राजमहंत स्व. श्री छोटुलाल मार्कंडेय : बस्तर की माटी का वह दीप, जिसकी लौ आज भी समाज को आलोकित कर रही है
संजीव कुमार ~ इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों से नहीं बनता; इतिहास उन साधारण लोगों के असाधारण कर्मों से भी लिखा जाता है, जो अपने जीवन को समाज के उत्थान के लिए समर्पित कर देते हैं। ऐसे ही युगद्रष्टा, कर्मयोगी और समाज सुधारक थे राजमहंत स्व. छोटूलाल मार्कंडेय। 3 जुलाई का दिन हमें उस महान व्यक्तित्व की स्मृतियों से जोड़ता है, जिसने अपना संपूर्ण जीवन शिक्षा, सामाजिक समानता, मानव सेवा और जनजागरण के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन इस सत्य का साक्षी है कि व्यक्ति का कद उसके पद से नहीं, बल्कि उसके विचारों, कर्मों और समाज पर पड़े प्रभाव से मापा जाता है। 9 अप्रैल 1959 को छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के कोंडागांव में जन्मे राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय का बचपन सामान्य परिस्थितियों में बीता, किंतु उनके विचार और संकल्प असाधारण थे। पिता स्वर्गीय श्री के राम मार्कंडेय तथा माता श्रीमती केजा मार्कंडेय के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को करुणा, संवेदनशीलता और सेवा की भावना से समृद्ध किया। परिवार की दस संतानों में सबसे छोटे होने के कारण वे स्नेह से "छोटू" कहलाए, पर समय के साथ यही "छोटू" समाज के लिए एक बड़े विचार और महान प्रेरणा के रूप में स्थापित हुए। उन्होंने शिक्षा को केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना। शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने अनुभव किया कि जब तक समाज में ज्ञान का प्रकाश प्रत्येक घर तक नहीं पहुँचेगा, तब तक समानता, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय की कल्पना अधूरी रहेगी। इसी उद्देश्य से उन्होंने स्वयं उच्च शिक्षा प्राप्त की और समाजशास्त्र का गंभीर अध्ययन किया, ताकि समाज की समस्याओं को समझकर उनके समाधान की दिशा में सार्थक प्रयास किए जा सकें। राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। वे शिक्षक, समाजशास्त्री, लेखक, गायक और सबसे बढ़कर एक संवेदनशील समाजसेवक थे। साहित्य और संगीत उनके लिए केवल अभिव्यक्ति के माध्यम नहीं थे, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने के सशक्त साधन थे। उनके शब्दों में प्रेरणा थी, उनके विचारों में परिवर्तन की शक्ति थी और उनके व्यक्तित्व में लोगों को साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने सामाजिक भेदभाव, अशिक्षा, रूढ़ियों और असमानता के विरुद्ध निरंतर आवाज़ उठाई। उनके विचारों, व्यक्तित्व और सामाजिक कार्यों पर बाबा गुरु घासीदास जी के दर्शन का अत्यंत गहरा प्रभाव था। बाबा गुरु घासीदास जी द्वारा प्रतिपादित "सतनाम", सत्य, समानता, मानवता, अहिंसा, सदाचार और समरसता के सिद्धांतों को उन्होंने अपने जीवन का मूल आधार बनाया। उनका दृढ़ विश्वास था कि सभी मनुष्य समान हैं तथा समाज की वास्तविक उन्नति तभी संभव है, जब जाति, ऊँच-नीच, छुआछूत और हर प्रकार के भेदभाव का पूर्णतः अंत हो। इसी मानवीय और समतामूलक विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने सतनामी समाज सहित समूचे समाज में संगठन, आत्मसम्मान, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और नैतिक मूल्यों का व्यापक संदेश पहुँचाया। उनके लिए समाज सेवा कोई अवसर या दायित्व मात्र नहीं, बल्कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य थी। वे मानते थे कि जिस समाज ने हमें पहचान, संस्कार और अस्तित्व दिया है, उसके विकास और उत्थान के लिए कार्य करना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है। उनके प्रत्येक सामाजिक अभियान, जनजागरण, शिक्षा-प्रसार और समाज सुधार के