छत्तीसगढ़ का कांकेर जिला अपनी समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। इस
अंचल में अनेक ऐसे पुरातात्विक स्थल विद्यमान हैं, जो प्रदेश के प्राचीन इतिहास और स्थापत्य परंपरा के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। इन्हीं धरोहरों में ग्राम रिसेवाड़ा स्थित प्राचीन मंदिर एक अत्यंत महत्वपूर्ण, किंतु लंबे समय से उपेक्षित स्मारक है। यह मंदिर कांकेर–नरहरपुर मार्ग पर कांकेर नगर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्राम से खेतों और एक छोटी पहाड़ी को पार करने के बाद यह प्राचीन देवालय प्राकृतिक परिवेश के मध्य दिखाई देता है, जो अपने शांत वातावरण और प्राचीन स्वरूप के कारण प्रथम दृष्टि में ही इतिहास की अनुभूति कराता है।इतिहासकारों एवं पुरातत्वविदों के मतानुसार इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी शासनकाल (लगभग 11 वीं से 13 वीं शताब्दी ईस्वी) के दौरान हुआ माना जाता है। उस समय दक्षिण कोसल क्षेत्र में मंदिर निर्माण कला अपने उत्कर्ष पर थी और अनेक भव्य देवालयों का निर्माण हुआ था। रिसेवाड़ा का यह मंदिर उसी स्थापत्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रतीत होता है। इसकी निर्माण शैली, विशाल प्रस्तर खंडों का उपयोग, गर्भगृह की संरचना तथा शिल्पित पत्थरों पर उकेरी गई कलात्मक अभिव्यक्तियाँ तत्कालीन शिल्पकला की उच्च परिपक्वता को दर्शाती हैं।
यद्यपि समय, प्राकृतिक क्षरण तथा उपेक्षा के कारण मंदिर के कुछ भाग प्रभावित हो चुके हैं, फिर भी इसकी मूल स्थापत्य संरचना आज भी सुरक्षित दिखाई देती है। विशाल पत्थरों से निर्मित गर्भगृह, अलंकृत प्रवेशद्वार, कलात्मक प्रस्तर खंड तथा मंदिर की स्थापत्य योजना इस बात का प्रमाण हैं कि उस काल के शिल्पकार वास्तुकला और मूर्तिकला दोनों में अत्यंत दक्ष थे। यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि मध्यकालीन दक्षिण कोसल की सांस्कृतिक और स्थापत्य परंपरा का जीवंत दस्तावेज भी है।स्थल भ्रमण के दौरान स्थानीय निवासी श्री दुर्जन राम पटेल (55 वर्ष) से चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि यह मंदिर आज भी आसपास के ग्रामीणों की गहरी आस्था का केंद्र है। प्रतिदिन तथा विशेष अवसरों पर ग्रामीण यहां पूजा-अर्चना एवं दर्शन के लिए आते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कांकेर सहित अन्य क्षेत्रों से इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति में रुचि रखने वाले लोग भी इस प्राचीन मंदिर को देखने पहुंचते हैं।
दुर्जन राम पटेल के अनुसार, मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बावजूद इसके संरक्षण एवं जीर्णोद्धार के लिए आज तक प्रशासन द्वारा कोई प्रभावी पहल नहीं की गई है। समय के साथ मंदिर की संरचना लगातार क्षतिग्रस्त होती जा रही है, किन्तु इसके संरक्षण के लिए कोई ठोस कार्य धरातल पर दिखाई नहीं देता। यदि समय रहते इस धरोहर का वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में इसकी मूल संरचना और ऐतिहासिक स्वरूप को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 49 के अनुसार राज्य का यह दायित्व है कि राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थलों एवं कलात्मक वस्तुओं का संरक्षण किया जाए। मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) – अनुच्छेद 51A (च) भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना।इसके अतिरिक्त प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल तथा अवशेष अधिनियम, 1958 तथा छत्तीसगढ़ प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1973 जैसी विधिक व्यवस्थाएँ भी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का प्रावधान करती हैं। यदि रिसेवाड़ा के इस मंदिर का विधिवत सर्वेक्षण कर इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया जाए, तो इसके संरक्षण, वैज्ञानिक जीर्णोद्धार तथा व्यवस्थित प्रबंधन का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
रिसेवाड़ा का प्राचीन मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि कांकेर जिले की ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक निरंतरता और स्थापत्य वैभव का महत्वपूर्ण प्रतीक है। ऐसे स्मारक समाज को उसके अतीत से जोड़ते हैं तथा भावी पीढ़ियों के लिए इतिहास का जीवंत स्रोत बनते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राज्य पुरातत्व विभाग तथा स्थानीय प्रशासन संयुक्त रूप से इस धरोहर का विस्तृत पुरातात्विक सर्वेक्षण कर संरक्षण, दस्तावेजीकरण एवं जीर्णोद्धार की दिशा में ठोस पहल करें।
यदि इस स्थल का वैज्ञानिक संरक्षण कर इसे पर्यटन मानचित्र से जोड़ा जाए, तो यह न केवल कांकेर जिले की ऐतिहासिक पहचान को नई ऊँचाई देगा, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
रिसेवाड़ा का प्राचीन मंदिर इतिहास, संस्कृति और भारतीय
स्थापत्य परंपरा की एक अमूल्य धरोहर है। यह केवल अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति, सभ्यता और ऐतिहासिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। समय की मांग है कि शासन, प्रशासन, पुरातत्व विभाग, जनप्रतिनिधि तथा समाज मिलकर इस धरोहर के संरक्षण का दायित्व निभाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस गौरवशाली विरासत को देख सकें, समझ सकें और अपने इतिहास पर गर्व कर सकें और क्षेत्र पर्यटन को बढावा मिल सके !




