Sunday, September 6, 2026

1857 से बहुत पहले छत्तीसगढ़ में गूंज उठा था विद्रोह का स्वर: गैंदसिंह, गुरु बालक दास से वीर नारायण सिंह तक

लेखक: -  संजीव कुमार  
जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा होती है, तो इतिहास की किताबों में वर्ष 1857 को एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में याद किया जाता है। मेरठ से शुरू होकर दिल्ली, कानपुर, झांसी, अवध और देश के दूसरे हिस्सों तक फैले इस विद्रोह ने ब्रिटिश सत्ता की नींव को गहरी चुनौती दी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पांडे, तात्या टोपे, कुंवर सिंह और बहादुर शाह जफर जैसे नाम इस संघर्ष के प्रतीक बन गए।

भारत के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेजी सत्ता और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ संघर्ष 1857 से कई दशक पहले शुरू हो चुके थे। विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय समाज ने जमीन, जंगल, आजीविका, स्वायत्तता और अपने सामाजिक जीवन पर बढ़ते बाहरी नियंत्रण का लगातार विरोध किया।
छत्तीसगढ़ भी इस प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण भूमि रहा है। आज जब हम छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता आंदोलन और आदिवासी इतिहास को देखते हैं, तो परलकोट के गैंदसिंह और सोनाखान के वीर नारायण सिंह दो ऐसे नाम हैं, जिनके संघर्षों को एक व्यापक ऐतिहासिक परंपरा के संदर्भ में समझना आवश्यक है। गैंदसिंह का परलकोट विद्रोह 1824-25 में हुआ — अर्थात 1857 के विद्रोह से लगभग तीन दशक पहले। वहीं वीर नारायण सिंह ने 1857 के दौर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया और दिसंबर 1857 में शहीद हुए। इसलिए छत्तीसगढ़ का इतिहास हमें बताता है कि यहां स्वतंत्रता और स्वशासन की आकांक्षा 1857 में अचानक पैदा नहीं हुई थी। इसकी जड़ें उससे बहुत पहले स्थानीय समाज के प्रतिरोध में दिखाई देती हैं। परलकोट: जहां 1857 से तीन दशक पहले उठी विद्रोह की आवाज छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर क्षेत्र में स्थित परलकोट का इतिहास आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में विशेष स्थान रखता है।
19वीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में यह क्षेत्र बाहरी प्रशासनिक और आर्थिक हस्तक्षेप के बढ़ते दबाव का सामना कर रहा था। मराठा शासन, उसके कर्मचारियों तथा बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती राजनीतिक शक्ति ने स्थानीय व्यवस्था को प्रभावित किया। इसी वातावरण में हल्बा जनजाति के जमींदार गैंदसिंह एक महत्वपूर्ण स्थानीय नेता के रूप में सामने आए।  गैंदसिंह का संघर्ष केवल किसी व्यक्तिगत सत्ता या जमींदारी विवाद तक सीमित नहीं था। इसके पीछे स्थानीय जनता पर बढ़ते दबाव, आर्थिक शोषण और बाहरी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ असंतोष था। परलकोट और आसपास के अबूझमाड़ क्षेत्र के आदिवासियों ने इस हस्तक्षेप का प्रतिरोध किया। अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ आदिवासी समाज का संगठन परलकोट विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी—स्थानीय समुदाय का सामूहिक संगठन। आदिवासी समाज के पास आधुनिक हथियार नहीं थे। उनके पास पारंपरिक हथियार थे—धनुष, तीर और अन्य स्थानीय अस्त्र। लेकिन जंगल और पहाड़ी भूगोल उनकी ताकत था। विद्रोहियों ने प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय