भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य (India: A Secular State)
भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। यहाँ सभी धर्मावलंबियों के साथ समान व्यवहार किया जाता है। भारत में धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य यह है कि राज्य धर्म के मामलों में पूर्णतः तटस्थ रहता है। राज्य प्रत्येक धर्म को समान रूप से संरक्षण प्रदान करता है तथा किसी विशेष धर्म का पक्ष नहीं लेता। भारतीय धर्मनिरपेक्षता न तो ईश्वर-विरोधी है और न ही ईश्वर-समर्थक; यह आस्तिक, नास्तिक तथा संशयवादी सभी व्यक्तियों को समान दृष्टि से देखती है।
भारतीय संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत राज्य को ईश्वर के संबंध में किसी प्रकार का निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया गया है। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि धर्म के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव न किया जाए। धर्मनिरपेक्ष राज्य का संबंध मनुष्यों के पारस्परिक संबंधों से होता है, जबकि मनुष्य और ईश्वर के मध्य संबंध राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
भारत में प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने तथा अपनी इच्छा के अनुसार ईश्वर की उपासना करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 25(1) के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए धर्म को मानने, उसका आचरण करने तथा उसका प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है।
किन्तु धार्मिक स्वतंत्रता का यह अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों की भाँति पूर्ण (Absolute) नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 25(2) के उपखंड (क) एवं (ख) के अंतर्गत राज्य इस अधिकार पर विधि द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है—
(क) धार्मिक आचरण से संबंधित किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक अथवा अन्य लौकिक गतिविधियों को विनियमित या नियंत्रित करने के लिए।
(ख) सामाजिक कल्याण एवं सुधार के लिए अथवा हिंदुओं की सार्वजनिक धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों एवं समुदायों के लिए खोलने के उद्देश्य से।
डोनाल्ड ई. स्मिथ ने लिखा है कि “धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है जो व्यक्ति और व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करता है। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो, उसे नागरिक होने की मान्यता प्रदान करता है। वह किसी विशिष्ट धर्म से संवैधानिक रूप से संबद्ध नहीं होता और न ही किसी धर्म विशेष की उन्नति अथवा अवनति से संबंधित होता है।”
प्रोफेसर स्मिथ के अनुसार धर्मनिरपेक्ष राज्य की इस परिभाषा में राज्य, धर्म और व्यक्ति के परस्पर संबंधित किन्तु स्वतंत्र संबंधों के तीन समूह सम्मिलित हैं—
धर्म और व्यक्ति का संबंध – व्यक्ति तथा व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी।
राज्य और व्यक्ति का संबंध – बिना किसी धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति को नागरिकता की समान मान्यता।
राज्य और विभिन्न धर्मों का संबंध – राज्य किसी विशिष्ट धर्म से संवैधानिक रूप से संबद्ध न हो, अर्थात धर्म और राज्य के बीच पृथकता हो।
इस प्रकार धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है जिसमें राज्य प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, किसी विशेष धर्म से स्वयं को नहीं जोड़ता तथा धर्म और राज्य के बीच पृथकता स्थापित करता है।
इस परिभाषा के आधार पर भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान की गई है। इसके अनुसार सभी व्यक्तियों को समान रूप से अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा अपने धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है।
अनुच्छेद 26 के अनुसार प्रत्येक धर्म के अनुयायी धार्मिक एवं दान संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्थाएँ स्थापित कर सकते हैं तथा धर्म संबंधी मामलों का प्रबंधन स्वयं कर सकते हैं। अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित एवं संचालित करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
भारतीय संविधान के उपर्युक्त अनुच्छेद व्यक्तियों एवं व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करते हैं। इसलिए भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है।
भारत को धर्मनिरपेक्ष देश इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 बिना किसी धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति को समान नागरिकता की मान्यता प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर राज्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा। अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्य के अधीन किसी पद पर नियुक्ति अथवा रोजगार के मामलों में सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान किए जाएंगे।
