देश का नहीं। बराबरी, भाईचारा और मानवता ही एक मजबूत राष्ट्र की नींव है।
जात-पात इंसानियत पर कलंक है और गुलामगिरी की सबसे खतरनाक शक्ल। इसका विनाश जरूरी है, क्योंकि जब तक जात रहेगी, तब तक समाज में न्याय नहीं होगा। और जब तक न्याय नहीं होगा, तब तक भारत सच में मानसिक गुलामी से आज़ाद नहीं होगा।
दुख और संताप से आदमी बिखरता है, फिर निखरता है
लोग अपने फायदे के आते हैं और जज़्बात खेल चले जाते हैं
लोग अपने फायदे के आते हैं और जज़्बात खेल चले जाते हैं
आज के दौर में रिश्ते कम और ज़रूरतें ज़्यादा दिखाई देती हैं। इंसान जब तक किसी के काम का होता है, तब तक उसे अपना कहा जाता है। जैसे ही फायदा खत्म, वैसे ही अपनापन भी खत्म। यही समाज की सबसे कड़वी सच्चाई बन चुकी है—लोग अपने स्वार्थ के लिए आते हैं और जज़्बातों से खेलकर चले जाते हैं।
कई लोग हमारे जीवन में दोस्त बनकर आते हैं, हमदर्द बनकर आते हैं, अपना बनकर आते हैं। वे हमारी बातों में अपनापन भर देते हैं, हमारी कमजोरियों को समझने का नाटक करते हैं और हमारी भावनाओं को सहारा देने का दिखावा करते हैं। लेकिन असल में उनका उद्देश्य सिर्फ इतना होता है कि वे हमसे कुछ हासिल कर लें—पैसा, फायदा, पहचान, सहारा या कोई ज़रूरत।
जब तक हम उनके काम आते हैं, तब तक वे हमारे आसपास मंडराते रहते हैं। हमारे दुख में झूठे आँसू बहाते हैं, हमारे सुख में नकली मुस्कान दिखाते हैं और हमारे साथ ऐसे पेश आते हैं जैसे वही सबसे अपने हों। लेकिन जैसे ही उनकी जरूरत पूरी होती है, वे धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं। फिर संदेशों का जवाब नहीं आता, फोन उठना बंद हो जाता है, और सबसे दुखद बात यह कि वो इंसान अचानक हमें अजनबी बना देता है।
ऐसे लोग रिश्तों को दिल से नहीं निभाते, वे रिश्तों को सिर्फ एक सौदे की तरह देखते हैं। उनके लिए दोस्ती भी एक सीढ़ी है, प्यार भी एक साधन है और भरोसा भी एक हथियार। वे दूसरों की भावनाओं को खिलौना समझते हैं और उन्हें तोड़कर भी खुद को सही साबित कर लेते हैं।
सबसे बड़ी चोट तब लगती है जब हमें एहसास होता है कि जिसे हमने अपना समझा, उसने हमें सिर्फ इस्तेमाल किया। जज़्बात सच्चे थे हमारे, पर सामने वाला सिर्फ अभिनय कर रहा था। हम उसे अपना मानते रहे और वह हमें मौका समझता रहा।
पर इन अनुभवों से एक बात जरूर सीखने को मिलती है—
हर मुस्कुराता चेहरा अपना नहीं होता, और हर मीठी बात में सच्चाई नहीं होती।
आज जरूरत है कि हम रिश्तों में दिल के साथ-साथ दिमाग भी रखें। भरोसा करें, लेकिन आँख बंद करके नहीं। अपने जज़्बातों की कीमत समझें, क्योंकि हर कोई उन्हें समझने के लायक नहीं होता।
अंत में बस इतना कहना है—
जो लोग अपने फायदे के लिए आते हैं, वे कभी अपने नहीं हो सकते।
और जो जज़्बातों से खेलकर चले जाते हैं, वे इंसान नहीं, बस मतलब के सौदागर होते हैं।
सच्चे रिश्ते वही हैं जो जरूरत में नहीं, बल्कि मुश्किल में साथ निभाएं।
Saturday, April 11, 2026
दहेज़ निवारण कानून