छापामार शैली अपनाई। छोटे-छोटे समूहों में निकलकर बाहरी अधिकारियों और शासन के सहयोगियों पर हमले किए जाते थे। स्थानीय सामाजिक संस्थाएं भी इस संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। आदिवासी समाज में गोटुल केवल सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था नहीं था; ऐसे समय में सामुदायिक संवाद और संगठन के लिए भी उसका महत्व था। परलकोट के संघर्ष के संदर्भ में गोटुल को रणनीतिक बैठकों और सामुदायिक निर्णयों से जोड़कर देखा जाता है। यह तथ्य हमें यह समझने में मदद करता है कि आदिवासी प्रतिरोध केवल हथियार उठाने की घटना नहीं था। उसके पीछे समाज को संगठित करने वाली अपनी संस्थाएं और सामुदायिक संरचनाएं भी थीं। महिलाओं की भूमिका भी रही महत्वपूर्ण परलकोट के संघर्ष की चर्चा करते समय एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—आदिवासी महिलाओं की भागीदारी। विद्रोह केवल पुरुषों तक सीमित नहीं था। स्थानीय समुदाय की महिलाएं भी संघर्ष में पुरुषों के साथ शामिल हुईं। यह तथ्य उस व्यापक धारणा को चुनौती देता है जिसमें स्वतंत्रता संघर्ष को केवल कुछ प्रसिद्ध पुरुष नेताओं की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। आदिवासी समाज में सामुदायिक जीवन और संघर्ष की प्रकृति ऐसी थी कि पूरा समुदाय किसी संकट का सामना सामूहिक रूप से करता था। इसलिए परलकोट विद्रोह को समझते समय हमें इसे केवल “गैंदसिंह का विद्रोह” कहकर समाप्त नहीं कर देना चाहिए। यह स्थानीय आदिवासी समाज के सामूहिक प्रतिरोध की कहानी भी है।गैंदसिंह की गिरफ्तारी और शहादत लगभग एक वर्ष तक चले इस संघर्ष ने ब्रिटिश प्रशासन को परेशान कर दिया। अंततः अंग्रेजी प्रशासन ने इस विद्रोह को दबाने के लिए सैन्य कार्रवाई का सहारा लिया। चांदा क्षेत्र से सैनिक बुलाए गए और जनवरी 1825 में परलकोट को घेर लिया गया। सोनाखान के जमींदार नारायण सिंह का नाम छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता इतिहास में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका संबंध  वीर नारायण सिंह   बिंझवार जनजाति से था। उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी संघर्षों से जुड़ी हुई थी। मराठा शासन के विस्तार के दौरान सोनाखान जमींदारी पर भी बाहरी राजनीतिक दबाव बढ़ा। नारायण सिंह ने इसी वातावरण में अपनी राजनीतिक चेतना विकसित की।1856 का अकाल और जनता के लिए अनाज 1856 में छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में भयंकर अकाल पड़ा। अकाल का सबसे अधिक प्रभाव गरीब किसानों, मजदूरों और आम जनता पर पड़ा। ऐसे समय में सोनाखान के जमींदार नारायण सिंह ने जनता की सहायता के लिए कदम उठाया। आलेखों और स्थानीय इतिहास परंपरा के अनुसार, उन्होंने एक व्यापारी के गोदाम में जमा अनाज को जनता के लिए उपलब्ध कराया और भूख से पीड़ित लोगों में उसका वितरण करवाया। आज के दृष्टिकोण से देखें तो यह घटना केवल अनाज वितरण की कहानी नहीं है। यह उस समय की शासन व्यवस्था और जनता की प्राथमिक जरूरतों के बीच मौजूद टकराव को भी दिखाती है। एक तरफ भूखी जनता थी और दूसरी तरफ अनाज का भंडार।
गैंदसिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके कुछ ही दिनों बाद, 20 जनवरी 1825 को गैंदसिंह को फांसी दे दी गई। इस प्रकार परलकोट के इस आदिवासी नेता ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी शहादत 1857 से लगभग 32 वर्ष पहले हुई थी। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में 1857 के पूर्व के औपनिवेशिक विरोधी आंदोलनों की चर्चा में गैंदसिंह और परलकोट विद्रोह का विशेष महत्व है।