अनुच्छेद 29 के अनुसार राज्य से सहायता प्राप्त किसी भी शैक्षणिक संस्था में किसी नागरिक को धर्म, जाति, भाषा या वंश के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता। हाँ, सामाजिक न्याय एवं मानवतावादी मूल्यों के आधार पर राज्य अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को कुछ विशेष अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 330 और 332 के अनुसार संसद तथा राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए कुछ सीटें आरक्षित की गई हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 27, 28 और 29 इस बात की पुष्टि करते हैं कि धर्म और राज्य के बीच पृथकता है। भारतीय राज्य सभी धर्मों के प्रति तटस्थ नीति अपनाता है। वह धार्मिक उद्देश्यों के लिए किसी विशेष धर्म के प्रचार हेतु कर नहीं लगाता तथा राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा को प्रोत्साहित नहीं करता। इन आधारों पर भारतीय राज्य को धर्मनिरपेक्ष राज्य की संज्ञा दी जा सकती है।
प्रोफेसर स्मिथ के अनुसार भारतीय संविधान भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य के निर्माण के लिए एक शक्तिशाली आधार है। धर्मनिरपेक्ष राज्य के विकास में भारत के बहुसंख्यक हिंदू धर्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अन्य धर्मों के प्रति इस धर्म की सहिष्णुता सदैव रही है। इसके अतिरिक्त, हिंदू समाज में संगठनात्मक एकरूपता के अभाव के कारण “हिंदू राज्य” की अवधारणा को व्यापक समर्थन नहीं मिला।
आधुनिक भारत में पश्चिमीकरण, नगरीकरण, औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएँ तीव्र गति से विकसित हो रही हैं। इनके परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार, नातेदारी, जाति और पारंपरिक धार्मिक विश्वासों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होने लगा है। साथ ही, आधुनिक एवं उच्च शिक्षा का प्रसार भी बढ़ रहा है। इन सभी प्रक्रियाओं ने भारतीय समाज को प्रभावित किया है तथा लोगों में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का विकास किया है। जैसे-जैसे भारत में धर्मनिरपेक्षता के मूल्य विकसित होते जाएंगे, वैसे-वैसे धर्मनिरपेक्ष राज्य की जड़ें और अधिक मजबूत होती जाएंगी।
भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि सभी धर्मों के लोग स्वयं को एक समान भारतीय नागरिक मानते हैं। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि जब-जब भारत पर बाहरी आक्रमण हुए, तब विभिन्न धर्मों, जातियों, प्रदेशों और भाषाओं के लोगों ने एकजुट होकर राष्ट्र की रक्षा की। ऐसे अवसरों पर भारतीयों ने एकता, सहिष्णुता, राष्ट्रीयता और भाईचारे का जो परिचय दिया, वह भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का सशक्त प्रमाण है। भारत में धर्मनिरपेक्षता संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
1. S.R. Bommai v. Union of India (1994)
यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल ढाँचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
42nd Constitutional Amendment द्वारा संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द जोड़े गए थे।
बाद में इन शब्दों को हटाने की माँग वाली याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार करते हुए कहा कि:
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ:
भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। यहाँ सभी धर्मावलंबियों के साथ समान व्यवहार किया जाता है। भारत में धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य यह है कि राज्य धर्म के मामलों में पूर्णतः तटस्थ रहता है। राज्य प्रत्येक धर्म को समान रूप से संरक्षण प्रदान करता है तथा किसी विशेष धर्म का पक्ष नहीं लेता। भारतीय धर्मनिरपेक्षता न तो ईश्वर-विरोधी है और न ही ईश्वर-समर्थक; यह आस्तिक, नास्तिक तथा संशयवादी सभी व्यक्तियों को समान दृष्टि से देखती है।
भारतीय संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत राज्य को ईश्वर के संबंध में किसी प्रकार का निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया गया है। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि धर्म के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव न किया जाए। धर्मनिरपेक्ष राज्य का संबंध मनुष्यों के पारस्परिक संबंधों से होता है, जबकि मनुष्य और ईश्वर के मध्य संबंध राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।