दहेज प्रथा का उन्मूलन केवल कानून से संभव नहीं है, इसके लिए सामाजिक चेतना की जरूरत है। इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए 1961 में दहेज प्रतिशेध अधिनियम पारित किया गया, जिसमें दहेज लेगा, दहेज देना या दहेज मांगने के लिए अभिप्रेरित करना आदि को अपराध के घेरे में लेकर अपराधियों को सजा दिलाने का प्रावधान किया गया है, लेकिन इस अधिनियम का कोई कारगर असर नहीं हुआ। समय-समय पर इसमें संशोधन करके इस प्रथा पर कठोर नियंत्रण लाने की चेष्टा की गई। क्रिमिनल लॉ (द्वितीय संशोधन) अधिनियम 1983 जो 25 सितम्बर, 1983 को प्रभावी हुआ, के द्वारा पति और उसके संबंधियों को सजा देने की व्यवस्था की गई, जिन्हें स्त्री के साथ क्रूरता के व्यवहार का दोषी पाया गया। वर्ष 1984 में दहेज प्रतिषेध (वर-वधू को दिए गए उपहारों की सूची का रखरखाव) नियम 1984 पारित करके उपहार के नाम पर दहेज लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का प्रयास किया गया। पुनः वर्ष 1986 में दहेज प्रतिषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 द्वारा दहेज मृत्यु को परिभाषित करके उसके लिए कड़ी सजा की व्यवस्था की गई। दहेज मृत्यु कारित न करने का साक्ष्य अधिभार भी अभियुक्त पर रखे जाने का प्रावधान किया गया।
दहेज क्या है ?
दहेज अपराध के लिए दण्ड की व्यवस्था - दहेज लेना या देना या दहेज की मांग करना दंडनीय अपराध है। दहेज प्रतिषेध अधिनियम में इसे गैर-जमानतीय एवं संज्ञेय आपस्थ माना गया है. दहेज देने या लेने संबंधी कोई भी कार अवैध माना जाता है। उन व्यक्तियों के लिए भी सजा का प्रावधान किया गया है, जो दहेज जैसे अपराध को अभिप्रेरित करते हैं। 2 अक्टूबर, 1984 से लागू नियमावली के अनुसार विवाह के अवसर पर वर-वधू को दिए जाने वाले उपहारों की सूची, देने वालों के नाम एवं वर-वधू से उसका संबंधी एवं सूची वर-वधू के हस्ताक्षर व अंगूठे का निशान के साथ रखने की कानूनी अनिवार्यता बतायी गई है।
न्यायलय द्वारा संज्ञान -
क.- इस अधिनियम के तहत आने वाले अपराधों की सुनवाई का अधिकार मेट्रोपोलिटन स्टेट/प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के नीचे के किसी भी अधिकारी के पास नहीं होता है।
ख - इन अपराधों में न्यायालय द्वारा प्रसंज्ञान स्वयं की जानकारी, पुलिस रिपोर्ट, से पीडित व्यक्ति या उसके माता-पिता या अन्य संबंधितों के परिवार या किसी मान्यता सामाजिक संगठन / संस्था के परिवाद पर लिया जा सकता है।
ग.- सुनवाई करने वाले मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट / प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट को इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों में उस सीमा तक दंड देने के लिए शक्ति प्रदान की गई है, जो विभिन्न अपराधों के लिए इस अधिनियम में निर्धारित है, चाहे ये शक्तियां दं. प्रसं० में प्रदत्त शक्त्तियों से अधिक क्यों न हो? इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों के विषय में संज्ञान लेने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है। महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि दहेज संबंधी अपराध से पीड़ित व्यक्ति को उसके द्वारा दिए गए किसी बयान के आधार पर अभियोजित नहीं किया जा सकता है।
साक्ष्य का भार - प्रायः आपराधिक मामलों में किसी अभियुक्त पर दोष सिद्ध करने का भार अभियोजन पक्ष पर होता है, लेकिन इस दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा-3 एवं धारा-4 के तहत दहेज संबंधी मामलों में अपराध नहीं किए जाने का सबूत पेश करने का भार अभियुक्त पर होता है।
वधू को प्राप्त उपहार - वधू को विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के बाद जो उपहार माता-पिता के पक्ष से या ससुराल पक्ष से मिलता है, उसे स्त्री धन कहा जाता है। वधू स्त्री धन की पूरी तरह से मालकिन या स्वामिनी होती है।