राजा गेंद सिंह जी , राजा गुरु बालक दास साहेब जी , वीर नारायण सिंह जी , गुरु बालकदास (जन्म 18 अगस्त 1805 ई. - मृत्यु 17 मार्च 1860 ई.) महान क्रांतिकारी, समाज सुधारक , युग पुरुष और मानवाधिकार के लिए सतनामी आंदोलन के प्रणेता व सतनाम धर्म के संस्थापक गुरु घासीदास जी के द्वितीय पुत्र तथा उत्तराधिकारी थे। गुरु बालकदास जी सतनामी आंदोलन के प्रमुख सेनापति थे। उनके महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण गुरु घासीदास जी के बाद सन 1850 मे सतनामियों का प्रमुख गुरु बनाया गया। गुरु बालकदास जी ने नेतृत्व संभालने के बाद सतनामी आंदोलन को पूर्व की भांति पुरे गति से आगे बढ़ाया। गुरु बालकदास जी का जन्म 18 अगस्त सन् 1805 ईं. को भारत के छत्तीसगढ़ मे स्थित गिरौद गांव मे गुरु घासीदास जी और सफूरा माता के पुत्र के रूप मे हुआ। राजा गुरु बालक दास जी के बड़ी बहन सहोद्रामाता तथा बड़ा भाई गुरु अमरदास थे। इनके ऊपर गुरु घासीदास जी के विचारों का प्रभाव बचपन से ही पड़ा था। इसलिए जब सन 1820 ईस्वी मे सतनामी आंदोलन प्रारंभ हुआ, तो गुरु बालकदास जी ने उसमे बढ़ चढ़कर अपना योगदान दिया और नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। गुरु बालकदास जी का विवाह ढारा नवलपुर (बेमेतरा) के निवासी सुनहरदास चतुर्वेदी की सुपुत्री व साहेब भुजबल महंत जी के बहन नीरा के साथ हुआ। बाद में गुरुजी ने चितेर सिलवट के बेटी राधा संग भी विवाह किये। गुरुबालकदास और राधा से उनके पुत्र साहेबदास जी का जन्म हुआ। और नीरा से गंगा व गलारा नाम की दो पुत्री का जन्म हुआ ! सतनामी आंदोलन 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध (विशेषकर 1820-1830 के मध्य) में गुरु घासीदास के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की धरती पर उपजा एक बहुआयामी विद्रोह था। यह केवल एक धार्मिक सुधार आंदोलन नहीं था, बल्कि जातिवाद, सामंतवाद, ब्रिटिश साम्राज्यवाद और लैंगिक उत्पीड़न के विरुद्ध एक सशक्त प्रजातांत्रिक क्रांति थी। सतनामी आंदोलन में गुरु बालकदास जी ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, आत्मरक्षा के लिए अखाड़ा प्रथा समाज मे शुरू करवाया और सशक्त शस्त्र धारी सतनाम सेना बनाया जिन्होंने मराठा शोषण कारियों से आम जनता को सुरक्षा दी। गाँव-गॉंव जाकर रावटी लगाकर सतनाम के प्रचार किया जिससे कई जाति के लोग सतनामी बने। गुरु बालकदास जी हाथी और घोड़े का सवारी करते थे, हाथी का नाम - दुलरवा और घोड़ा का नाम - सांवल मणि था 
अंगरक्षक - गुरु बालकदास जी के बारह प्रमुख निजी अंगरक्षकों के नाम इस प्रकार है, 1. सरहा, 2. जोधाई, 3. लल्लू, 4. जगधर, 5. अमरसिंघ, 6. गुलाली उर्फ गुल्ली, 7. शोभित, 8. पतंगा, 9. वीरसिंघ, 10. रजई, 11. चंदा और 12. बराती। इन बारह अंगरक्षकों में गुरु बालकदास जी के निजी सुरक्षा दस्ते में सरहा को प्रमुख का जिम्मेदारी प्राप्त था। गुरु बालकदास जी को अपने इन अंगरक्षकों के प्रतिभा, साहस और युद्ध कला पर इतना भरोसा था कि उन्होंने उस समय गांव-गांव और लगभग हर सतनामी परिवारों में प्रशिक्षित खड़ैत होने के बावजूद अपने सुरक्षा के लिए अधिक सावधानी और प्रयास नहीं किया गुरु बालकदास जी का कार्यकाल 1850 ई. के बाद - गुरू घासीदासजी के देहावसान पश्चात सतनाम आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कौन हो के प्रश्न पर सतनाम संगठन-समाज में विचार-विमर्श हुआ। चूंकि गुरूघासीदास ने व्यक्ति महत्ता के स्थान पर समाज महत्ता पर जोर दिया था। समाज में गंभीर चर्चा के बाद यह तय हुआ कि सतनाम आन्दोलन को चलाने में गुरुघासीदास के साथ समाज - संगठन के शक्ति निर्माण में उनके द्वितीय पुत्र बालकदास ने बराबर का साथ नेतृत्व प्रदान किया था। इसलिए उन्हें ही गुरू मुखिया बनाया जाय। समाज के नेतृत्व के लिए कार्य कुशलता तथा नेतृत्व क्षमता को ही आधार माना जाएगा। किसी वंश परंपरा को नहीं। यह निर्णय कार्यक्षमता के आधार पर लिया गया, किसी वंशानुक्रम के तहत नहीं गुरु बालकदास और वीर नारायण सिंह गुरु बालकदास जी का प्रभाव आदिवासियों के ऊपर भी था। सोनाखान के आदिवासी नेता वीर नारायण सिंह से उनका मित्रतापूर्ण संबंध था। वीर नारायण सिंह ने अपने सशस्त्र लड़ाकों में गुरु बालकदास द्वारा स्थापित सतनाम सेना के प्रशिक्षित सेनानीयों को सम्मिलित किया था। वीर नारायण सिंह की पहली गिरफ्तारी के बाद वे रायपुर सेट्रंल जेल की दीवार फांद कर फरार होकर गुरु बालकदास के पास भंडारपुरी आए। गुरु बालकदास जी ने सतनाम सेना के द्वारा उसे सुरक्षित सोनाखान पहुंचवाया। 
मालिक मकबूजा कानून - सन 1857 मे भारत मे ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सैन्य विद्रोह हुआ। जिसे इस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पुरी तरह विफल कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत का शासन कंपनी के हांथ से अपने अधिन कर लिया। सुव्यवस्थित रूप से शासन करने के लिए मालिक मकबूजा कानून लागू किया गया। जिसके तहत ऐसे काश्तकार जो अपने जमीनों पर सन 1840 से काश्तकारी कर रहे हो, उनको सर्वे के बाद मालिकाना हक देने का फैसला किया गया था। सतनामी आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ के लोगों ने पेशवाशाही मराठों के द्वारा अपने छिने हुए भूमि संपत्तियों पर दोबारा अधिकार कर लिया था। मैदानी क्षेत्र के लगभग आधे भूभाग पर अपने जनसंख्या सतनामियों का जनसंख्या छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों मे आधा था] के अनुपात मे कब्जा था। नये कानून से उन सभी भूमि संपत्तियों पर सतनामियों का कानून अधिकार होता।
राजा गुरु - मालिक मकबूजा कानून मे यह भी प्रावधान था, कि अगर कोई विवाद होता है। तो उस क्षेत्र के मान्य मुखिया के राय को महत्व देते हुए निर्णय लिया जाएगा। गुरु बालकदास को मैदानी इलाकों के आधी आबादी के लोग अपने गुरु और मुखिया मानती थी। नये कानूनी प्रावधान से उनका हैसियत किसी न्यायाधीश या राजा का तरह हो चुका था, इसलिए आमजन उन्हें राजा गुरु कहते थे। गुरु बालकदास जी के हत्या का षड्यंत्र मालिक मकबूजा कानून से जातिवादी सामंती ताकतों मे खलबली मच गया। क्योंकि वे जानते थे कि एक बार अगर सरकारी दस्तावेजों मे जमीनों के वास्तविक मालिकों का नाम दर्ज हो गया। तो उनको बेदखल नहीं कर सकते। वे गुरु बालकदास जी के रहते सतनामियों के विरुद्ध कुछ भी कार्यवाही नहीं कर सकते थे। छत्तीसगढ़ मे किसी का साहस नही था, की कोई उनको टेढ़ी नजर से भी देख सके। इसलिए सामंती तत्वों ने गुरु बालकदास जी के हत्या करने का राष्ट्रव्यापी षड़यंत्र किया। छत्तीसगढ़ से बाहर के अपराधी किस्म के लोगों को कहा गया कि छत्तीसगढ़ मे एक आदमी का हत्या करना है, और यहां के हजारों हजार एकड़ जमीन पर कब्जा करना है। बाहरी अपराधियों को छत्तीसगढ़ बुलाया गया उनको सैन्य प्रशिक्षण दिया गया।