प्रयासों में बाबा गुरु घासीदास जी के मानवतावादी, समतावादी और सत्यनिष्ठ दर्शन की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। यही कारण था कि उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सत्य, सेवा, सद्भाव और समानता के मूल्यों को व्यवहार में उतारते हुए समाज के लिए प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी सादगी, विनम्रता और निष्काम सेवा ने उन्हें जन-जन के हृदय में स्थान दिलाया। वे मंचों पर जितने प्रभावशाली वक्ता थे, व्यवहार में उतने ही सहज और आत्मीय। वे लोगों की समस्याएँ सुनते थे, समाधान खोजते थे और बिना किसी स्वार्थ के समाज के बीच कार्य करते थे। यही कारण है कि उन्हें सम्मानपूर्वक "बस्तर माटी पुत्र" कहा गया। यह सम्मान किसी पद या पुरस्कार से नहीं, बल्कि जनता के प्रेम, विश्वास और सम्मान से प्राप्त हुआ। उनके जीवन की इस महान यात्रा में धर्म गुरु राजा गुरु बाल दास साहेब जी, उनके परिवार और सहयोगियों का स्नेह, विश्वास तथा निरंतर सहयोग भी एक सुदृढ़ आधार रहा। उनके बड़े भाई श्री उदयलाल मार्कंडेय सदैव उनके अभिभावक, मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत बने रहे। वहीं छोटे भाई एवं आत्मीय मित्र श्री आशाराम मार्कंडेय ने जीवन के प्रत्येक संघर्ष, सामाजिक अभियान और पारिवारिक दायित्वों में कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ निभाया। उनके बीच का संबंध केवल भाईचारे का नहीं, बल्कि समान विचारों, सामाजिक प्रतिबद्धता और अटूट विश्वास का प्रतीक था। इसी प्रकार उनके संघर्षपूर्ण सामाजिक जीवन में श्री राधाकृष्ण बंजारे तथा श्री लखमूराम टंडन , सुर्यावंसी सर जी , शीतल मारे , श्री स्व डीपी घृतलहरे जी , राम दास मार्कंडेय , श्री गोविन्द कोसरे , एवं अन्य समर्पित सहयोगियों का साथ भी अंतिम समय तक बना रहा। इन सभी साथियों ने समाज सेवा, जनजागरण और सामाजिक संगठन के कार्यों में उनके साथ निरंतर सक्रिय भूमिका निभाई। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी इनका विश्वास, सहयोग और आत्मीयता राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय जी के संकल्पों को नई शक्ति प्रदान करती रही। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि बड़े सामाजिक परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि परिवार, मित्रों और समर्पित सहयोगियों के सामूहिक विश्वास, परिश्रम और समर्पण से संभव होते हैं। 3 जुलाई 2004 को उनका पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, किंतु उनके विचार, उनके संस्कार और उनके द्वारा जलाया गया सामाजिक चेतना का दीप आज भी अनगिनत लोगों के जीवन को प्रकाशित कर रहा है। ऐसे व्यक्तित्व कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होते वे अपने आदर्शों, कार्यों और प्रेरणाओं के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित एवं रहते हैं। आज, उनके स्मृति दिवस पर हम केवल उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित न करें, बल्कि उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाने का संकल्प भी लें। शिक्षा का दीप हर घर तक पहुँचे, समाज में समानता और भाईचारा सुदृढ़ हो, मानव सेवा जीवन का सर्वोच्च धर्म बने और नई पीढ़ी अपने इतिहास तथा महापुरुषों से प्रेरणा लेकर समाज निर्माण में अपना योगदान दे—यही राजमहंत छोटूलाल मार्कंडेय जी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनका जीवन हमें सिखाता है कि महानता जन्म से नहीं, कर्म से प्राप्त होती है। जो व्यक्ति अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए जीता है, वही समय की सीमाओं से परे जाकर अमर हो जाता है। राजमहंत स्व छोटूलाल मार्कंडेय ऐसे ही अमर व्यक्तित्व हैं, जिनकी स्मृति, प्रेरणा और विचार सदैव समाज का पथ आलोकित करते रहेंगे।