भारत में प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने तथा अपनी इच्छा के अनुसार ईश्वर की उपासना करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 25(1) के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए धर्म को मानने, उसका आचरण करने तथा उसका प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है।
किन्तु धार्मिक स्वतंत्रता का यह अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों की भाँति पूर्ण (Absolute) नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 25(2) के उपखंड (क) एवं (ख) के अंतर्गत राज्य इस अधिकार पर विधि द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है—
(क) धार्मिक आचरण से संबंधित किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक अथवा अन्य लौकिक गतिविधियों को विनियमित या नियंत्रित करने के लिए।
(ख) सामाजिक कल्याण एवं सुधार के लिए अथवा हिंदुओं की सार्वजनिक धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों एवं समुदायों के लिए खोलने के उद्देश्य से।
डोनाल्ड ई. स्मिथ ने लिखा है कि “धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है जो व्यक्ति और व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करता है। प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो, उसे नागरिक होने की मान्यता प्रदान करता है। वह किसी विशिष्ट धर्म से संवैधानिक रूप से संबद्ध नहीं होता और न ही किसी धर्म विशेष की उन्नति अथवा अवनति से संबंधित होता है।”
प्रोफेसर स्मिथ के अनुसार धर्मनिरपेक्ष राज्य की इस परिभाषा में राज्य, धर्म और व्यक्ति के परस्पर संबंधित किन्तु स्वतंत्र संबंधों के तीन समूह सम्मिलित हैं—
धर्म और व्यक्ति का संबंध – व्यक्ति तथा व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी।
राज्य और व्यक्ति का संबंध – बिना किसी धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति को नागरिकता की समान मान्यता।
राज्य और विभिन्न धर्मों का संबंध – राज्य किसी विशिष्ट धर्म से संवैधानिक रूप से संबद्ध न हो, अर्थात धर्म और राज्य के बीच पृथकता हो।
इस प्रकार धर्मनिरपेक्ष राज्य वह है जिसमें राज्य प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, किसी विशेष धर्म से स्वयं को नहीं जोड़ता तथा धर्म और राज्य के बीच पृथकता स्थापित करता है।
इस परिभाषा के आधार पर भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान की गई है। इसके अनुसार सभी व्यक्तियों को समान रूप से अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा अपने धर्म का पालन, आचरण और प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है।
अनुच्छेद 26 के अनुसार प्रत्येक धर्म के अनुयायी धार्मिक एवं दान संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्थाएँ स्थापित कर सकते हैं तथा धर्म संबंधी मामलों का प्रबंधन स्वयं कर सकते हैं। अनुच्छेद 30 के अनुसार अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित एवं संचालित करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
भारतीय संविधान के उपर्युक्त अनुच्छेद व्यक्तियों एवं व्यक्तियों के समूहों को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करते हैं। इसलिए भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है।
भारत को धर्मनिरपेक्ष देश इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 बिना किसी धार्मिक भेदभाव के प्रत्येक व्यक्ति को समान नागरिकता की मान्यता प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर राज्य किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा। अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्य के अधीन किसी पद पर नियुक्ति अथवा रोजगार के मामलों में सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान किए जाएंगे।
अनुच्छेद 29 के अनुसार राज्य से सहायता प्राप्त किसी भी शैक्षणिक संस्था में किसी नागरिक को धर्म, जाति, भाषा या वंश के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता। हाँ, सामाजिक न्याय एवं मानवतावादी मूल्यों के आधार पर राज्य अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को कुछ विशेष अधिकार प्रदान करता है। अनुच्छेद 330 और 332 के अनुसार संसद तथा राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए कुछ सीटें आरक्षित की गई हैं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 27, 28 और 29 इस बात की पुष्टि करते हैं कि धर्म और राज्य के बीच पृथकता है। भारतीय राज्य सभी धर्मों के प्रति तटस्थ नीति अपनाता है। वह धार्मिक उद्देश्यों के लिए किसी विशेष धर्म के प्रचार हेतु कर नहीं लगाता तथा राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा को प्रोत्साहित नहीं करता। इन आधारों पर भारतीय राज्य को धर्मनिरपेक्ष राज्य की संज्ञा दी जा सकती है।