गुरु बालकदास जी की हत्या - गुरु बालकदास जी बोड़सरा बाड़ा- बिलासपुर के देखरेख का जिम्मा अपने एक भरोसेमंद अंगरक्षक को सौंपकर रामत दौरा के लिए निकले। कुछ दिनों के बाद औराबांधा- मुंगेली मे रावटी (मीटिंग) का आयोजन किया गया। जिसमें गुरु बालकदास जी गये। गुरुबालकदास जी मध्यभारत के वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के मुंगेली जिला मुख्यालय से 8-10 किलोमीटर दूर ग्राम - औराबांधा के तारिख 16 मार्च सन् 1860 ई' की रात को रात्रि विश्राम कर रहे थे कि अचानक सैकड़ों की संख्या में हथियारबंद समूह ने उनको जान से मारने के उद्देश्य से प्राणघातक हमला कर दिया। सुरक्षा में तैनात सुरक्षा दस्ता ने हमलावरों के विरुद्ध मोर्चा संभाल लिया रात कई घण्टे तक उनके अंगरक्षकों ने हमलावरों को मुहतोड़ जवाब दिया। स्वयं गुरुबालकदास ने भी उनका डटकर मुकाबला किया। हमलावरों ने सुनियोजित व संगठित होकर गुरुबालकदासजी को लक्ष्य बनाकर हमला किया था। गुरुबालकदास के सुरक्षा दस्ते के प्रमुख सरहा और जोधाई सहित सभी अंगरक्षकों ने अपने पूरे क्षमता और युद्ध कौशल से हमलावरों से लड़ा। चूंकि दुश्मनों की संख्या बहुत ज्यादा था और उनका लक्ष्य सिर्फ गुरुबालकदास था। हमला कई बार किया गया गुरुबालकदास लड़ते-लड़ते घायल हो चुके थे। हमलावरों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। इसलिए अंत में उनको भागना पड़ा सभी संघर्षरत खड़ैत एक स्थान पर इकट्ठे हुए। उन्होंने गुरुबालकदास को सतनाम आंदोलन का प्रशासनिक मुख्यालय भंडारपुर ले जाना चाहा और वे औराबांधा से भण्डारपुर की ओर ले जाने लगे। कुछ दूर जाने के बाद गुप्तचरों ने खबर दिया कि गुरुबालकदास को भण्डारपुर ले जाना उचित नहीं होगा क्योंकि ऐसा अफवाह है, कि वहां मौजूद लोग गुरु बालकदास जी को वहां जीवित या मृत किसी भी स्थिति में नहीं देखना चाहते। सुरक्षा दस्ता के लोग आश्चर्यचकित हो गये क्योंकि औराबांधा में हुए घटनाक्रम की जानकारी इतना जल्दी भण्डारपुर पहुंचने और वहां से नकारात्मक प्रतिक्रिया आने की उम्मीद किसी को नहीं थी। इसके अलावा गुरुबालकदास जी के रहते और किसी को सतनाम आंदोलन का प्रमुख नहीं बनाया गया था, तो भण्डारपुर से किसने व किस अधिकार से गुरुबालकदासजी का भण्डारपुर प्रवेश प्रतिबंधित किया। सुरक्षा दस्ता भण्डारपुर जाने वाले रास्ते को बदलकर सतनाम आंदोलन का एक अन्य महत्वपूर्ण केन्द्र नवलपुर (वर्तमान बेमेतरा जिला मुख्यालय के 6 किलोमीटर निकट का स्थान) जाने लगा। लेकिन नवलपुर पहुंचने के 8 किलोमीटर पहले कोसा नामक गांव में 17 मार्च को गंभीर रूप से घायल गुरुबालकदासजी की मृत्यु हो गयी। अंगरक्षकों ने इतनी सूचना नवलपुर में मौजूद सतनाम आंदोलन के एक अन्य महानायक साहेब भुजबल महंत को दिया। साहेब भुजबल महंत स्वयं अपने खड़ैतों को लेकर कोसा पहुंचे और गुरुबालकदासजी के मृत शरीर को नवलपुर ले आये। यहां सतनाम आंदोलनकारियों ने उन्हें अंतिम सलामी दिया। उसके बाद ससम्मान उनके मृत शरीर को अंतिम कफन -दफन किया। इस तरह गुरुबालकदासजी अपने जिंदा रहते तक लोक समाज के मानवाधिकार, रोटी और सम्मान की रक्षा में जातिवादी सामन्ती तत्वों से संघर्ष करते हुए, 17 मार्च सन् 1860 ई. को शहीद हो गये ! गुरु बालकदास जी के शहादत के बाद की स्थिति गुरुबालकदास जी के हत्या के बाद भंडार से आगरदास को गुरुगद्दी पर बैठाया गया, उन्होंने गुरुबालकदास जी हत्या व समकालीन परिस्थितियों में सतनाम समाज संगठन का साथ नहीं दिया। बल्कि सतनाम-समाज संगठन की सर्वोच्च संस्था एवं उसकी संपत्ति पर अपना कब्जा करने विविध समाजघाती कार्य किये। जिससे सतनामियों को घातक परिणाम भोगना पड़ा। कुछ वर्षों के पश्चात गुरु बालकदास जी के एकमात्र पुत्र साहेबदास जी की भी संदिग्ध मृत्यु हो गई वे निःसंतान थे, साहेबदास और आगरदास के बीच विवादित बंटवारा हुआ था। 