दहेज के लिए वधू के साथ दुर्व्यवहार के लिए दंड - दहेज प्रतिषेध अधिनियम में वधू के साथ क्रूरता या उत्पीड़न के व्यवहार के लिए कठोर दंड की व्यवस्था है। क्रूरता के लिए पति के साथ उसके संबंधियों को भी दंडित करने का प्रावधान है, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 498-क में जोड़ी गई है। धारा 498-क यदि किसी स्त्री के पास उस/उन्हें पति या पति के रिश्तेदार उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करता है तो तीन साल तक कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 86 में क्रूरता को परिभाषित किया है तथा 85 के प्रयोजनो के लिए क्रूरता से अभिप्रेत है -
क.- जान-बूझकर कोई ऐसा व्यवहार करना, जिससे वह स्त्री का आत्महत्या के लिए प्रेरित करना हो या उस स्त्री के जीवन अंग या स्वास्थ्य को गंभीर क्षति या खतरा पैदा हो।
ख. किसी स्त्री को इस दृष्टि से तंग करना कि उसको या उसके किसी रिश्तेदार को कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति देने के लिए बाध्य किया जाए या किसी स्त्री को इस कारण तंग करना कि उसका कोई रिश्तेदार ऐसी मांग पूरी न कर पाया हो।
1-यदि किसी स्त्री की मृत्यु किसी दाह या शारीरिक क्षति के कारण होती है या उसके विवाह के सात वर्ष के भीतर असामान्य परिस्थितियां होती है और यह प्रदर्शित होता है कि उसकी मृत्यु के कुछ समय पहले उसके पति या पति के किसी रिश्तेदार ने दहेज की मांग के लिए उसके साथ क्रूरता का व्यवहार किया है तो ऐसी मृत्यु को दहेज कारित मृत्यु कहा जाता है।
2- दहेज मृत्यु कारित करने वाले व्यक्ति को सात साल से आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है।
भारत्तीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में धारा 117 व 118 शक्ति दी गई है कि विवाह के 7 वर्ष के भीतर किसी स्त्री द्वारा आत्महत्या करने या दहेज मृत्यु के मामलों में अभियुक्त के विरूद्ध अपराध करने की अवधारणा कर सके जब तक कि अन्यथा सिद्ध न हो।।
भारतीय साक्षय अधिनियम की धारा- 117
यदि कोई स्त्री विवाह के 7 वर्ष के भीतर आत्महत्या करती है तो न्यायालय मामले की तभी अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह अवधारणा करता है कि ऐसी आत्महत्या उसके पति या पति के किसी रिश्तेदार द्वारा दुश्प्रेरित की गई है।
भारतीय साक्षय अधिनियम की धारा- 118
जब किसी व्यक्ति ने अपनी स्त्री की दहेज मृत्यु कारित की है और दर्शित किया जाता है कि मृत्यु के कुछ पहले ऐसे व्यक्ति दहेज की किसी मांग के लिए या उसके संबंध में उस स्त्री के साथ क्रूरता की थी तो न्यायालय के द्वारा यह अवधारणा की जाती है कि उस व्यक्ति ने दहेज मृत्यु कारित की है। इस तरह कानून में संशोधन करके दहेज अपराध के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की गई है। अतः दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए बनाए गए कानून का उपयोग करने की आवश्यकता है।
Kans Raj v. State of Punjab (2000) 5 SCC 207
Satvir Singh v. State of Punjab (2001) 8 SCC 633
Rajinder Singh v. State of Punjab (2015) 6 SCC 477
Baijnath v. State of Madhya Pradesh (2017) 1 SCC 101
Major Singh v. State of Punjab (2015) 5 SCC 201
Shanti v. State of Haryana (1991) 1 SCC 371
Hira Lal v. State (Govt. of NCT of Delhi) (2003) 8 SCC 80
तो पति/ससुराल वालों पर 304B का presumption लगेगा।
State of Punjab v. Iqbal Singh (1991) 3 SCC 1
निष्कर्ष (Conclusion) – दहेज मृत्यु (Dowry Death)
