Sunday, April 26, 2026

गुलामगिरी और जात-पात का विनाश समाज की जरुरत

 गुलामगिरी और जात-पात का विनाश


- संजीव कुमार 

गुलामगिरी केवल जंजीरों का नाम नहीं है, यह एक मानसिक कैद है। जब इंसान अपने ही जैसे इंसान को नीचा समझने लगे, जब जन्म के आधार पर किसी की इज्जत तय होने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समाज गुलाम बन चुका है। भारत में जात-पात की व्यवस्था ने सदियों तक लोगों को इसी गुलामी में जकड़े रखा जहाँ कुछ लोग मालिक बने और कुछ लोग जीवनभर “नीच” कहलाकर अपमान सहते रहे।

जात-पात ने समाज को बाँटकर कमजोर किया। इसने इंसान को इंसान से दूर कर दिया। मंदिर, कुएँ, शिक्षा, रोजगार हर जगह भेदभाव का ज़हर फैलाया गया। यह व्यवस्था धर्म के नाम पर बनाई गई, लेकिन इसका उद्देश्य केवल सत्ता और शोषण था। जो जाति ऊँची कही गई, उसने अधिकारों पर कब्जा किया, और जो जाति नीचे कही गई, उसे पीढ़ियों तक मेहनत और अपमान के लिए छोड़ दिया गया। यही असली गुलामगिरी थी बिना हथकड़ी के भी गुलामी।

लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब शोषण बढ़ा है, तब-तब विद्रोह भी पैदा हुआ है। महात्मा फुले, डॉ. भीमराव अंबेडकर, कबीर, रविदास जैसे महान विचारकों ने समाज को झकझोरा। उन्होंने बताया कि जाति इंसान की पहचान नहीं, बल्कि समाज पर थोपा गया एक धोखा है। अंबेडकर ने साफ कहा था जाति व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे बड़ी दुश्मन है, क्योंकि यह बराबरी को खत्म कर देती है।

आज जरूरत है कि हम गुलामगिरी को केवल अंग्रेजों की गुलामी समझकर न भूल जाएँ। असली गुलामी तब खत्म होगी जब जात-पात की जड़ें खत्म होंगी। जब हम एक-दूसरे को नाम से पहचानेंगे, जात से नहीं। जब किसी के साथ शादी, दोस्ती, शिक्षा या नौकरी में जाति की दीवार नहीं होगी। जब समाज में सम्मान जन्म से नहीं, कर्म से मिलेगा।

जात-पात का विनाश केवल कानून से नहीं होगा, बल्कि सोच बदलने से होगा। हमें यह समझना होगा कि अगर समाज बँटा रहेगा, तो विकास सिर्फ कुछ लोगों का होगा, पूरे देश का नहीं। बराबरी, भाईचारा और मानवता ही एक मजबूत राष्ट्र की नींव है।

जात-पात इंसानियत पर कलंक है और गुलामगिरी की सबसे खतरनाक शक्ल। इसका विनाश जरूरी है, क्योंकि जब तक जात रहेगी, तब तक समाज में न्याय नहीं होगा। और जब तक न्याय नहीं होगा, तब तक भारत सच में मानसिक गुलामी से आज़ाद नहीं होगा।

दुख और संताप से आदमी बिखरता है, फिर निखरता है

दुख और संताप से आदमी बिखरता है, फिर निखरता है
जीवन आसान नहीं होता। यह बात हम सब जानते हैं, लेकिन जब तक दुख खुद के दरवाजे पर दस्तक नहीं देता, तब तक हम जीवन की असली सच्चाई को समझ नहीं पाते। इंसान जब तक सुख में होता है, वह खुद को मजबूत समझता है, दुनिया को अपनी मुट्ठी में मानता है। लेकिन जब दुख और संताप आते हैं, तब असली परीक्षा शुरू होती है।
दुख केवल दर्द नहीं देता, वह इंसान को तोड़ता है, झकझोरता है और अंदर से बिखेर देता है। कभी अपनों का साथ छूट जाता है, कभी रिश्ते धोखा दे जाते हैं, कभी मेहनत के बाद भी सफलता नहीं मिलती। ऐसे समय में आदमी खुद से सवाल करने लगता है—“मेरे साथ ही क्यों?”
यहीं से इंसान टूटना शुरू करता है।
जब इंसान बिखरता है…
दुख इंसान के आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है।
मन भारी हो जाता है, रातें लंबी लगती हैं, और हर खुशी अधूरी लगने लगती है।
वो इंसान जो दूसरों को हँसाया करता था, वही अकेले में चुपचाप रोने लगता है।
कई बार तो इंसान खुद को खत्म कर देने तक की सोचने लगता है।
लेकिन यही दुख एक ऐसी आग भी है, जो इंसान के अंदर छुपी ताकत को बाहर निकालती है।
दुख इंसान को बदल देता है
जब जीवन बार-बार चोट देता है, तब इंसान को समझ आता है कि दुनिया वैसी नहीं जैसी वह सोचता था। दुख इंसान के अंदर की कमजोरियों को दिखा देता है।
वह सीखता है कि भरोसा किस पर करना है और किस पर नहीं।
वह सीखता है कि भावनाओं से नहीं, समझदारी से चलना पड़ता है।
दुख इंसान को भावुक नहीं बल्कि मजबूत बनाता है।
वो इंसान जो पहले छोटी-छोटी बातों में टूट जाता था, वही धीरे-धीरे पत्थर की तरह कठोर और पहाड़ की तरह स्थिर हो जाता है।
संताप ही इंसान को निखारता है
संताप का मतलब सिर्फ तकलीफ नहीं है, संताप का मतलब है मन की तपस्या।
जब इंसान अंदर ही अंदर जलता है, रोता है, सहता है—तभी उसका चरित्र बनता है।
कभी-कभी भगवान भी इंसान को दुख इसलिए देते हैं ताकि वह कमजोर न रह जाए।
क्योंकि अगर जीवन में केवल सुख ही मिलता रहे, तो आदमी घमंडी हो जाता है।
और अगर जीवन में केवल दुख ही मिले, तो आदमी टूट जाता है।
पर असली इंसान वही है जो दुख से टूटकर भी खड़ा हो जाए।
जब इंसान निखरता है…
जब इंसान दुख से बाहर निकलता है, तब वह पहले जैसा नहीं रहता।
वह ज्यादा समझदार हो जाता है, ज्यादा शांत हो जाता है, ज्यादा गहरा हो जाता है।
उसके चेहरे पर मुस्कान तो होती है, लेकिन उस मुस्कान के पीछे संघर्ष छुपा होता है।
वह इंसान दूसरों की तकलीफ को भी समझने लगता है।
उसमें संवेदना आ जाती है।
वह बिना बोले दूसरों का दर्द पहचान लेता है।
दुख इंसान को “सिर्फ जिंदा” नहीं रखता,
दुख इंसान को “जीना” सिखा देता है।
निष्कर्ष
सच यही है कि जीवन में दुख और संताप किसी सजा की तरह नहीं आते, बल्कि वे इंसान की परीक्षा होते हैं।
दुख आदमी को पहले बिखेरता है, उसे जमीन पर गिराता है, उसे कमजोर करता है।
लेकिन वही दुख उसे नया रास्ता दिखाता है, नया दृष्टिकोण देता है और उसे निखार देता है।
जो इंसान दुख से गुजरकर भी मुस्कुराना सीख लेता है,
वही असली विजेता होता है।
क्योंकि—
“दुख इंसान को तोड़ता जरूर है,
लेकिन वही दुख इंसान को गढ़ता भी है।”