17 मार्च सन् 1860 ई. को गुरु बालकदास जी के शहादत के बाद सतनामियों का दमन शुरु हो गया। गुरु घासीदास, गुरु बालकदास के समय जिन लोगों ने अपनी भूमि व सम्पत्ति पर दोबारा कब्जा किया था, असमानतावादी विचारधारा को त्यागकर समतावादी समाज का निर्माण किया था। उनके खिलाफ चौतरफा दमन कर सतनामियों के हाथ से हजारों-हजार एकड़ भूमि और सम्पत्ति दमनकारियों के कब्जे में आता गया। सतनामियों का सबसे बड़ा ताकत उनका भूमि पर अधिकार और व्यापक एकता धीरे-धीरे खंडित होता गया। वीर नारायण सिंह: अकाल, अनाज और विद्रोह यदि गैंदसिंह का संघर्ष 1824-25 में छत्तीसगढ़ की धरती पर औपनिवेशिक हस्तक्षेप के खिलाफ प्रारंभिक बड़े आदिवासी प्रतिरोधों में दिखाई देता है, तो वीर नारायण सिंह का संघर्ष 1857 के दौर में इसी प्रतिरोध परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आता है। नारायण सिंह ने जनता के पक्ष में खड़े होने का निर्णय लिया। ब्रिटिश प्रशासन ने इसे कानून-व्यवस्था और शासन के खिलाफ चुनौती के रूप में देखा। परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल से निकलकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष नारायण सिंह को रायपुर जेल में रखा गया। लेकिन 1857 में देश के कई हिस्सों में विद्रोह की खबरें फैलने लगीं। इसी दौर में नारायण सिंह जेल से बाहर निकलने में सफल हुए और सोनाखान पहुंचे।वहां उन्होंने स्थानीय किसानों और मजदूरों को संगठित किया। उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया। यह वही समय था जब उत्तर भारत में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और अन्य नेता अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। इस प्रकार 1857 का विद्रोह केवल उत्तर भारत तक सीमित घटना नहीं था। उसकी प्रतिध्वनि छत्तीसगढ़ में भी सुनाई दी। सोनाखान से रायपुर तक: वीर नारायण सिंह की अंतिम यात्राब्रिटिश शासन ने नारायण सिंह के संघर्ष को गंभीर चुनौती माना। उनके नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने अंग्रेजी सत्ता का विरोध किया। अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में उन्हें फांसी दी गई।जिस स्थान पर उन्हें फांसी दी गई, वह आज जयस्तंभ चौक के नाम से जाना जाता है। उनकी शहादत छत्तीसगढ़ के 1857 के संघर्ष की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक बन गई। बाद के वर्षों में उन्हें “वीर नारायण सिंह” के नाम से सम्मानपूर्वक याद किया गया गैंदसिंह और वीर नारायण सिंह को साथ पढ़ना क्यों जरूरी है? इतिहास को केवल अलग-अलग महान व्यक्तियों की जीवनी के रूप में पढ़ने से उसकी पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। गैंदसिंह और वीर नारायण सिंह के संघर्षों को एक साथ देखने पर छत्तीसगढ़ में प्रतिरोध की एक लंबी परंपरा दिखाई देती है। 1824-25 — परलकोट विद्रोह — गैंदसिंह से लेकर 1857 — सोनाखान संघर्ष — वीर नारायण सिंह तक एक ऐसी ऐतिहासिक निरंतरता दिखाई देती है जिसमें स्थानीय समाज बाहरी शासन और शोषण के विरुद्ध लगातार अपनी आवाज उठाता रहा। यह प्रतिरोध केवल अंग्रेजों के खिलाफ नहीं था। इसके पीछे जमीन, जंगल, संसाधनों, सम्मान, स्थानीय स्वायत्तता और सामाजिक जीवन पर बाहरी नियंत्रण का विरोध भी था। 