Monday, March 2, 2026
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार : लोकतंत्र की आधारशिला
भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा और नागरिक स्वतंत्रता की नींव माने जाते हैं। संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभवों और औपनिवेशिक दमन की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए नागरिकों को ऐसे अधिकार प्रदान किए जो राज्य की मनमानी के विरुद्ध सुरक्षा कवच का कार्य करें। संविधान के भाग-III (अनुच्छेद 12 से 35) में वर्णित ये अधिकार प्रत्येक नागरिक को गरिमा, समानता और स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अधिकार देते हैं।
संविधान सभा की बहसों में Dr. B. R. Ambedkar ने स्पष्ट किया था कि मौलिक अधिकार केवल आदर्श नहीं बल्कि न्यायालय द्वारा संरक्षित अधिकार हैं। विशेष रूप से अनुच्छेद 32 को उन्होंने संविधान की “आत्मा और हृदय” कहा, क्योंकि इसके माध्यम से कोई भी नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जाकर अपने अधिकारों की रक्षा की मांग कर सकता है। मौलिक अधिकारों में प्रमुख रूप से समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18), स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24), धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-28), सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30) तथा संवैधानिक उपचार का अधिकार (अनुच्छेद 32) शामिल हैं। समानता का अधिकार कानून के समक्ष समान व्यवहार सुनिश्चित करता है और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों को समाप्त करता है। स्वतंत्रता का अधिकार अभिव्यक्ति, विचार, संगठन और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए अनिवार्य तत्व है।
समय के साथ न्यायपालिका ने मौलिक अधिकारों की व्याख्या को विस्तृत और प्रगतिशील बनाया है। उदाहरण के लिए, Maneka Gandhi v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” की अवधारणा को व्यापक अर्थ दिया। इसी प्रकार Shreya Singhal v. Union of India में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए , सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A को असंवैधानिक घोषित किया गया।
हालाँकि, मौलिक अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं हैं। राज्य सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता जैसे आधारों पर इन पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यही संतुलन लोकतांत्रिक शासन की वास्तविक परीक्षा है—जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक हित दोनों का समन्वय आवश्यक है।
आज के डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता का अधिकार और समान अवसर जैसे प्रश्न नए आयाम ले चुके हैं। न्यायपालिका ने निजता को भी मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है, जिससे नागरिक अधिकारों का दायरा और मजबूत हुआ है।
मौलिक अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, मानव गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षक हैं। जब तक इन अधिकारों की रक्षा और सम्मान सुनिश्चित रहेगा, तब तक भारतीय लोकतंत्र सशक्त और जीवंत बना रहेगा।s
Friday, July 11, 2025
कलम का बोझ और खाली जेब
1. शिक्षा की प्यास, लेकिन साधनों की कमी