लोग अपने फायदे के आते हैं और जज़्बात खेल चले जाते हैं

 

लोग अपने फायदे के आते हैं और जज़्बात खेल चले जाते हैं

आज के दौर में रिश्ते कम और ज़रूरतें ज़्यादा दिखाई देती हैं। इंसान जब तक किसी के काम का होता है, तब तक उसे अपना कहा जाता है। जैसे ही फायदा खत्म, वैसे ही अपनापन भी खत्म। यही समाज की सबसे कड़वी सच्चाई बन चुकी है—लोग अपने स्वार्थ के लिए आते हैं और जज़्बातों से खेलकर चले जाते हैं।

कई लोग हमारे जीवन में दोस्त बनकर आते हैं, हमदर्द बनकर आते हैं, अपना बनकर आते हैं। वे हमारी बातों में अपनापन भर देते हैं, हमारी कमजोरियों को समझने का नाटक करते हैं और हमारी भावनाओं को सहारा देने का दिखावा करते हैं। लेकिन असल में उनका उद्देश्य सिर्फ इतना होता है कि वे हमसे कुछ हासिल कर लें—पैसा, फायदा, पहचान, सहारा या कोई ज़रूरत।

जब तक हम उनके काम आते हैं, तब तक वे हमारे आसपास मंडराते रहते हैं। हमारे दुख में झूठे आँसू बहाते हैं, हमारे सुख में नकली मुस्कान दिखाते हैं और हमारे साथ ऐसे पेश आते हैं जैसे वही सबसे अपने हों। लेकिन जैसे ही उनकी जरूरत पूरी होती है, वे धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं। फिर संदेशों का जवाब नहीं आता, फोन उठना बंद हो जाता है, और सबसे दुखद बात यह कि वो इंसान अचानक हमें अजनबी बना देता है।

ऐसे लोग रिश्तों को दिल से नहीं निभाते, वे रिश्तों को सिर्फ एक सौदे की तरह देखते हैं। उनके लिए दोस्ती भी एक सीढ़ी है, प्यार भी एक साधन है और भरोसा भी एक हथियार। वे दूसरों की भावनाओं को खिलौना समझते हैं और उन्हें तोड़कर भी खुद को सही साबित कर लेते हैं।

सबसे बड़ी चोट तब लगती है जब हमें एहसास होता है कि जिसे हमने अपना समझा, उसने हमें सिर्फ इस्तेमाल किया। जज़्बात सच्चे थे हमारे, पर सामने वाला सिर्फ अभिनय कर रहा था। हम उसे अपना मानते रहे और वह हमें मौका समझता रहा।

पर इन अनुभवों से एक बात जरूर सीखने को मिलती है—
हर मुस्कुराता चेहरा अपना नहीं होता, और हर मीठी बात में सच्चाई नहीं होती।

आज जरूरत है कि हम रिश्तों में दिल के साथ-साथ दिमाग भी रखें। भरोसा करें, लेकिन आँख बंद करके नहीं। अपने जज़्बातों की कीमत समझें, क्योंकि हर कोई उन्हें समझने के लायक नहीं होता।

अंत में बस इतना कहना है—
जो लोग अपने फायदे के लिए आते हैं, वे कभी अपने नहीं हो सकते।
और जो जज़्बातों से खेलकर चले जाते हैं, वे इंसान नहीं, बस मतलब के सौदागर होते हैं।

सच्चे रिश्ते वही हैं जो जरूरत में नहीं, बल्कि मुश्किल में साथ निभाएं।

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