1857 से पहले और बाद में बस्तर के अनेक विद्रोह परलकोट और सोनाखान की घटनाएं अकेली नहीं थीं। बस्तर और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में अलग-अलग समय पर अनेक विद्रोह और प्रतिरोध हुए। इनमें स्थानीय सत्ता, मराठा प्रशासन, ब्रिटिश हस्तक्षेप, राजस्व व्यवस्था, जंगल पर नियंत्रण और बाहरी शोषण के खिलाफ विभिन्न रूपों में प्रतिरोध दिखाई देता है। ऐतिहासिक संदर्भों में जिन आंदोलनों का उल्लेख मिलता है, उनमें शामिल हैं
— हल्बा विद्रोह 1774 - 1779 भोपालपट्टनम संघर्ष — 1795 परलकोट विद्रोह — 1824-25 तारापुर विद्रोह — 1842-54 मेंरिया विद्रोह — 1842-1863 कोया विद्रोह — 1859 भूमकाल आंदोलन — 1910 इन आंदोलनों की प्रकृति और कारण एक-दूसरे से पूरी तरह समान नहीं थे। इसलिए इन्हें एक ही प्रकार का “स्वतंत्रता संग्राम” कहना ऐतिहासिक रूप से सावधानी की मांग करता है। लेकिन इन सभी में एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है—स्थानीय समाज द्वारा बाहरी हस्तक्षेप और शोषण का प्रतिरोध। भूमकाल: प्रतिरोध की परंपरा का एक बड़ा अध्याय 1910 का भूमकाल आंदोलन इस लंबी प्रतिरोध परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय था। गुंडाधुर जैसे नेताओं के नेतृत्व में बस्तर में ब्रिटिश प्रशासन और उससे जुड़ी शोषणकारी व्यवस्थाओं के खिलाफ व्यापक असंतोष सामने आया। भूमकाल का अर्थ ही है—भूमि का कम्पन या धरती का हिल उठना। यह नाम अपने आप में उस आंदोलन की व्यापकता और तीव्रता को व्यक्त करता है। यदि परलकोट में गैंदसिंह के नेतृत्व में आदिवासी समाज ने 1825 में प्रतिरोध किया था, तो लगभग 85 वर्ष बाद भूमकाल ने बस्तर में उसी व्यापक प्रतिरोध की एक नई अभिव्यक्ति प्रस्तुत की। इतिहास में आदिवासी विद्रोहों को पर्याप्त स्थान क्यों नहीं मिला? यह सवाल आज भी महत्वपूर्ण है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्यधारा इतिहास लंबे समय तक बड़े राजनीतिक नेताओं, शहरों, राजधानियों और संगठित राजनीतिक संस्थाओं के आसपास लिखा गया।लेकिन भारत का एक बड़ा हिस्सा गांवों, जंगलों और पहाड़ों में भी इतिहास बना रहा था। आदिवासी समाज ने अपने तरीके से औपनिवेशिक सत्ता का सामना किया। उनके पास अखबार नहीं थे। उनके पास आधुनिक राजनीतिक संगठन नहीं थे। उनके पास बड़े शहरों में राजनीतिक मंच नहीं थे। लेकिन उनके पास था— जंगल का ज्ञान, सामुदायिक एकता, स्थानीय संगठन और अपनी जमीन-जंगल के प्रति गहरा संबंध। इसीलिए आदिवासी विद्रोहों को केवल “स्थानीय उपद्रव” या “कानून-व्यवस्था की समस्या” के रूप में देखना इतिहास को अधूरा कर देता है। औपनिवेशिक अधिकारियों के दस्तावेजों में कई बार जिन आंदोलनों को “rebellion”, “disturbance” या “law and order problem” कहा गया, उन्हें आज स्थानीय समाज के दृष्टिकोण से पुनः पढ़ने की आवश्यकता है। स्वतंत्रता केवल 1857 में शुरू नहीं हुई , 1857 भारतीय इतिहास की एक महान घटना है। लेकिन भारत की स्वतंत्रता की चेतना उससे बहुत पहले अलग-अलग रूपों में विकसित हो रही थी। कहीं किसान विद्रोह कर रहे थे। ( परलकोट के राजा गेंद सिंह जी ) कहीं आदिवासी अपने जंगल और जमीन की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। कहीं स्थानीय शासक औपनिवेशिक हस्तक्षेप का विरोध कर रहे थे। कहीं सैनिक अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हथियार उठा रहे थे। इसलिए भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को केवल 1857 से शुरू होने वाली एक सीधी रेखा के रूप में देखना इतिहास की जटिलता को कम कर देता है।