गुलामगिरी और जात-पात का विनाश
- संजीव कुमार
गुलामगिरी केवल जंजीरों का नाम नहीं है, यह एक मानसिक कैद है। जब इंसान अपने ही जैसे इंसान को नीचा समझने लगे, जब जन्म के आधार पर किसी की इज्जत तय होने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समाज गुलाम बन चुका है। भारत में जात-पात की व्यवस्था ने सदियों तक लोगों को इसी गुलामी में जकड़े रखा जहाँ कुछ लोग मालिक बने और कुछ लोग जीवनभर “नीच” कहलाकर अपमान सहते रहे।
जात-पात ने समाज को बाँटकर कमजोर किया। इसने इंसान को इंसान से दूर कर दिया। मंदिर, कुएँ, शिक्षा, रोजगार हर जगह भेदभाव का ज़हर फैलाया गया। यह व्यवस्था धर्म के नाम पर बनाई गई, लेकिन इसका उद्देश्य केवल सत्ता और शोषण था। जो जाति ऊँची कही गई, उसने अधिकारों पर कब्जा किया, और जो जाति नीचे कही गई, उसे पीढ़ियों तक मेहनत और अपमान के लिए छोड़ दिया गया। यही असली गुलामगिरी थी बिना हथकड़ी के भी गुलामी।
लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब शोषण बढ़ा है, तब-तब विद्रोह भी पैदा हुआ है। महात्मा फुले, डॉ. भीमराव अंबेडकर, कबीर, रविदास जैसे महान विचारकों ने समाज को झकझोरा। उन्होंने बताया कि जाति इंसान की पहचान नहीं, बल्कि समाज पर थोपा गया एक धोखा है। अंबेडकर ने साफ कहा था जाति व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन है, क्योंकि यह बराबरी को खत्म कर देती है।
आज जरूरत है कि हम गुलामगिरी को केवल अंग्रेजों की गुलामी समझकर न भूल जाएँ। असली गुलामी तब खत्म होगी जब जात-पात की जड़ें खत्म होंगी। जब हम एक-दूसरे को नाम से पहचानेंगे, जात से नहीं। जब किसी के साथ शादी, दोस्ती, शिक्षा या नौकरी में जाति की दीवार नहीं होगी। जब समाज में सम्मान जन्म से नहीं, कर्म से मिलेगा।
जात-पात का विनाश केवल कानून से नहीं होगा, बल्कि सोच बदलने से होगा। हमें यह समझना होगा कि अगर समाज बँटा रहेगा, तो विकास सिर्फ कुछ लोगों का होगा, पूरे देश का नहीं। बराबरी, भाईचारा और मानवता ही एक मजबूत राष्ट्र की नींव है।
जात-पात इंसानियत पर कलंक है और गुलामगिरी की सबसे खतरनाक शक्ल। इसका विनाश जरूरी है, क्योंकि जब तक जात रहेगी, तब तक समाज में न्याय नहीं होगा। और जब तक न्याय नहीं होगा, तब तक भारत सच में मानसिक गुलामी से आज़ाद नहीं होगा।