प्रोफेसर स्मिथ के अनुसार भारतीय संविधान भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य के निर्माण के लिए एक शक्तिशाली आधार है। धर्मनिरपेक्ष राज्य के विकास में भारत के बहुसंख्यक हिंदू धर्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अन्य धर्मों के प्रति इस धर्म की सहिष्णुता सदैव रही है। इसके अतिरिक्त, हिंदू समाज में संगठनात्मक एकरूपता के अभाव के कारण “हिंदू राज्य” की अवधारणा को व्यापक समर्थन नहीं मिला।
आधुनिक भारत में पश्चिमीकरण, नगरीकरण, औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएँ तीव्र गति से विकसित हो रही हैं। इनके परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार, नातेदारी, जाति और पारंपरिक धार्मिक विश्वासों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होने लगा है। साथ ही, आधुनिक एवं उच्च शिक्षा का प्रसार भी बढ़ रहा है। इन सभी प्रक्रियाओं ने भारतीय समाज को प्रभावित किया है तथा लोगों में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का विकास किया है। जैसे-जैसे भारत में धर्मनिरपेक्षता के मूल्य विकसित होते जाएंगे, वैसे-वैसे धर्मनिरपेक्ष राज्य की जड़ें और अधिक मजबूत होती जाएंगी।
भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि सभी धर्मों के लोग स्वयं को एक समान भारतीय नागरिक मानते हैं। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि जब-जब भारत पर बाहरी आक्रमण हुए, तब विभिन्न धर्मों, जातियों, प्रदेशों और भाषाओं के लोगों ने एकजुट होकर राष्ट्र की रक्षा की। ऐसे अवसरों पर भारतीयों ने एकता, सहिष्णुता, राष्ट्रीयता और भाईचारे का जो परिचय दिया, वह भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का सशक्त प्रमाण है। भारत में धर्मनिरपेक्षता संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
1. S.R. Bommai v. Union of India (1994)
यह भारतीय धर्मनिरपेक्षता से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
- धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) का अभिन्न अंग है।
- संसद संविधान संशोधन द्वारा भी इस सिद्धांत को समाप्त नहीं कर सकती।
- राज्य का कोई अपना धर्म नहीं होगा।
- सरकार यदि धर्म के आधार पर कार्य करती है तो यह संविधान के विरुद्ध माना जाएगा।
- अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लगाने की न्यायिक समीक्षा भी संभव है।
इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल ढाँचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
- संसद संविधान में संशोधन कर सकती है,
- लेकिन संविधान के मूल ढाँचे को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती।
- लोकतंत्र, विधि का शासन, न्यायिक समीक्षा तथा भारत का धर्मनिरपेक्ष चरित्र संविधान की मूल विशेषताओं में सम्मिलित हैं।
42nd Constitutional Amendment द्वारा संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" शब्द जोड़े गए थे।
बाद में इन शब्दों को हटाने की माँग वाली याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार करते हुए कहा कि:
- धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूल भावना है।
- यह केवल प्रस्तावना में जोड़ा गया शब्द नहीं, बल्कि संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में निहित सिद्धांत है।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि:
- अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को धर्म मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है।
- किंतु धर्म प्रचार करने का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति को बलपूर्वक, कपटपूर्वक या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना नहीं है।
- इसलिए जबरन धर्म परिवर्तन रोकने वाले कानून संवैधानिक हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ:
- राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं होगा।
- सभी धर्मों को समान संरक्षण और सम्मान मिलेगा।
- नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी।
- राज्य किसी धर्म का पक्ष या विरोध नहीं करेगा।
- धार्मिक आधार पर भेदभाव असंवैधानिक होगा।
इस प्रकार संविधान के अंतर्गत धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना होने से धर्म संबंधी संकीर्ण विचारधाराओं में परिवर्तन आया है तथा धार्मिक भेदभाव में कमी आई है। विभिन्न धर्मावलंबी एक-दूसरे के साथ सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और कुछ अपवादों को छोड़कर देश में सामाजिक सद्भाव, सहिष्णुता तथा राष्ट्रीय एकता का वातावरण विकसित हुआ है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता का मूल उद्देश्य सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता तथा सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है। यह भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जो विविधता में एकता की भावना को सुदृढ़ करती है।