छत्तीसगढ़ का इतिहास इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। गैंदसिंह और वीर नारायण सिंह की विरासत आज गैंदसिंह और वीर नारायण सिंह केवल इतिहास की किताबों के पात्र नहीं हैं। वे छत्तीसगढ़ की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। 20 जनवरी को गैंदसिंह की शहादत को स्मरण किया जाता है।चारामा स्थित शासकीय महाविद्यालय का नाम भी गैंदसिंह के सम्मान में रखा गया है। वहीं वीर नारायण सिंह के नाम पर नवा रायपुर स्थित अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम तथा महासमुंद जिले का कोडार जलाशय जैसे संस्थान उनके सम्मान को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन किसी शहीद को याद करने का सबसे बेहतर तरीका केवल उसके नाम पर भवन या संस्थान बना देना नहीं है। जरूरी यह है कि हम उसके संघर्ष की परिस्थितियों को समझें। गैंदसिंह क्यों लड़े? नारायण सिंह ने जनता के लिए अनाज क्यों बांटा? आदिवासी समाज बार-बार विद्रोह करने के लिए क्यों मजबूर हुआ? अंग्रेजी शासन और स्थानीय समाज के बीच संघर्ष किन कारणों से पैदा हुआ? इन सवालों को समझना ही उनके इतिहास को सही अर्थों में सम्मान देना है।  
निष्कर्ष: - छत्तीसगढ़ की मिट्टी में प्रतिरोध की लंबी परंपरा छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल राजाओं और राजधानियों का इतिहास नहीं है। यह उन किसानों का इतिहास भी है जिन्होंने शोषण का विरोध किया। यह उन आदिवासियों का इतिहास भी है जिन्होंने जंगल और जमीन पर अपने अधिकार की रक्षा की। यह उन महिलाओं का इतिहास भी है जिन्होंने संघर्ष में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाया। और यह उन शहीदों का इतिहास है जिन्होंने अपनी जान देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रतिरोध की स्मृति छोड़ी। गैंदसिंह की शहादत 1825 में हुई।
उसके लगभग तीन दशक बाद 1857 में वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी।इसके बाद भी बस्तर और छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रतिरोध की अनेक धाराएं बहती रहीं और अंततः 1910 के भूमकाल जैसे बड़े आंदोलनों में उनकी गूंज सुनाई दी।इसलिए जब हम छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संघर्ष की बात करें तो हमें केवल 1857 से शुरुआत नहीं करनी चाहिए। हमें उससे पहले की उन आवाजों को भी सुनना होगा जो जंगलों, पहाड़ियों और गांवों से उठी थीं। परलकोट के गैंदसिंह से लेकर सोनाखान के वीर नारायण सिंह तक—यह केवल दो शहीदों की कहानी नहीं है। यह उस समाज की कहानी है जिसने अपने अस्तित्व, सम्मान, जमीन, जंगल और स्वायत्तता के लिए सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। और शायद इतिहास की सबसे बड़ी सीख यही है— स्वतंत्रता किसी एक दिन पैदा नहीं होती। वह वर्षों के संघर्ष, प्रतिरोध और बलिदान से आकार लेती है। गैंदसिंह को नमन। वीर नारायण सिंह को नमन।और उन तमाम ज्ञात-अज्ञात आदिवासी शहीदों को नमन, जिनके संघर्षों ने छत्तीसगढ़ की धरती पर प्रतिरोध की परंपरा को जीवित रखा।

लेख - संजीव कुमार  कहानी की शुरुआत इंस्पेक्टर देशराज से होती है, जो अपनी वर्दी और पद का इस्तेमाल कानून की रक्षा के बजाय भ्रष्टाचार और व्यक्...