कई बार छात्र महंगे कोचिंग सेंटर की ओर देख तो लेते हैं, पर प्रवेश शुल्क देखकर सिर झुका लेते हैं। किताबें खरीदना, फ़ॉर्म भरना प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना — ये सब उन छात्रों के लिए एक सपना बनकर रह जाता है, जो रोज़ दो वक़्त की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहे होते हैं।
गरीबी सिर्फ पेट की भूख नहीं देती, यह आत्म-सम्मान और आत्मविश्वास को भी कुतरती है।
2. काम और पढ़ाई का संतुलन
गांवों और छोटे कस्बों में बहुत से छात्र दिन में मज़दूरी करते हैं — किसी के खेत में, किसी की दुकान पर — और रात में ट्यूबलाइट की मंद रौशनी में किताबें खोलते हैं। उनके लिए समय भी एक संसाधन है जो हर रोज़ कम पड़ जाता है। न खाने का ठिकाना होता है, न पहनने का साधन। और फिर भी वो पढ़ते हैं — क्योंकि उन्हें पता है कि यही एक रास्ता है गरीबी की ज़ंजीरें तोड़ने का।
3. समाज की बेरुखी और व्यवस्थागत असमानता
जब कोई छात्र फटी कॉपी लेकर स्कूल आता है, तो उसे पढ़ने से ज़्यादा सहने की आदत डालनी पड़ती है — सहपाठियों की हंसी, शिक्षकों की उपेक्षा और समाज की ठंडी निगाहें। सरकार की योजनाएं काग़ज़ों में अच्छी लगती हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में बहुत कम छात्रों तक सही मदद पहुँच पाती है।
4. फिर भी उम्मीद ज़िंदा है
इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद, ऐसे लाखों छात्र हैं जो हार नहीं मानते। जिनकी जेब खाली होती है, लेकिन हौसले भरे होते हैं। जिनकी आँखों में आँसू होते हैं, लेकिन उन्हीं आँखों में सपने भी पलते हैं। वे जानते हैं कि अगर उनके पास सब कुछ नहीं है, तो भी उनके पास कलम है — और यही कलम एक दिन उन्हें वहां ले जाएगी, जहां वो दूसरों की ज़िंदगी बदल सकें।
निष्कर्ष - छात्र जीवन केवल मस्ती, दोस्ती और परीक्षा का नाम नहीं है। यह एक संघर्ष है — विशेषकर उन युवाओं के लिए जिनके पास साधन नहीं, सिर्फ़ सपने हैं। हमें ऐसे छात्रों की मदद करनी चाहिए, उन्हें समझना चाहिए, और सबसे ज़रूर उन्हें सुनना चाहिए। क्योकि कलम का बोझ तब तक भारी रहता है, जब तक समाज उसकी कीमत नहीं समझता।
Wednesday, May 21, 2025
ज्यूडिशियरी एग्जाम की तैयारी: लॉ स्टूडेंट्स
ज्यूडिशियरी एग्जाम की तैयारी: लॉ स्टूडेंट्स के लिए आवश्यक जरूरी चीजें
भारत में ज्यूडिशियरी एग्जाम (Judicial Services Examination) एक प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षा है, जो कानून के विद्यार्थियों को न्यायिक अधिकारी (जज) बनने का अवसर देती है। यदि आप एक लॉ स्टूडेंट हैं और भविष्य में न्यायिक सेवा में जाना चाहते हैं, तो आपको कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विशेष ध्यान देना होगा। नीचे हम उन जरूरी चीजों को विस्तार से बता रहे हैं जो ज्यूडिशियरी एग्जाम की तैयारी के लिए अनिवार्य हैं:
राजमहंत स्व. श्री छोटुलाल मार्कंडेय : बस्तर की माटी का वह दीप, जिसकी लौ आज भी समाज को आलोकित कर रही है स्व श्री सी एल मार्कंडेय जी संजीव ...
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गुलामगिरी और जात-पात का विनाश - संजीव कुमार गुलामगिरी केवल जंजीरों का नाम नहीं है, यह एक मानसिक कैद है। जब इंसान अपने ही जैसे इंसान को न...
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भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार : लोकतंत्र की आधारशिला भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा और नागरिक स...

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