लेख - संजीव कुमार
कहानी की शुरुआत इंस्पेक्टर देशराज से होती है, जो अपनी वर्दी और पद का इस्तेमाल कानून की रक्षा के बजाय भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए करता है। एक हत्या के मामले में वह असली अपराधी को बचाकर गरीब गोविंद को फँसा देता है। परिस्थितियाँ इतनी भयावह हो जाती हैं कि गोविंद और उसकी पत्नी आत्महत्या कर लेते हैं। बाद में एक बुजुर्ग की हत्या और उससे जुड़ा एक भयावह संयोग देशराज को अपराध की गहरी साजिश का पता लगाने की ओर ले जाता है। इसके बाद कहानी का केंद्र इंस्पेक्टर तेजस्वी बन जाता है। वह बाहर से बेहद ईमानदार, कठोर और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने वाला पुलिस अधिकारी दिखाई देता है। वह ब्लैक स्टार नामक
खतरनाक आपराधिक संगठन को चुनौती देता है और उसके गढ़ तक पहुँच जाता है। उसकी बहादुरी से पुलिस विभाग और जनता में उसकी प्रतिष्ठा तेजी से बढ़ती है। लेकिन कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब पता चलता है कि तेजस्वी स्वयं सत्ता और अपराध के जटिल खेल का हिस्सा है। वह ब्लैक स्टार के साथ मिलकर अपनी राजनीतिक और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाता है। वह अपराधियों, नेताओं और पुलिस व्यवस्था—तीनों के बीच ऐसी शतरंज की चालें चलता है कि धीरे-धीरे उसका प्रभाव राजनीतिक सत्ता तक पहुँच जाता है। अंततः तेजस्वी की असली सच्चाई सामने लाने में पांडुराम हवलदार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कहानी इस सवाल को सामने रखती है कि जब कानून लागू करने वाला व्यक्ति ही कानून और अपनी वर्दी को निजी सत्ता हासिल करने के लिए इस्तेमाल करने लगे, तो न्याय और अपराध के बीच की सीमा कितनी खतरनाक ढंग से मिट सकती है।
वर्दी वाला गुंडा’ सिर्फ पुलिस और अपराध की कहानी नहीं है; यह वर्दी, सत्ता, भ्रष्टाचार, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और छल-कपट के उस गठजोड़ की थ्रिलर कथा है, जिसमें असली अपराधी अक्सर कानून के रक्षक के रूप में सामने आता है। लेखक ने बताया था कि इस उपन्यास का विचार उन्हें एक ऐसे वर्दीधारी पुलिसकर्मी को देखकर आया था जो लोगों पर लाठियाँ बरसा रहा था।
